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Monday, February 16, 2026

वो शाम, जो बीतकर भी नहीं बीती

याद है ना तुम्हें! वो शाम धीमे-धीमे उतर रही थी। बिलकुल वैसे ही, जैसे कोई थका हुआ दिन बिना शोर किए विदा लेता है। आसमान पर केसरिया रंग की एक धुंधली चादर बिछी थी, जिसमें सूरज की आख़िरी किरणें मानो ठिठक-ठिठक कर सांस ले रही थीं। हवा में हल्की-सी ठंडक थी। तुम सामने चुपचाप बैठी थी। इतनी स्थिर कि समय भी शायद तुम्हें छूने से डर रहा था, बिलकुल शिलावत। तुम्हारी आंखें कुछ तो कहना चाहती थीं। पर क्या? उनमें ना शिकायत थी, ना कोई आग्रह, ना बीते कल का हिसाब और ना आने वाले कल की मांग। फिर क्या था जो मैं उसदिन तुम्हारी आंखों में पढ़ नहीं पाया। मैं खुद को तुम्हारी आंखों में खोजने की कोशिश कर रहा था। पर उसदिन शायद तुम्हारे सामने होते हुए भी तुम्हारे लिए नहीं था। 

उस दिन ज़िन्दगी ने हमें एक और अवसर दिया था। पर जब नियति प्रतिकूल हो, तब अवसर भी अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं। वे सामने होते हुए भी हाथ नहीं आते, और जब तक आपको उनके ‘अवसर’ होने की बात समझ में आती है, तब तक वे स्मृति बन जाते हैं। पता है, आज भी वह शाम आंखों के सामने जीवित खड़ी हो जाती है। केसरिया आसमान, तुम्हारी खामोशी, और मेरा असहाय ठहराव। सब कुछ वहीं का वहीं है, बस हम दोनों उस क्षण से बहुत आगे बढ़ चुके हैं, लेकिन वह क्षण मेरे भीतर तो आज भी ठहरा हुआ है।

उस पूरी शाम तुमने कुछ नहीं कहा, बस जाते-जाते पलटकर एक बार देखा था। शायद एक क्षण का दसवां हिस्सा रहा होगा। उस एक दृष्टि में कोई वादा नहीं था, कोई पश्चाताप नहीं था, बस इस बात की स्वीकार्यता थी कि जो हो रहा है, वही होना था और वही होगा। तुम्हारी आंखों में उस वक्त ज़रा-सी नमी थी, जिसे तुमने मुस्कान से छुपाने की कोशिश की, और वही कोशिश थी, जिसने मुझमें तुम्हारे प्रति ‘विश्वास’ को जीवित रखा था।

पता है! उस शाम अगर तुम अपने मौन का सहारा ना लिया होता और शब्दों से सब कह देती तो शायद सबकुछ आसान हो जाता, पर जो नहीं कहा गया, वही सबसे भारी बनकर रह गया। आज भी जब शाम उतरती है और आसमान वही धुंधला सा केसरिया रंग ओढ़ लेता है, तो तुम्हारा वही मौन, वही दृष्टि, और वह अधूरी मुस्कान मेरे भीतर कहीं फिर से जीवित हो उठती है।


लोग कहते हैं कि वक़्त बहुत कुछ बदल देता है, पर सच मानो, कुछ यादों को वक्त छू भी नहीं पाता। वह शाम भी उन्हीं में से एक है- जो बीत गई, पर मेरे भीतर से कभी गई नहीं।

Sunday, April 4, 2021

तुम्हें कभी खुद से कमतर नहीं आंका

सुनो ना! याद है तुम्हें, उस दिन वो टीचर काफी नाराज हो गए थे। मेरा ध्यान उनकी बातों से ज्यादा तुम्हारे चेहरे पर रहता था। शायद उन्हें जलन हुई होगी, या फिर कुछ और रहा होगा... लेकिन उनका गुस्सा साफ उनके चेहरे पर झलक रहा था। पर क्या करते, वो गुस्सा मुझ पर उतार नहीं सकते थे, शायद डरते थे... उस दिन वो गुस्सा तुम पर उतरा।


मैं कैसे बर्दाश्त करता कि जो मेरी आंखों में बसा है, उसे कोई और आंख दिखाए। मैं कैसे बर्दाश्त करता कि जिसे सामने देखकर मेरी आवाज बंद हो जाती थी, उससे कोई ऊंची आवाज में बात करे। फिर वही हुआ, जिससे तुम्हारे साथ-साथ वो भी डरते थे। एक आवारा से लड़के से डर लगना स्वाभाविक भी है। 'गुरुजी अकेले ही जाते हो, नहीं पहुंचना है तो बता दो...' बस इसी लाइन से वो लाइन पर आ गए थे। 


पता है तुम्हें, मैं ये सब कैसे कर लेता था?  क्योंकि जब मन साफ सुथरा होता है ना, तो मनोबल अपने चरम पर होता है। बात जब खुद के प्रेम के अस्तित्व, उसके आत्मसम्मान और उसके फलीभूत होने की आकांक्षा लेकर एकत्व तक पहुंच जाए तो सबकुछ स्वतः दांव पर लग जाता है। मैंने कभी तुम्हें खुद से कमतर नहीं आंका, क्योंकि तुम एक स्त्री थी... एक स्त्री जो पुरुष को जन्म देती है, जन्म के बाद भी उसे जीवन देती है... पर मुझे दायित्वबोध था, मेरी अपेक्षाएं शून्य थीं और इच्छाएं आकाश पर, बस इसीलिए जब भी तुम्हारा जिक्र होता था, मुझे तुम्हारी फिक्र होने लगती थी।

#क्वीन

ये थी हमारे रिश्ते की खूबसूरती

याद है वो वक्त, जब हम कुछ सालों के लिए दूर हो गए थे? उस वक्त दोबारा मिलने की उम्मीद टूटने लगी थी। दिल सवाल करता था कि क्या रिश्तों के कुछ उसूल नहीं होते? क्या इस तरह से बीच सफर में अलग हो जाना अच्छा होता? पर इन सवालों के साथ एक सवाल और होता था कि अगर प्रेम ईश्वर का स्वरूप है तो क्या शारीरिक मिलन जरूरी था? क्या वाकई आत्मा के इस पवित्र बंधन को किसी सामाजिक रिश्ते का नाम देना जरूरी था? इन विरोधाभासी से सवालों जवाब नहीं मिले तो सब कुछ भगवान पर छोड़ दिया था।


वक्त का तकाजा ही था कि कुछ ख्वाब मन में दबा लिए थे और कुछ ख्वाहिशें जिम्मेदारियों के नीचे खुद-ब-खुद दब गईं। सब हैरान थे कि अपनी अलग दुनिया में रहने वाला लड़का कैसे एक लड़की की सादगी पर मर मिटा। वो हमेशा चहकने वाला लड़का कुछ शांत रहने लगा था। कोई नहीं समझ रहा था कि ऊपर दिख रही शांति के पीछे उस लड़के के अंदर हो रहे शोरगुल से वो कितना विचलित है। 


सुनो ना, मैं जानता था कि प्रेम सभी के भाग्य में नहीं होता, लेकिन मैं ये भी जानता था कि तुम ही थी जो मुझे खोने से डरती थी। मुझसे दूर जाने के ख्वाब से ही तुम्हारी आंखों में आंसू आ जाते थे और मैं जानता था कि जो इतनी मासूम है, उससे ज्यादा प्यार कोई नहीं कर सकता। पता है, हमारे रिश्ते की खूबसूरती क्या थी? हमारी गलती न होते हुए भी हम कभी भी दूसरे की गलती को अपना मान लेते थे। यही वो वजह थी जिसने हमें फिर से मिलाया, हमारे इश्क को नए आयाम मिले...

#क्वीन

तुम्हारा प्यार और मेरा कर्तव्य

कहीं पढ़ा था कि कर्तव्य, प्रेम से बहुत ऊंचा होता है, लेकिन उस कर्तव्य की परिभाषा क्या है? क्या प्रेम में प्रेयसी के प्रति समर्पण से बड़ा कोई कर्तव्य होता है? तुमने हर बंधन तोड़ने का बीड़ा उठाया था, जाति, महजब, तथाकथित सामाजिक परंपराएं... हर बंधन तुम्हारे प्रेम के सामने कच्चे धागे सा था। और फिर तुम्हें सहेजकर रखने से बड़ा कर्तव्य क्या हो सकता था? हर कोशिश की थी मैंने तुम्हें सहेजने की, पर पता नहीं कैसे उस शख्स की अहमन्यता ने सब बदल दिया। जिस दिन एक-दूसरे का हाथ छूटा था, तब से सैकड़ों साजिशें हुईं, पर हम में से कोई किसी का हाथ नहीं थाम पाया। 


विरह की उस कड़ी के बाद जिंदगी में कई नए किस्से जुड़ सकते थे, कई इल्जाम लग सकते थे, पर हम दोनों को खुद पर गुरूर था। शायद इसीलिए हमने इल्जाम नहीं इंतजार चुना। इस इंतजार की इंतहा क्या थी, किसी को नहीं पता था, पर फिर भी हम इंतजार करते रहे। ऐसा लगता था कि सूर्योदय के बाद भी चांद जग रहा है, मेरे इंतजार में मेरा साथ दे रहा है। मान बैठा था कि वो इंतजार सदियों तक चलने वाला है। इस जन्म में ना सही तो अगले जन्म में ही सही, तुम मिलोगी और मानोगी कि हमारा प्रेम पूर्णता की पराकाष्ठा पर पहुंच गया है, लेकिन देखो ना प्रणय देव की कैसी कृपा हुई, तुम मिली और एक नई कहानी बन गई...


पता है, अगर बात अगले जन्म की होती और तुम्हारे मिलने की गांरटी होने के बावजूद मेरे पास अगर खुद से कुछ बनने का ऑप्शन होता तो मैं गौरव नहीं बनता। मैं सिर्फ एक मांग रखता कि मुझे 'तिल' बना दिया जाए, वो तिल जो तुम्हारे सबसे करीब है...वो तिल जो हर वक्त तुम्हारी खुशबू महसूस करता है... वो तिल जो सबकुछ जिसे देखकर मैं अपना दिल दे बैठा था... वो तिल जो तुम्हारे दिल के सबसे करीब था... वो तिल जो तुम्हारी हर बात सबसे पहले सुनता था... वो तिल जो ईश्वर की सबसे प्यारी कलाकारी थी... वो तिल जो मेरे चांद को हर बुरी नजर से बचाता था...

#क्वीन

वो पागल सा लड़का अब डरने लगा है

 मेरा अहंकार सर्वदा मेरे दायित्वबोध से ऊपर रहा। वो लड़का हर बात पर लोगों से भिड़ जाया करता था। क्यों किसी ने घूर दिया, क्यों किसी ने ओवरटेक कर दिया, क्यों किसी ने किसी और को कुछ कह दिया, और सबसे अहम चीज कि किसी की नजरें तुम्हारी ओर कैसे घूमीं। ऐसी सैकड़ों वजहें हर रोज मिल जाती थीं। शायद पागलपन ही था वो मेरा, लेकिन जो भी था, मेरा ही था। कभी नहीं सोचा था कि तुम दूर जाओगी, लगता था कि कोई भी हो, हमें अलग नहीं कर सकता, लेकिन कहते हैं ना, अहंकार ईश्वर का भोजन है। तुम डोर गई और मेरा अहंकार टूट गया। 


सालों तक तुमसे दूर रहने के दौरान सब बदल गया। तुम साथ नहीं थी तो किसी और का साथ भी अच्छा नहीं लगता था। एक-एक कर सब दूर हो गए। लगने लगा था कि जीवन निस्सार हो गया है। सब बदल गया था। अब कोई सामान्य तौर पर भी देखता था तो मेरी नजरें नीचे हो जाती थीं, तुम्हें कौन देख रहा है, उसका पता भी नहीं रहता था। खुद में ही कहीं खो गया था मैं। उम्मीद टूट रही थी लेकिन कोई तो था, जो कहीं हमारे एकत्व की कहानी को पूरा करने का विधान लिख चुका था।


हर शाम कांच के उस गिलास में जब तुम्हारी तस्वीर उभरते देखता था तो लगता था कि तुम बेहद करीब हो मेरे। आखिरकार उम्मीद की उस किरण को नए आयाम मिले। ईश्वर ने मिलन करा दिया। वक़्त की मार से घायल होने के बावजूद हमारा एक दूसरे के लिए प्यार कम नहीं हुआ था। पर उस प्यार के अलावा काफी कुछ बदल गया था। अब वो पागल सा लड़का जो कभी किसी से नहीं डरता था, अब डरने लगा था तुम्हें खोने से, वो सबकुछ बदल देना चाहता था, सब कुछ पाने की चाहत रखने वाला, हजारों के बीच खुद विशिष्ट सा लगने वाला वो लड़का अब सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा रहना चाहता था

#क्वीन

Saturday, January 9, 2021

मेरे लिखने से तुम डरती थी ना?

तुम नहीं चाहती थी कि मैं कुछ लिखूं, किसी से तुम्हारे बारे में बात करूं, उन खुशियों भरे पल के अहसास किसी और को बताऊं... तुमने खूब मना किया, इतना ज्यादा कि ऐसा लगने लगा जैसे 'लिखना', तुमसे जुड़ी बातें, तुम्हारे साथ बीते खुशनुमा लम्हें किसी से भी शेयर करना कोई अपराध हो। इश्क में सब ठीक लग रहा था, सब सही लग रहा था। लगता था कि तुम नहीं चाहती कि हमारी 'निजता' पर कोई आघात हो, शायद इसीलिए रोकती हो, पर असल वजह तो कुछ और ही थी ना?


तुम पहले से जानती थी ना कि अगर मैंने सबकुछ लिखने, या 'भावों' को शेयर करने की आदत डाल ली तो तुम जो मेरे तब के भविष्य में करने वाली थी, वो भी सबके सामने आ जाएगा? तुम डरती थी ना कि उन बेतुके बहानों को दुनिया कभी इश्क के 'एकत्व' में रुकावट नहीं मानेगी? तुम्हें डर था ना कि सहीं मेरे अक्षरों से निकला सच सारे झूठों को बेनकाब न कर दे? 


पर सुनो ना, अक्षर का अर्थ जानती हो तुम? अक्षर यानी जिसका कभी क्षरण न हो सके यानी परम् ब्रह्म परमात्मा और मैं कहता भी था ना कि मेरा प्रेम हमेशा यूं ही बना रहेगा, बिल्कुल ब्रह्म की तरह... अब ये अक्षर उस निर्गुण ब्रह्म को सगुण रूप दे रहे हैं। विश्वास मानो! सालों पहले दोपहर के तीन बजे किए गए उस वादे को पूरा करने के लिए सैकड़ों रातें 3 बजे का वक्त देखे बिना यूं ही आंसुओं संग बिता दी हैं... 

Thursday, April 23, 2020

हर 7 तारीख दे जाती है दर्दभरी याद

हर सुबह का बस एक ही ख्याल होता था कि कैंपस में पहुंचते ही तुम्हारा चेहरा दिख जाए, तुम्हारी उस मुस्कान पर सबकुछ कुर्बान कर देने की इच्छा होती थी। अपने ही द्वारा बनाए गए नियमों को तोड़कर नए नियम गढ़ने लगा था मैं, सिर्फ इस वजह से क्योंकि तुम्हारे उन सलीके से बंधे बालों के जूड़े से निकलकर तुम्हारे गाल को छू रही लट को धीमे से तुम्हें कानों के पीछे करता देख सकूं।

उन आंखों में छिपे फरेब को नहीं देख पा रहा था मैं, सोचा नहीं था कि जिसे मैं अपनी जिंदगी मानकर जिये जा रहा हूं, उसकी जिंदगी की कहानी में मेरा जिक्र तक नहीं होगा। भिक्षापात्र जैसी हो गई थीं मेरी आंखें, उन्हें बस तुम्हारा दीदार ही तो चाहिए था। पर देखों ने आशाओं से भरी उन आंखों में निराशा का बीज ऐसा फूटा कि कई महीनों तक रातें बेसाख्ता बरसती आंखों की गवाह बन गईं। तुम पास होती तो अच्छा लगता, लेकिन क्या तुम्हारा मेरे पास होना, या मेरे साथ होना मेरी जिंदगी के लिए अच्छा होता? तुम्हें जानने वाले कहते हैं, 'नहीं'... अच्छा ही हुआ जो तुमने हमारे रिश्ते को प्रेम से नहीं सींचा और वह रिश्ता मुर्झा गया। तुम्हारे जाने के बाद एकांत का आदी हो गया था मैं और उस एकांत को भंग करने वाला मुझे अपना सबसे बड़ा शत्रु लगा था। वह शत्रु था या मित्र, नहीं पहचान पाया था मैं... बिल्कुल वैसे ही, जैसे तुम्हें पहचानने में लगती की थी।

अंधकार में जब सारे शब्दों, सारी आकृतियों को और अधिक छिपाने के लिए कुहरा आ जाता है, उसी तरह का जीवन लगने लगा था, कुछ नजर नहीं आ रहा था, तब हमारे उस अधूरे और बेनाम रिश्ते की यादें मिटाने के लिए सब जतन कर डाले... पर तीन सालों का वह अग्रीमेंट हर महीने की 7 तारीख को उन 7 महीनों की याद दिला ही देता है...सच कहूं, मोहब्बत की इस जंग में मेरी हार नहीं हुई थी, मैं तो बस 'बच' गया था जीतने से... अगर ना बचता तो शायद जीत की दहलीज पर खड़े होकर जब अतीत की आंखों में झांकता तो खुद से नजर मिलाने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाता।

Friday, November 2, 2018

एक रिश्ता, जिसका प्रायश्चित कर रहा हूं

इंतजार, एक ऐसी चीज जिससे मैं सबसे ज्यादा नफरत करता हूं लेकिन एक दौर ऐसा भी आया जब इंतजार के बाद मिलने वाले 'फल' की वजह से इंतजार से भी मोहब्बत हो गई। सिर्फ तुम ही तो थी जिसके लिए अपनी क्लास खत्म होने के बाद कॉलेज के गेट पर खड़ा रहता था, तुम ही तो थी जिसके लिए कहीं तुम जल्दी न निकल जाओ, इस डर से चौराहे पर एक घंटे पहले ही आकर खड़ा हो जाता था, तुम ही तो थी जिसके एक मेसेज के इंतजार में रात में साइलेंट फोन पर नजरें टिकाए रहता था कि कहीं तुरंत मेसेज नहीं देख पाया तो तुम्हारे घर वाला फोन तुमसे दूर हो जाएगा और हम 'एसएमएस चैट' नहीं कर पाएंगे।

मेरे 'कोड हॉर्न' की आवाज सुनने के इंतजार में ड्राइंग रूम में खिड़की के पास बैठना तो तुम्हें भी अच्छा लगता था ना, आखिर उसी को सुनकर तो तुम छत पर आती थी। तुम्हारी रूठी हुई आंखों में भी इंतजार होता था कि कब मैं तुम्हें मनाने आऊं, और मैं तुम्हारी नाराजगी से सुर्ख लाल होते चेहरे को देखने के लिए थोड़ा और इंतजार करवा देता था।

पर देखो ना, अब मुझे फिर से इंतजार बुरा लगने लगा है क्योंकि सालों तक तुम्हारा इंतजार करते-करते एक ऐसे रिश्ते का सच जान गया, जो पूर्ण होते हुए भी अपूर्ण था। उस पूर्ण से लगने वाले अपूर्ण रिश्ते में इंतजार के दौरान सुबह एक उम्मीद शुरू होती थी और देर रात वह घाव की तरह अनवरत चलने वाला दर्द दे जाती थी। वे स्वप्न शर्मिंदा हो रहे थे जो मां भगवती के मंदिर में हमने एक साथ देखे थे। और अंत में इस बेनाम और अधूरे रिश्ते का प्रायश्चित करना मेरे हिस्से में आया और वह प्रायश्चित था, एक अंतहीन इंतजार...

Wednesday, October 31, 2018

वह मुलाकात

आंखों से बात करने की वह दोतरफा कोशिश, बेहद अजीब सा लग रहा था हम दोनों को... बाद में तुम्हीं ने तो बताया था कि तुम कुछ और ही समझ रही थी मुझे लेकिन फिर भी बात करना चाहती थी और मैं इस उधेड़बुन में लगा था कि कहीं अगर मेरे बात करने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया तो मेरे 'ईगो' का क्या होगा... उस मुलाकात में ऐसा लगा था जैसे हमारा कोई पुराना रिश्ता है, एक ऐसा रिश्ता जो शायद कभी अधूरा रहा हो और अब इस पड़ाव पर वह खुद को पूर्णता के शिखर पर देखना चाहता हो।

इसे ईश्वर पर विश्वास कहो या कुछ और, जीवन में सबकुछ कार्य-कारण सिद्धांत से जुड़ा होता है, कुछ भी अकारण नहीं होता, हमारी मुलाकात भी अकारण नहीं हुई थी। ऐसा लग रहा था जैसे खुद से मिलकर, खुद में ही खो गए हों हम। लेकिन मिलन का सुख पाना इतना आसान तो नहीं होता। छिप-छिपकर एक-दूसरे को देखना और अगर नजरें मिल जाएं तो लज्जा में नजरें झुका लेना। कितना खूबसूरत था ना वह समय...

चंद लम्हों में तब हम पूरी जिंदगी जी लेते थे। इंतजार होता था कि कब दिखोगी तुम, सिर्फ तुम्हारे लिए ही तो क्लास में जाता था, नहीं तो असल पढ़ाई तो दोस्तों के साथ चौराहों पर ही होती थी। एक जुनून था, जिसकी वजह से सुकून खत्म सा हो गया था और उसी जुनून में पता नहीं कितने साल बिता दिए, साथ बिताए गए लम्हों को याद करके कविताएं लिखीं, एक पूरी किताब लिख डाली और लिखते-लिखते बस यही सोचता था कि क्या जो लिख रहा हूं, वह सब तुम्हें अपने सामने बैठाकर सुना पाउंगा....
#क्वीन

अपनी पहली डेट

क्लास खत्म होने के बाद उस रेस्तरां में पहली बार गए थे हम, अपनी पहली 'डेट' पर... ऑर्डर करने का नंबर आया तो तुमने तो पानी से ही काम चलाने का फैसला सुनाया और मुझे यह कहकर फंसा दिया कि जो अपने लिए ऑर्डर करोगे, उसी में शेयर कर लूंगी। क्या ऑर्डर करूँ? यही सवाल परेशान कर रहा था, अपने साथ में आई उस 'मेसेंजर' कम दोस्त ने तो सामने पड़ोस की टेबल पर कब्जा करके झट से नूडल्स ऑर्डर कर दीं। आखिरकार तीसरी बार वह वेटर भविष्य के सुनहरे स्वप्नों में खोए चित्त को झकझोरते हुए 'विघ्नप्रणेता' के रूप में प्रकट हुआ।

'सर, क्या लाऊं?'
'भाई, कुछ मत लाओ, बस थोड़ी देर सुकून से बैठने दो।' यही कहना चाहता था मैं पर नहीं कह पाया और बिना कुछ सोचे मसाला डोसा ऑर्डर कर दिया। बिना शब्दों की बातें हो रही थीं तभी हमारा ऑर्डर आ गया और मैं फिर एक बार खुद की किस्मत पर सम्मोहित होने लगा कि तुम हमारी पहली डेट में ही कुछ 'शेयर' करने वाली हो। खैर हमने डोसा खाया और अर्थहीन सवाल-जवाब के साथ 'डेट' पूरी की।

फिर 41 बार हम उसी जगह पर गए और डोसा ही खाया। पता नहीं कैसा स्वाद था उसका, स्वाद से फर्क भी किसे पड़ता था। हम तो बस एक-दूसरे में खोने के लिए वहां जाते थे, ताकि क्लास के उस तथाकथित दायरे से बाहर निकल कर खुद को जी सकें। तुम दूर गई तो 'डोसा' भी दूर चला गया।

2 महीने पहले फिर से डोसा खाया, मैसूर का डोसा... उसमें स्वाद था, लेकिन उसे खाकर रेस्तरां से बाहर निकलने की जल्दी थी। पहले यह जल्दबाजी नहीं होती थी और वही चीज असल मजा देती थी....
#क्वीन

Saturday, October 27, 2018

करवाचौथ और तुम

करवाचौथ है आज, तुम सुबह से बिना पानी पिए चांद का इंतजार कर रही थी और देखो ना चांद तो दिख गया लेकिन तुम चुपचाप कमरे में जाकर बैठ गई। पिछले आठ सालों में 6 बार हम दोनों साथ उपवास पर थे। शादी के वाले साल में भी हम दोनों साथ ही थे, लेकिन देखो ना इस बार मैं ऑफिस में हूं और तुम शनिवार को रखे गए व्रत को रविवार को तोड़ोगी। खैर, मामला सिर्फ जिम्मेदारियों का है, यहां भी और वहां भी...

याद है तुम्हें शादी से पहले मैं रात में तुम्हारे घर के बाहर आता था और तुम चुपके से नीचे आकर मेरे हाथों से दादी के हाथों की बनी खीर खाती थी। आज वह खीर तो बनी होगी लेकिन तुम्हें अपने हाथों से खिलाने के लिए मैं नहीं हूं। तुम नाराज नहीं हो, लेकिन मैं हूं, खुद से कि इस मौके पर तुम्हारे पास नहीं हूं।

आज अनायास ही वह करवाचौथ याद आ गया जब तुम मेरे जीवन में नहीं थी, लेकिन फिर भी मैं चांद का इंतजार कर रहा था। जिसके लिए उपवास रखा था, उसे तो आज तक पता नहीं है लेकिन फिर भी बस यूं ही रख लिया था... तीन घंटे कोचिंग के बहाने उसके घर के नीचे खड़ा रहा था कि कम से कम उसकी मां जब चांद देखने आएंगी तो वह भी साथ में आएगी और मुझे मेरे चांद का दीदार हो जाएगा लेकिन वह नहीं दिखी... अगले दिन कॉलेज में उसे देखने के बाद ही समोसे के साथ चाय पी थी। क्या बचपना था यार... लेकिन बेहतरीन था वह सब भी...
खैर, आता हूं और अगली बार साथ रहने का वादा भी करता हूं....
#क्वीन

Thursday, October 25, 2018

इसलिए तुम्हारी जगह किसी और को दी

लगा था कि गणनायक की कृपा से मिलन हुआ है हमारा। तुम्हारी कांति का कायल था मैं। तुम्हारी अधमता को समझ ही नहीं पाया। तुम्हारे प्रेम में यूं खोया कि तुम्हारे और मेरे बीच वसन के अतिरिक्त कुछ न बचा। यह सामान्य तो नहीं था...

कौन्तेय की भांति मैं भी अपना वचन निभाने में सक्षम था किंतु तुमने तो साथ चलने का साहस ही न दिखाया। अदम्यता से परिपूर्ण गौरव को तुम्हारी कथित लाचारी एवं उसके अहंकार ने हरा दिया। प्रेम की ऊर्मि आखिर निढाल हो गई। आख़िर कब तक करता इंतजार? कब तक घर के चक्कर लगाता, कब तक बेवजह तुम्हारे पापा के नंबर पर फोन करता, कब तक एक बार चेहरा देखने की उम्मीद लिए चौराहे पर खड़ा रहता, कब तक बेउम्मीद होकर मरने और मारने की तरकीबें सोचता, कब तक उनसे नजरें चुराता जिनको तुम्हारे साथ सात फेरे लेने के वचन दिए थे? हरा दिया था तुमने मुझे, तुम्हारे मासूम चेहरे के पीछे छिपे उस गैरजिम्मेदाराना अनुबंध ने संबंध समाप्त करने पर विवश कर दिया। अगर वह ना आती तो पूर्ण रूप से निरंकुश हो जाता मैं, और फिर कोई न रोक पाता...

हो सकता है कि तुमको लगता हो कि अगर मेरा प्यार सच्चा था तो तुम्हारे दूर जाने के बाद मैंने किसी और से संबंध क्यों जोड़ा? सवाल जायज है लेकिन प्यार दोतरफा, शाश्वत एवं विवेकसम्पन्न होता तो मुझे कभी फिर से आकर्षण नहीं होता। वादे के मुताबिक, 3 साल तक लोग तुम्हें प्यार करते रहे, कामना करते रहे कि उन्हें हमारे जैसा प्यार मिले लेकिन मैं नहीं चाहता कि किसी का प्यार हमारी तरह हो... जिसमें सिर्फ धोखा, बेवफाई और असि की भांति घाव देने की क्षमता हो...
#क्वीन #पुरानी_कहानी

तुम दूर गई तो नफरत बढ़ी, प्यार नहीं...

कहते हैं कि आप जिससे प्यार करते हो, अगर वह दूर जाए तो प्यार बढ़ता जाता है लेकिन यह सत्य नहीं है। जब से तुम दूर गई हो, तब से तो हर दिन, हर पल तुम्हारे लिए नफरत बढ़ती ही जा रही है। प्रेम की वैजयंती लहराने के लिए मधुमास का आगमन होता उससे पहले ही प्रेम कैवल्य को प्राप्त हो गया।

मृगांक की रोशनी में तुम्हारे उपवास का पारायण कराने का स्वप्न अन्तक के मुख में विलीन हो गया। अब जितनी बार भी तुम मेरे सामने आती हो, ईश्वर का धन्यवाद देता हूँ कि तुम्हारी रम्यता के मोहपाश से बच गया। वृष्टि के बीच मेरे नयनों से होने वाली वर्षण किसी को नहीं दिखी,लेकिन आज तुमसे दूरी बनाने की वजह से चेहरे पर अद्भुत द्युति छा गई है।

प्रथम प्रयास को अंतिम लक्ष्य मान लिया था लेकिन भूल गया था कि पहली बार में कोई पूर्ण दक्ष नहीं हो जाता। अनुभव की पाठशाला ने बहुत कुछ दे दिया, दूसरी बार जब मन में प्रेम का आविर्भाव हुआ तो मैं पारंगत हो चुका था, उसे सहेजकर रखने में। देखो ना, आज वेदना एवं प्रेम के संयुक्त भाव को शब्द देकर मृगमद की भांति महकने लगा हूँ। अगर यह सब ना होता तो शायद मां वाग्देवी की कृपा न बरसती।
#क्वीन #पुरानी_कहानी

Sunday, January 8, 2017

तब मेरी इच्छाएं शून्य हो जाती थीं

मैं तुम्हारे अंदर अपने भगवान को खोजता था, पता नहीं क्यों लेकिन तुम जैसे ही मेरे सामने आती थी मेरी सारी हसरतें, मेरी आकांक्षाएं, मेरी इच्छाएं शून्य हो जाती थीं। ऐसा लगता था कि मेरे भगवान मेरे सामने आ गए हों, अब जिसके सामने, जिसके साथ उसके भगवान हों, उसे और क्या चाहिए....

समय बीता, माहौल बदला... फिर समझ में आया कि तुम तो मेरे भगवान से भी कहीं ऊपर का दर्जा रखती हो... बताओ भला! मैं हर दिन अपने भगवान की पूजा करता था लेकिन उनसे कभी नहीं पूछा कि भगवान, आपने खाना खाया? उनसे कभी नहीं पूछा कि आपको ठंड तो नहीं लग रही है? उन्हें अपने अवचेतन मस्तिष्क से दिल तक नहीं ला पाया लेकिन तुम्हारे पल-पल की चिंता करता था...

लेकिन इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी... सारी गलती मेरी थी... मैं ही तो था जो यह भी भूल गया कि तुम तो इंसान हो, मेरी तरह ही... अब तुम्हें भगवान की जगह पर बैठा दूंगा तो उन्हें बुरा तो लगेगा ही औऱ लगना भी चाहिए... बस उन्होंने कहा कि जाओ, तुम एक इंसान को मुझसे भी ऊपर का समझ बैठे हो तो मैं तुम्हारे भ्रम को तोड़ देता हूं... और उन्होंने मेरे उस भ्रम को तोड़ दिया... आखिर उनकी भी खुद को लेकर कुछ तो जिम्मेदारियां हैं ना...

तुम्हीं बताओ इन सब बातों के अलावा खुद को सांत्वना कैसे दे सकता हूं मैं?
#क्वीन

कैसे उस दिन अपने भाई से नजर मिला पाई होगी तुम?

Displaying 14657379_183520982093034_3353028272577647744_n.jpgशादी हो गई तुम्हारी... कल ही तुम्हारी फ्रेंड ने बताया... बहुत खुश हुआ मैं लेकिन मन में कुछ सवाल थे, कुछ जिज्ञासाएं थीं... क्या 'निकाह-निकाह-निकाह' बोलते समय एक बार भी तुम्हारी जुबान लड़खड़ाई नहीं होगी? आखिर कैसा लगा होगा तुम्हें जब उसने शादी वाली शाम तुम्हारे हाथ को थामा होगा... क्या उसने उस दौरान तुम्हारे हाथों की ढीली पकड़ को महसूस नहीं किया होगा?  क्या तुम्हें मेरे साथ सात फेरे लेने के वादे याद नहीं आए होंगे... क्या तुम अपने उस भाई से नजर मिला पा रही होगी जिसने तुम्हारे आंसुओं से भीगे प्रेम पत्रों को मुझ तक पहुंचाया था...

कैसा लगा होगा तुम्हें जब उसने तुम्हारे माथे से आंचल हटाया होगा... कैसा लगा होगा तुम्हें जब उसने तुम्हारे माथे को चूमा होगा, क्या तब तुम्हारा सुर्ख लाल चेहरा पीला नहीं हो गया होगा... कैसा लगा होगा जब अगले दिन सुबह तुमने खुद को उसकी बाहों में जकड़ा पाया होगा...

काश! काश कि तुम उन ऊंची अट्टालिकाओं ने नीचे जमीन पर आकर मेरी मोहब्बत को समझने की कोशिश करती... काश कि तुम समझ पाती कि बुलंदी से जर्रों का अंदाजा नहीं होता... पता है! अगर तुममें मेरे साथ जिंदगी गुजारने का अरमान होता हो मजहबी दीवारें कभी हमारे बीच में नहीं आतीं लेकिन तुम तो हार के उस कंगूरे पर खड़ी थी जिसकी नींव में सिर्फ मेरी नाकामयाब मोहब्बत मेरी जिंदगी के अनकहे पहलुओं पर मुस्कुराती दिख रही थी...
#क्वीन

Saturday, November 26, 2016

इन अल्फाजों की वजह

बसंत की उस प्यारी हवा सी चलती हुई तुम जब मेरे सामने आकर रुकती थी तो ऐसा लगता था कि चांद मेरे सामने आ गया हो... पता है ऐसा लगता था जैसे अषाढ़ की कड़ी धूप में मुुझे आम के पेड़ के नीचे जैसी छांव मिल गई हो। लेकिन मुझे समझ में नहीं आता था कि तुम मेरे सामने आकर मुझसे नजरें क्यों नहीं मिलाती थी? तुम सामने से हमेशा नजर झुकाकर बात करती थी, क्या इसलिए क्योंकि तुम्हें पता था कि तुम्हारी आंखें मुझसे उस सच को नहीं छिपा पाएंगी जो कुछ महीनों में मूर्त रूप लेने वाला था?

तुम्हें बार-बार पाकर खोना थोड़ा अजीब लगता था और इसीलिए खुद-ब-खुद तुमसे दूर चला गया। तुम मेरी कमजोरी से अच्छी तरह से वाकिफ थी, तुम्हारे आंसू मुझे हर बार हरा देते थे लेकिन जब तुमसे दूर गया तो लगा कि अब हमेशा के लिए हार गया लेकिन गलत था मैं... उस दिन हारकर भी जीत गया था मैं... 

कोशिश करता था कि तुम्हें भूल जाऊं, तुम मेरी जिंदगी के हर लम्हे से चली जाओ लेकिन मेरा इरादा मेरी बेबसी से हमेशा हार जाता था। लोग कहते हैं कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। मुझे आज तक नहीं समझ आया कि आखिर तुमने मुझे खोकर क्या पाया लेकिन अगर मुझसे कोई यही सवाल करे कि मैंने तुम्हें खोकर क्या पाया तो? जानना चाहोगी ना तुम?
तो सुनो! मैंने तुम्हें खोकर खुद को पाया है... मेरे इन अल्फाजों में बसे दर्द की उत्पत्ति का पूरा श्रेय सिर्फ तुम्हें जाता है... मेरी जिन्दगी के सबसे हसीन और सबसे दर्दनाक लम्हों की वजह बस तुम ही थी, तुम ही हो और तुम ही रहोगी...
#क्वीन

तुम्हारी मजबूरी और मेरी बेबसी

आज अगर कोई पूछे कि उस रिश्ते से मुझे क्या मिला तो मैं बस चुपचाप अपनी आंखे बंद करके दिल में बसे कुछ 'लम्हों' को ही अपनी कमाई बता सकता हूं... कुछ टूटे से, कुछ बिखरे से और कुछ अधूरे लम्हें... उन लम्हों की सबसे खास बात पता है क्या थी? सपने तोड़ देने वाले उन लम्हों में उम्मीद की झलक हमेशा बनी रहती थी... उन टूटे सपनों में  तुम्हारी मजबूरी दिखती थी मुझे लेकिन मेरी बेबसी हमेशा तुम्हारी मजबूरी को हराकर मुझे एक उम्मीद दे जाती थी।

उस मंदिर में पीपल के पेड़ पर बांधे गए धागे की गांठ तुम्हारा नाम लेकर ही तो बांधता था... 'तुम कभी मुझसे दूर ना जाओ' यही तो मांगा था मैंने भगवान से और देखो आज मेरे दिल के साथ-साथ मेरे अल्फाजों में भी बस गई हो तुम... शब्द तो ब्रह्म का स्वरूप होता है, उसका आधार बनना इतना आसान तो नहीं होता... पर आसान काम मेरे राम मुझसे कराते भी कहां हैं...

बहुत कम लोग होते हैं जिनकी जरूरत और ख्वाहिश दोनों एक ही हो... उन चुनिंदा लोगों में मैं भी था जिसकी जरूरत और ख्वाहिश दोनों तुम ही थी और देखो ना मेरी ख्वाहिश कुछ इस तरह पूरी हुई कि जिंदगी भर के लिए तुम मेरे अल्फाजों में बस गई। मेरे दिल में दबी वो अनकही बातें, उन अल्फाजों के सहारे ही बाहर आती है और मेरी मासूम सी मोहब्बत इन अल्फाजों में मुस्कुराती दिखाई देती है। बस कोशिश ये है कि इन अल्फाजों को पढ़कर शर्म से लाल हुए अपने गालों को अपनी भूरी आंखों से शीशे के सामने खड़े होकर देखो तो तुम्हारे मासूम चेहरे के गुलाबी होठों पर भी मुस्कान तैर जाए...
#क्वीन 

दुल्हन बनने जा रही हो तुम

दुल्हन बनने जा रही हो तुम... अब किसी और के हाथों में होगा तुम्हारा हाथ... तुम्हारे सपने पूरे हो रहे हैं, उन सपनों को नई उड़ान मिल रही है... लेकिन क्या तुम्हें वह उड़ान याद है, जो हमने साथ मिलकर उड़ी थी? शर्मिंदा हो ना उस पर? जिस उड़ान के दौरान पंख ही टूट जाएं और परिंदा निढाल होकर जमीन पर गिर जाए तो शर्मिंदा होना तो बनता ही है... लेकिन अगर उसदिन तुम्हारे पर न टूटे होते और तुम न गिरी होती तो विश्वास मानो आज इन नए पंखों के साथ तुम इस उड़ान को न भर पाती...

हमने जिन पलों को साथ बिताया है, उन्हें याद करके शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं... क्योंकि मुझे पता है कि अगर तुम शर्मिंदा हुई तो तुम्हारी आंखों में आंसू आएंगे और जिन आंखों में मैंने अपने लिए बेपनाह मोहब्बत देखी है, उनमें आंसू आएं, यह मुझे अच्छा नहीं लगेगा...

बहुत बेरुखी दिखाई थी मैंने तुम्हें और तुमने वह बेरुखी मुझसे सीख ली और फिर उसे मुझ पर ही अजमाया... गलती तो मेरी ही थी... लेकिन मेरी बेरुखी की एक वजह थी... तुम्हारे अंदाज-ए-मोहब्बत ने मुझे मजबूर कर दिया था... हर दिन एक नया जख्म और फिर ख्याल रखने की हिदायत, मोहब्बत करते करते अपनी कद्र खो दी थी मैंने, मजबूरी हो गई थी बेरुखी करना... ऐतबार की वे कड़ियां, इंतजार की वे घड़ियां, तुम्हारे साथ बिताए गए वे लम्हें और तुम्हारे वे अधूरे वादे... तुमसे जुड़ा सब कुछ मेरे लिए बेहद खास है... इन खास चीजों को मैं कभी खुद से दूर नहीं करूंगा... बस इतना सा ही वादा है और कुछ नहीं दे सकता मैं तुम्हें.... और हां! मैं अपने वादे कभी नहीं तोड़ता...
#क्वीन

Thursday, November 17, 2016

वे लॉकेबल डायरियां

याद हैं वे लॉकेबल डायरियां, जिन्हें हम कॉलेज में एक्सचेंज किया करते थे? हर रात हम दोनों अपने दिल की बातें उनमें लिखते थे और फिर सुबह कॉलेज में एक-दूसरे की डायरियां घर ले जाते थे... कितना अच्छा लगता था ना रात के अंधेरे में लिखी गई बातों को चढ़ते सूर्य के साथ पढ़ना... लगता था जैसे हम एक-दूसरे के सामने खड़े होकर अपने मन की बातें बता रहे हों... सुबह 7 बजे कॉलेज पहुंचकर सीढ़ियों पर तुम्हारे कदमों की आहट का इंतजार करना सांस लेने जितना जरूरी हो गया था।

अंग्रेजी की क्लास के दौरान जब तुम साइंस सेक्शन में आती थी तो मेरी निगाहें अपनी किताब से हटकर तुम पर ठहर जाती थीं। 40 मिनट की वह क्लास चंद पलों में सिमटती महसूस होती थी। उस लॉकेबल डायरी को जब मेरे पापा ने देखा तो उसका लॉक तोड़कर तुम्हारा नाम जानने की कोशिश की, लेकिन उन्हें नाकामयाबी ही मिली।

मेरी मोहब्बत चाहे तुम्हें 'आम' ही लगे लेकिन बिना नाम लिए तुम्हारा जिक्र करने का मेरा सलीका आज भी पहले की तरह ही बरकरार है, तुम्हें यह सलीका तो जरूर 'खास' लगता होगा। तुम्हारी उस फ्रेंड ने अगर मेरे घर पर तुम्हारा नाम ना बताया होता तो शायद आज वे भी तुम्हारे नाम से अनजान होते। पता नहीं अब उन्हें तुम्हारा नाम याद होगा भी या नहीं लेकिन मेरे दिल में तुम्हारे साथ बिताया गया हर एक पल 'लॉक' है, और उस लॉक की चाभी को भी अपनी मोहब्बत के समंदर में फेंक दिया है, जिससे कभी चाहकर भी उन लम्हों को खुद से दूर ना कर पाऊं....
#क्वीन

तुम्हें जानने वाली पहली शख्स है वो

कितना मुश्किल होता है उस इंसान की आंखों में आंसू देखना जिससे आप मोहब्बत करते हैं... पर उस दिन तुम्हारी आंखों के आंसू अच्छे लगे क्योंकि वे आंसू मेरे लिए थे, तुम्हें डर था मुझसे दूर जाने का... उस दौर में एक-एक महीना ऐसे बीतता था जैसे एक-एक दिन हो... तुम्हारे साथ समय का पता ही नहीं लगता था। कुछ साल बीते, और आ गई 16 नवंबर की वह शाम... जब एक बार फिर से तुम्हारी आंखों में आंसू दिखे... पर इस बार वे आंसू मेरे लिए नहीं थे... तुम्हारी आंखों में आंसू देखकर मैं तुम्हारे उस डर को समझ गया था।

तुम कहती थी ना कि कभी तुम्हारा नाम किसी को ना बताऊं... देखो इतने सालों तक मैं लोगों को गोल-गोल घुमाता रहा लेकिन कल यानी 16 नवंबर को एक बार फिर उसी शाम की बेरुखी में खो गया। छोटी बहन की मासूमियत ने मेरे बंद होठों को खुलने पर मजबूर कर ही दिया... उस शाम प्यार हारा था और कल प्यार से हार गया। बता दिया उसे तुम्हारा नाम लेकिन उसी वादे के साथ जो मैंने तुमसे किया था।

जब तुम इसे पढ़ रही होगी तो पता नहीं तुम्हें कैसा लगेगा... लेकिन मेरा विश्वास करो... जितना विश्वास तुम मुझ पर करती हो ना उतना ही मैं उस पर करता हूं... जैसे मैंने तुम्हारा विश्वास नहीं तोड़ा, वैसे ही वह भी मेरा विश्वास नहीं तोड़ेगी... पहली और शायद आखिरी इंसान है वो तुम्हारे नाम को जानने वाली....
#क्वीन