सुनो ना! याद है तुम्हें वो शाम?
सबके लिए हर शाम की तरह बहुत आम सी ही रही होगी, पर मेरे लिए वो बहुत खास थी। पहली बार साथ थे हम... सिर्फ हम... बिना किसी विशेष प्रयोजन के, बिना किसी पूर्वाभास के।
तुम कुछ कह रही थी और मैं सुन रहा था। सच कहूँ तो, तुम्हारी सारी बातें मुझे याद भी नहीं; लेकिन तुम्हारी आवाज़ का वह ठहराव, मुस्कुराते हुए बात करने का ढंग और बीच-बीच में मेरी ओर देख लेना... सब कहीं भीतर ठहर सा गया था।उस एक शाम में पहली बार लगा कि किसी के साथ होना भी एक तरह का सुकून हो सकता है। उस दिन विदा लेते हुए कुछ भी असाधारण नहीं हुआ। न कोई वादा, न कोई इकरार। बस एक साधारण सा वाक्य- 'फिर मिलते हैं'
अगली सुबह पता नहीं क्यों, मन बार-बार यही सोच रहा था कि आज तुमसे बात होगी या नहीं। फोन उठाता, रख देता। कोई मैसेज आता तो पहले तुम्हारा नाम ही तलाशता। ये प्रतीक्षा अकारण थी, फिर भी व्यर्थ नहीं लग रही थी।
मुझ जैसे बेपरवाह इंसान के साथ उस एक शाम में जो हुआ, वो कोई अलग ही अवस्था थी, एक ऐसी अवस्था, जहाँ कोई आपको अच्छा लगने लगता है, उस एक शख्स की उपस्थिति से ही आपके होठों पर मुस्कान आ जाती है।
उन चंद पलों की मुलाकात में, तुम्हारे साथ चुप रहना भी सहज लगा था और तुम्हारी आंखों में आंखें डालकर अपने मन की अनगढ़ बातें कहने में भी संकोच नहीं था। कुछ अजीब सा ही था सबकुछ...
और शायद मेरी रोमांचक कहानी में तुम्हारा अचानक से शामिल हो जाना, 'यूं' ही तो नहीं हो सकता... शायद जीवन में 'लगभग सबकुछ' होने के बाद 'लगभग' को हटाकर 'सबकुछ' होने के अहसास को जिंदा करने आई थी तुम... एक अच्छे दोस्त की तरह... जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत महसूस करता था मैं... जिसके सामने ये ना सोचूं कि क्या कहना है और क्या नहीं... जिसकी सुन सकूं और जिसे सुना सकूं... मुझे चाहिए था कोई मेरे जैसा...
#क्वीन