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Sunday, April 4, 2021

वो पागल सा लड़का अब डरने लगा है

 मेरा अहंकार सर्वदा मेरे दायित्वबोध से ऊपर रहा। वो लड़का हर बात पर लोगों से भिड़ जाया करता था। क्यों किसी ने घूर दिया, क्यों किसी ने ओवरटेक कर दिया, क्यों किसी ने किसी और को कुछ कह दिया, और सबसे अहम चीज कि किसी की नजरें तुम्हारी ओर कैसे घूमीं। ऐसी सैकड़ों वजहें हर रोज मिल जाती थीं। शायद पागलपन ही था वो मेरा, लेकिन जो भी था, मेरा ही था। कभी नहीं सोचा था कि तुम दूर जाओगी, लगता था कि कोई भी हो, हमें अलग नहीं कर सकता, लेकिन कहते हैं ना, अहंकार ईश्वर का भोजन है। तुम डोर गई और मेरा अहंकार टूट गया। 


सालों तक तुमसे दूर रहने के दौरान सब बदल गया। तुम साथ नहीं थी तो किसी और का साथ भी अच्छा नहीं लगता था। एक-एक कर सब दूर हो गए। लगने लगा था कि जीवन निस्सार हो गया है। सब बदल गया था। अब कोई सामान्य तौर पर भी देखता था तो मेरी नजरें नीचे हो जाती थीं, तुम्हें कौन देख रहा है, उसका पता भी नहीं रहता था। खुद में ही कहीं खो गया था मैं। उम्मीद टूट रही थी लेकिन कोई तो था, जो कहीं हमारे एकत्व की कहानी को पूरा करने का विधान लिख चुका था।


हर शाम कांच के उस गिलास में जब तुम्हारी तस्वीर उभरते देखता था तो लगता था कि तुम बेहद करीब हो मेरे। आखिरकार उम्मीद की उस किरण को नए आयाम मिले। ईश्वर ने मिलन करा दिया। वक़्त की मार से घायल होने के बावजूद हमारा एक दूसरे के लिए प्यार कम नहीं हुआ था। पर उस प्यार के अलावा काफी कुछ बदल गया था। अब वो पागल सा लड़का जो कभी किसी से नहीं डरता था, अब डरने लगा था तुम्हें खोने से, वो सबकुछ बदल देना चाहता था, सब कुछ पाने की चाहत रखने वाला, हजारों के बीच खुद विशिष्ट सा लगने वाला वो लड़का अब सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा रहना चाहता था

#क्वीन

Saturday, January 9, 2021

मेरे लिखने से तुम डरती थी ना?

तुम नहीं चाहती थी कि मैं कुछ लिखूं, किसी से तुम्हारे बारे में बात करूं, उन खुशियों भरे पल के अहसास किसी और को बताऊं... तुमने खूब मना किया, इतना ज्यादा कि ऐसा लगने लगा जैसे 'लिखना', तुमसे जुड़ी बातें, तुम्हारे साथ बीते खुशनुमा लम्हें किसी से भी शेयर करना कोई अपराध हो। इश्क में सब ठीक लग रहा था, सब सही लग रहा था। लगता था कि तुम नहीं चाहती कि हमारी 'निजता' पर कोई आघात हो, शायद इसीलिए रोकती हो, पर असल वजह तो कुछ और ही थी ना?


तुम पहले से जानती थी ना कि अगर मैंने सबकुछ लिखने, या 'भावों' को शेयर करने की आदत डाल ली तो तुम जो मेरे तब के भविष्य में करने वाली थी, वो भी सबके सामने आ जाएगा? तुम डरती थी ना कि उन बेतुके बहानों को दुनिया कभी इश्क के 'एकत्व' में रुकावट नहीं मानेगी? तुम्हें डर था ना कि सहीं मेरे अक्षरों से निकला सच सारे झूठों को बेनकाब न कर दे? 


पर सुनो ना, अक्षर का अर्थ जानती हो तुम? अक्षर यानी जिसका कभी क्षरण न हो सके यानी परम् ब्रह्म परमात्मा और मैं कहता भी था ना कि मेरा प्रेम हमेशा यूं ही बना रहेगा, बिल्कुल ब्रह्म की तरह... अब ये अक्षर उस निर्गुण ब्रह्म को सगुण रूप दे रहे हैं। विश्वास मानो! सालों पहले दोपहर के तीन बजे किए गए उस वादे को पूरा करने के लिए सैकड़ों रातें 3 बजे का वक्त देखे बिना यूं ही आंसुओं संग बिता दी हैं... 

Friday, November 2, 2018

एक रिश्ता, जिसका प्रायश्चित कर रहा हूं

इंतजार, एक ऐसी चीज जिससे मैं सबसे ज्यादा नफरत करता हूं लेकिन एक दौर ऐसा भी आया जब इंतजार के बाद मिलने वाले 'फल' की वजह से इंतजार से भी मोहब्बत हो गई। सिर्फ तुम ही तो थी जिसके लिए अपनी क्लास खत्म होने के बाद कॉलेज के गेट पर खड़ा रहता था, तुम ही तो थी जिसके लिए कहीं तुम जल्दी न निकल जाओ, इस डर से चौराहे पर एक घंटे पहले ही आकर खड़ा हो जाता था, तुम ही तो थी जिसके एक मेसेज के इंतजार में रात में साइलेंट फोन पर नजरें टिकाए रहता था कि कहीं तुरंत मेसेज नहीं देख पाया तो तुम्हारे घर वाला फोन तुमसे दूर हो जाएगा और हम 'एसएमएस चैट' नहीं कर पाएंगे।

मेरे 'कोड हॉर्न' की आवाज सुनने के इंतजार में ड्राइंग रूम में खिड़की के पास बैठना तो तुम्हें भी अच्छा लगता था ना, आखिर उसी को सुनकर तो तुम छत पर आती थी। तुम्हारी रूठी हुई आंखों में भी इंतजार होता था कि कब मैं तुम्हें मनाने आऊं, और मैं तुम्हारी नाराजगी से सुर्ख लाल होते चेहरे को देखने के लिए थोड़ा और इंतजार करवा देता था।

पर देखो ना, अब मुझे फिर से इंतजार बुरा लगने लगा है क्योंकि सालों तक तुम्हारा इंतजार करते-करते एक ऐसे रिश्ते का सच जान गया, जो पूर्ण होते हुए भी अपूर्ण था। उस पूर्ण से लगने वाले अपूर्ण रिश्ते में इंतजार के दौरान सुबह एक उम्मीद शुरू होती थी और देर रात वह घाव की तरह अनवरत चलने वाला दर्द दे जाती थी। वे स्वप्न शर्मिंदा हो रहे थे जो मां भगवती के मंदिर में हमने एक साथ देखे थे। और अंत में इस बेनाम और अधूरे रिश्ते का प्रायश्चित करना मेरे हिस्से में आया और वह प्रायश्चित था, एक अंतहीन इंतजार...

वह आखिरी छुअन

जरूरी नहीं कि प्यार में हर रिश्ते को कोई नाम दिया जाए, दूसरे शब्दों में कहें तो हर एक रिश्ते में प्यार हो सकता है और बिना रिश्ते के भी प्यार हो सकता है। लेकिन 'हम' तो हमारे प्यार को एक रिश्ते का नाम देना चाहते थे ना! जैसे ईश्वर को चाहता था, वैसे ही तुम्हें भी और जैसे ईश्वर से तुम्हें मांगता था, वैसे ही तुमसे भी तुम्हें मांगता था, यह जानते हुए कि सिर्फ पाने को प्यार नहीं कहते, मैं तुम्हें पाना चाहता था। और आखिरकार पा लिया तुम्हें, हमारी आत्मा का वह मिलन, ऐसा लगा था कि जैसे प्रीत की कोई अल्पना सी सज गई है, ऐसा लगा था जैसे स्याह रात में रोशनी हो गई है। निष्पाप और निश्छल भावनाओं के साथ की वह छुअन अलैकिक थी। तुम्हारे हाथ की उस अंगूठी को छूने के बहाने उस प्रथम स्पर्श में ऐसा लगा था जैसे स्पर्श त्वचा का नहीं, हृदय का है।

लेकिन अपनी आखिरी मुलाकात में सब बदला-बदला सा था। जाते-जाते जब तुमने हाथ मिलाया तो लगा जैसे हमारी आत्माएं एक-दूसरे से अलग हो रही हैं, हमारे दिल दूर जा रहे हैं। अकारण हुए उस दिव्य प्रेम में जो कुछ था, सब इंद्रियों से परे था। लेकिन उस अंतिम मुलाकात में इंद्रीय स्पर्श को महसूस किया था मैंने। न हाथों में वह गर्माहट थी और ना ही पुरानी गर्मजोशी।

मेरी आंखों में देखकर पहले तुम सब समझ जाती थी, लेकिन उसदिन तो मेरे कहने के बावजूद भी नहीं समझी कि मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं। पहली छुअन के समय जो घबराहट था, वह शायद अब बेबसी बन चुकी थी। कभी स्पर्श मात्र से मोम से पिघल जाने वाली वह लड़की उसदिन पत्थर सी लग रही थी और पत्थरों का मैं क्या करता। चले जाना मजबूरी थी, पत्थर को ईश्वर समझकर पूज भी नहीं सकता था क्योंकि ईश्वर तो हृदय में वास करता है, और तुम तो उस हृदय को ठोकर मारकर चली गई थी, आखिर अफने ईश्वर का अपमान कैसे बर्दाश्त करता मैं
#क्वीन

Wednesday, October 31, 2018

वह मुलाकात

आंखों से बात करने की वह दोतरफा कोशिश, बेहद अजीब सा लग रहा था हम दोनों को... बाद में तुम्हीं ने तो बताया था कि तुम कुछ और ही समझ रही थी मुझे लेकिन फिर भी बात करना चाहती थी और मैं इस उधेड़बुन में लगा था कि कहीं अगर मेरे बात करने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया तो मेरे 'ईगो' का क्या होगा... उस मुलाकात में ऐसा लगा था जैसे हमारा कोई पुराना रिश्ता है, एक ऐसा रिश्ता जो शायद कभी अधूरा रहा हो और अब इस पड़ाव पर वह खुद को पूर्णता के शिखर पर देखना चाहता हो।

इसे ईश्वर पर विश्वास कहो या कुछ और, जीवन में सबकुछ कार्य-कारण सिद्धांत से जुड़ा होता है, कुछ भी अकारण नहीं होता, हमारी मुलाकात भी अकारण नहीं हुई थी। ऐसा लग रहा था जैसे खुद से मिलकर, खुद में ही खो गए हों हम। लेकिन मिलन का सुख पाना इतना आसान तो नहीं होता। छिप-छिपकर एक-दूसरे को देखना और अगर नजरें मिल जाएं तो लज्जा में नजरें झुका लेना। कितना खूबसूरत था ना वह समय...

चंद लम्हों में तब हम पूरी जिंदगी जी लेते थे। इंतजार होता था कि कब दिखोगी तुम, सिर्फ तुम्हारे लिए ही तो क्लास में जाता था, नहीं तो असल पढ़ाई तो दोस्तों के साथ चौराहों पर ही होती थी। एक जुनून था, जिसकी वजह से सुकून खत्म सा हो गया था और उसी जुनून में पता नहीं कितने साल बिता दिए, साथ बिताए गए लम्हों को याद करके कविताएं लिखीं, एक पूरी किताब लिख डाली और लिखते-लिखते बस यही सोचता था कि क्या जो लिख रहा हूं, वह सब तुम्हें अपने सामने बैठाकर सुना पाउंगा....
#क्वीन

अपनी पहली डेट

क्लास खत्म होने के बाद उस रेस्तरां में पहली बार गए थे हम, अपनी पहली 'डेट' पर... ऑर्डर करने का नंबर आया तो तुमने तो पानी से ही काम चलाने का फैसला सुनाया और मुझे यह कहकर फंसा दिया कि जो अपने लिए ऑर्डर करोगे, उसी में शेयर कर लूंगी। क्या ऑर्डर करूँ? यही सवाल परेशान कर रहा था, अपने साथ में आई उस 'मेसेंजर' कम दोस्त ने तो सामने पड़ोस की टेबल पर कब्जा करके झट से नूडल्स ऑर्डर कर दीं। आखिरकार तीसरी बार वह वेटर भविष्य के सुनहरे स्वप्नों में खोए चित्त को झकझोरते हुए 'विघ्नप्रणेता' के रूप में प्रकट हुआ।

'सर, क्या लाऊं?'
'भाई, कुछ मत लाओ, बस थोड़ी देर सुकून से बैठने दो।' यही कहना चाहता था मैं पर नहीं कह पाया और बिना कुछ सोचे मसाला डोसा ऑर्डर कर दिया। बिना शब्दों की बातें हो रही थीं तभी हमारा ऑर्डर आ गया और मैं फिर एक बार खुद की किस्मत पर सम्मोहित होने लगा कि तुम हमारी पहली डेट में ही कुछ 'शेयर' करने वाली हो। खैर हमने डोसा खाया और अर्थहीन सवाल-जवाब के साथ 'डेट' पूरी की।

फिर 41 बार हम उसी जगह पर गए और डोसा ही खाया। पता नहीं कैसा स्वाद था उसका, स्वाद से फर्क भी किसे पड़ता था। हम तो बस एक-दूसरे में खोने के लिए वहां जाते थे, ताकि क्लास के उस तथाकथित दायरे से बाहर निकल कर खुद को जी सकें। तुम दूर गई तो 'डोसा' भी दूर चला गया।

2 महीने पहले फिर से डोसा खाया, मैसूर का डोसा... उसमें स्वाद था, लेकिन उसे खाकर रेस्तरां से बाहर निकलने की जल्दी थी। पहले यह जल्दबाजी नहीं होती थी और वही चीज असल मजा देती थी....
#क्वीन

Saturday, October 27, 2018

करवाचौथ और तुम

करवाचौथ है आज, तुम सुबह से बिना पानी पिए चांद का इंतजार कर रही थी और देखो ना चांद तो दिख गया लेकिन तुम चुपचाप कमरे में जाकर बैठ गई। पिछले आठ सालों में 6 बार हम दोनों साथ उपवास पर थे। शादी के वाले साल में भी हम दोनों साथ ही थे, लेकिन देखो ना इस बार मैं ऑफिस में हूं और तुम शनिवार को रखे गए व्रत को रविवार को तोड़ोगी। खैर, मामला सिर्फ जिम्मेदारियों का है, यहां भी और वहां भी...

याद है तुम्हें शादी से पहले मैं रात में तुम्हारे घर के बाहर आता था और तुम चुपके से नीचे आकर मेरे हाथों से दादी के हाथों की बनी खीर खाती थी। आज वह खीर तो बनी होगी लेकिन तुम्हें अपने हाथों से खिलाने के लिए मैं नहीं हूं। तुम नाराज नहीं हो, लेकिन मैं हूं, खुद से कि इस मौके पर तुम्हारे पास नहीं हूं।

आज अनायास ही वह करवाचौथ याद आ गया जब तुम मेरे जीवन में नहीं थी, लेकिन फिर भी मैं चांद का इंतजार कर रहा था। जिसके लिए उपवास रखा था, उसे तो आज तक पता नहीं है लेकिन फिर भी बस यूं ही रख लिया था... तीन घंटे कोचिंग के बहाने उसके घर के नीचे खड़ा रहा था कि कम से कम उसकी मां जब चांद देखने आएंगी तो वह भी साथ में आएगी और मुझे मेरे चांद का दीदार हो जाएगा लेकिन वह नहीं दिखी... अगले दिन कॉलेज में उसे देखने के बाद ही समोसे के साथ चाय पी थी। क्या बचपना था यार... लेकिन बेहतरीन था वह सब भी...
खैर, आता हूं और अगली बार साथ रहने का वादा भी करता हूं....
#क्वीन

Thursday, October 25, 2018

इसलिए तुम्हारी जगह किसी और को दी

लगा था कि गणनायक की कृपा से मिलन हुआ है हमारा। तुम्हारी कांति का कायल था मैं। तुम्हारी अधमता को समझ ही नहीं पाया। तुम्हारे प्रेम में यूं खोया कि तुम्हारे और मेरे बीच वसन के अतिरिक्त कुछ न बचा। यह सामान्य तो नहीं था...

कौन्तेय की भांति मैं भी अपना वचन निभाने में सक्षम था किंतु तुमने तो साथ चलने का साहस ही न दिखाया। अदम्यता से परिपूर्ण गौरव को तुम्हारी कथित लाचारी एवं उसके अहंकार ने हरा दिया। प्रेम की ऊर्मि आखिर निढाल हो गई। आख़िर कब तक करता इंतजार? कब तक घर के चक्कर लगाता, कब तक बेवजह तुम्हारे पापा के नंबर पर फोन करता, कब तक एक बार चेहरा देखने की उम्मीद लिए चौराहे पर खड़ा रहता, कब तक बेउम्मीद होकर मरने और मारने की तरकीबें सोचता, कब तक उनसे नजरें चुराता जिनको तुम्हारे साथ सात फेरे लेने के वचन दिए थे? हरा दिया था तुमने मुझे, तुम्हारे मासूम चेहरे के पीछे छिपे उस गैरजिम्मेदाराना अनुबंध ने संबंध समाप्त करने पर विवश कर दिया। अगर वह ना आती तो पूर्ण रूप से निरंकुश हो जाता मैं, और फिर कोई न रोक पाता...

हो सकता है कि तुमको लगता हो कि अगर मेरा प्यार सच्चा था तो तुम्हारे दूर जाने के बाद मैंने किसी और से संबंध क्यों जोड़ा? सवाल जायज है लेकिन प्यार दोतरफा, शाश्वत एवं विवेकसम्पन्न होता तो मुझे कभी फिर से आकर्षण नहीं होता। वादे के मुताबिक, 3 साल तक लोग तुम्हें प्यार करते रहे, कामना करते रहे कि उन्हें हमारे जैसा प्यार मिले लेकिन मैं नहीं चाहता कि किसी का प्यार हमारी तरह हो... जिसमें सिर्फ धोखा, बेवफाई और असि की भांति घाव देने की क्षमता हो...
#क्वीन #पुरानी_कहानी

तुम दूर गई तो नफरत बढ़ी, प्यार नहीं...

कहते हैं कि आप जिससे प्यार करते हो, अगर वह दूर जाए तो प्यार बढ़ता जाता है लेकिन यह सत्य नहीं है। जब से तुम दूर गई हो, तब से तो हर दिन, हर पल तुम्हारे लिए नफरत बढ़ती ही जा रही है। प्रेम की वैजयंती लहराने के लिए मधुमास का आगमन होता उससे पहले ही प्रेम कैवल्य को प्राप्त हो गया।

मृगांक की रोशनी में तुम्हारे उपवास का पारायण कराने का स्वप्न अन्तक के मुख में विलीन हो गया। अब जितनी बार भी तुम मेरे सामने आती हो, ईश्वर का धन्यवाद देता हूँ कि तुम्हारी रम्यता के मोहपाश से बच गया। वृष्टि के बीच मेरे नयनों से होने वाली वर्षण किसी को नहीं दिखी,लेकिन आज तुमसे दूरी बनाने की वजह से चेहरे पर अद्भुत द्युति छा गई है।

प्रथम प्रयास को अंतिम लक्ष्य मान लिया था लेकिन भूल गया था कि पहली बार में कोई पूर्ण दक्ष नहीं हो जाता। अनुभव की पाठशाला ने बहुत कुछ दे दिया, दूसरी बार जब मन में प्रेम का आविर्भाव हुआ तो मैं पारंगत हो चुका था, उसे सहेजकर रखने में। देखो ना, आज वेदना एवं प्रेम के संयुक्त भाव को शब्द देकर मृगमद की भांति महकने लगा हूँ। अगर यह सब ना होता तो शायद मां वाग्देवी की कृपा न बरसती।
#क्वीन #पुरानी_कहानी

Sunday, December 25, 2016

क्रिसमस और मेरा डर

याद है 25 दिसंबर की वह शाम जब तुमने फोन करके 'मैरी क्रिसमस' बोला था और मैंने सनातनी अहंकार में तुमसे कह दिया था कि हिंदू त्योहार कम पड़ गए हैं क्या? 'गौरव! तुमसे तो बात करना ही बेकार है...' तुमने तुरंत यही कहते हुए फोन काट दिया था ना.... उसके बाद अगले 3 दिन तुमने मुझसे बात ही नहीं की...

मुझे याद है 29 दिसंबर को सुबह तुमने फिर फोन किया... मैं हैरान था कि रात 3 बजे तक तो मैं तुमको सैकड़ों कॉल कर चुका हूं लेकिन तुमने फोन नहीं उठाया और फिर अचानक सुबह 5:45 पर कॉल क्यों? बस मानसिक जद्दोजहद में फोन उठाकर बाहर आ गया... मन में एक अजीब सा डर था कि ऐसा क्या हुआ जो तुमने इतनी सुबह फोन कर दिया...

तुमने कहा, 'गौरव! उस दिन लखनऊ में मेरी फ्रेंड के घर पर पार्टी थी और मैंने बहुत मुश्किल से पापा-मम्मी को मनाया था, पूरे 4 महीने 11 दिन के बाद मिल सकते थे हम लेकिन तुम्हे पूरी बात सुनने की आदत ही कहां है... मुझे पता है कि अब तुम्हारी आंखों से आंसू निकलने वाले हैं लेकिन प्लीज इतना याद रखना कि तुम्हारे सिद्धान्तों पर सिर्फ तुम्हारे लिए आघात कर सकती हूं...'

अब मेरा डर पश्चाताप में बदल चुका था....
# क्वीन

Thursday, November 17, 2016

वे लॉकेबल डायरियां

याद हैं वे लॉकेबल डायरियां, जिन्हें हम कॉलेज में एक्सचेंज किया करते थे? हर रात हम दोनों अपने दिल की बातें उनमें लिखते थे और फिर सुबह कॉलेज में एक-दूसरे की डायरियां घर ले जाते थे... कितना अच्छा लगता था ना रात के अंधेरे में लिखी गई बातों को चढ़ते सूर्य के साथ पढ़ना... लगता था जैसे हम एक-दूसरे के सामने खड़े होकर अपने मन की बातें बता रहे हों... सुबह 7 बजे कॉलेज पहुंचकर सीढ़ियों पर तुम्हारे कदमों की आहट का इंतजार करना सांस लेने जितना जरूरी हो गया था।

अंग्रेजी की क्लास के दौरान जब तुम साइंस सेक्शन में आती थी तो मेरी निगाहें अपनी किताब से हटकर तुम पर ठहर जाती थीं। 40 मिनट की वह क्लास चंद पलों में सिमटती महसूस होती थी। उस लॉकेबल डायरी को जब मेरे पापा ने देखा तो उसका लॉक तोड़कर तुम्हारा नाम जानने की कोशिश की, लेकिन उन्हें नाकामयाबी ही मिली।

मेरी मोहब्बत चाहे तुम्हें 'आम' ही लगे लेकिन बिना नाम लिए तुम्हारा जिक्र करने का मेरा सलीका आज भी पहले की तरह ही बरकरार है, तुम्हें यह सलीका तो जरूर 'खास' लगता होगा। तुम्हारी उस फ्रेंड ने अगर मेरे घर पर तुम्हारा नाम ना बताया होता तो शायद आज वे भी तुम्हारे नाम से अनजान होते। पता नहीं अब उन्हें तुम्हारा नाम याद होगा भी या नहीं लेकिन मेरे दिल में तुम्हारे साथ बिताया गया हर एक पल 'लॉक' है, और उस लॉक की चाभी को भी अपनी मोहब्बत के समंदर में फेंक दिया है, जिससे कभी चाहकर भी उन लम्हों को खुद से दूर ना कर पाऊं....
#क्वीन

तुम्हें जानने वाली पहली शख्स है वो

कितना मुश्किल होता है उस इंसान की आंखों में आंसू देखना जिससे आप मोहब्बत करते हैं... पर उस दिन तुम्हारी आंखों के आंसू अच्छे लगे क्योंकि वे आंसू मेरे लिए थे, तुम्हें डर था मुझसे दूर जाने का... उस दौर में एक-एक महीना ऐसे बीतता था जैसे एक-एक दिन हो... तुम्हारे साथ समय का पता ही नहीं लगता था। कुछ साल बीते, और आ गई 16 नवंबर की वह शाम... जब एक बार फिर से तुम्हारी आंखों में आंसू दिखे... पर इस बार वे आंसू मेरे लिए नहीं थे... तुम्हारी आंखों में आंसू देखकर मैं तुम्हारे उस डर को समझ गया था।

तुम कहती थी ना कि कभी तुम्हारा नाम किसी को ना बताऊं... देखो इतने सालों तक मैं लोगों को गोल-गोल घुमाता रहा लेकिन कल यानी 16 नवंबर को एक बार फिर उसी शाम की बेरुखी में खो गया। छोटी बहन की मासूमियत ने मेरे बंद होठों को खुलने पर मजबूर कर ही दिया... उस शाम प्यार हारा था और कल प्यार से हार गया। बता दिया उसे तुम्हारा नाम लेकिन उसी वादे के साथ जो मैंने तुमसे किया था।

जब तुम इसे पढ़ रही होगी तो पता नहीं तुम्हें कैसा लगेगा... लेकिन मेरा विश्वास करो... जितना विश्वास तुम मुझ पर करती हो ना उतना ही मैं उस पर करता हूं... जैसे मैंने तुम्हारा विश्वास नहीं तोड़ा, वैसे ही वह भी मेरा विश्वास नहीं तोड़ेगी... पहली और शायद आखिरी इंसान है वो तुम्हारे नाम को जानने वाली....
#क्वीन

Wednesday, November 16, 2016

तुम्हारी बातें और मेरे स्वप्न

उन सूनसान राहों में बिना किसी परिभाषित रिश्ते के हम चलते रहते थे, हम अपने वे बातें एक-दूसरे को बताते थे जो हम किसी से नहीं कह पाते थे। उन बातों के दौरान मन में नए स्वप्न जन्म लेने लगे थे... कोई कमी, कोई बुराई नहीं थी तुममें... तुम्हारी हर एक अदा, तुम्हारी हर एक बात खूबी ही लगती थी... मैं जानता था कि मैं दिल में उसे बसा रहा हूं जो कभी मेरी जिंदगी में बस नहीं सकती। इस एक परिचित और शाश्वत डर के अलावा मेरे तब तक के जीवन में कोई डर नहीं था। 

रात के अंधेरे में अकेले बैठकर उस रिश्ते का नाम सोचता था जो हमारे बीच कभी बना ही नहीं था। उस अपरिभाषित रिश्ते को नाम देने की यात्रा में खो चुका था मैं... सच है कि तुम मेरी नहीं थी लेकिन इस सच के सहारे साथ बिताए गए पलों को स्वप्न मान लेना भी तो ठीक नहीं था। 

हमारी हर मुलाकात में होने वाली बातें हमारे एक होने का अहसास कराती थीं लेकिन जिस तरह से रेलगाड़ी के चलने के लिए दो पटरियों के बीच एक निश्चित दूरी का होना जरूरी होता है, उसी तरह से हमें हमारी जिन्दगी को नए आयाम देने के लिए एक दूरी बनाकर चलनी ही थी। अगर हम वह दूरी बनाकर न चलते तो हमारे सपने यथार्थ की पटरियों से उतर जाते.... तुम्हारे करीब आना गवारा नहीं था और बिछड़कर गुजारा भी नहीं था। हमारी मोहब्बत एक ऐसी मझधार में फंस चुकी थी जिसका कोई किनारा तक नहीं था। सब कुछ याद है मुझे... तुम्हारे साथ चलते वक्त पैरों में चुभे वे कांटे उन लम्हों को भूलने भी नहीं देते....

मैं जीतता तो मोहब्बत हार जाती

मैं टकटकी लगाए तुम्हारे दिल की गहराईयों से निकली वे बातें सुन रहा था। कभी तुम्हारी आंखे नम हो जाती थीं तो कभी उसी चेहरे पर मुस्कुराहट तैर जाती थी। तुम्हारी वे दिलकश बातें सुनकर बीच-बीच में मेरी भी आंखे नम हो जाती थीं। तुम जिस अन्दाज़ में अपना किस्सा सुना रही थी, वह मंजर मुझे देखा हुआ सा लगने लग रहा था। तुम तो सिर्फ मेरी कॉलेज फ्रेंड थी ना? फिर क्यूं मुझे वे सारी बातें सुनाती थी? क्यों अपने दर्द, अपनी खुशियों में मुझे शामिल करने की कोशिश करती थी? क्यों मेरे दर्द में मुझे सहारा देती थी, क्यों अपने दर्द में मेरे कंधे पर सिर रखकर रोती थी?

तुम्हारे इसी व्यवहार की वजह से रात-दिन, सुबह-शाम मैं बस तुम्हारे ही ख्याल में खोया रहता था। मैं हकीकत में क्या कर रहा हूं, इस सवाल का जवाब मैं खुद नहीं खोज पा रहा था। खाना खाने से लेकर पढ़ाई करने तक, मुझे कुछ ध्यान या याद नहीं रहता था। जो काम मुझे सबसे ज्यादा पसंद था, उसमें भी मन लगना बंद हो गया था। अपनी पसंद का खाना बोझ लगने लगा था। बस इतनी सी तमन्ना थी कि कॉलेज में किसी तरह तुम्हारी एक झलक दिख जाए। तुम्हारे गुलाबी होठों से अपने नाम को सुनने की तमन्ना रहती थी। 

पता नहीं कि तुम यह सब समझती भी थी या नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि इन सबके बीच मैं खुद से एक लड़ाई लड़ने लगा था। अपने आप से अपने अस्तित्व की लड़ाई... एक ऐसी लड़ाई जिसे मैं जीतना नहीं चाहता था... क्योंकि अगर उस लड़ाई में मैं जीत जाता तो मेरी मोहब्बत हार जाती और मैं मेरी नजरों के सामने अपनी मोहब्बत को हारते हुए नहीं देख सकता था... और देखो, उस हार का परिणाम क्या हुआ... अपने अस्तित्व की लड़ाई को हारने के बावजूद मैंने तुम्हारा अस्तित्व 'गढ़' दिया.... एक ऐसा अस्तित्व जिसका कभी विनाश नहीं हो सकता... एक ऐसा अस्तित्व जिसमें लोग अपनी मोहब्बत का अश्क देखते हैं....

तुम्हारी अजमाइश का भ्रमर जाल

एक बाग में एक फूल पर एक भंवरा और एक तितली दोनों एक साथ बैठते थे। कुछ समय बाद वे दोनों एक दूसरे से मोहब्बत करने लगे। वक्त के साथ उनकी मोहब्बत इतनी गहरी हो गई की अगर उनमें से एक को दूसरा दिखाई नहीं देता तो पहला बेचैन होने लगता था। एक दिन तितली ने भंवरे से कहा कि वह उ से जितना प्यार करती है, भंवरा उस से उतना प्यार नहीं करता। इस बात को लेकर दोनों में शर्त लग गयी कि जो ज्यादा प्यार करता है वह कल सुबह इस फूल पर पहले आकर बैठेगा। शाम को इस शर्त के साथ दोनों अपने अपने घर चले गए।

जबरदस्त ठण्ड होने के बावजूद भी अगले दिन सुबह जल्दी ही तितली फूल पर आकर बैठ गई। लेकिन भंवरा अभी तक नहीं आया था। तितली बहुत खुश थी क्योंकि वह शर्त जीत चुकी थी। कुछ देर बाद जैसे ही धूप से फूल खिला। तो तितली ने देखा कि भंवरा फूल के अन्दर मरा पड़ा है। (क्योंकि की वह शाम को घर गया ही नहीं था और रात को ठण्ड से मर गया)...

कुछ ऐसी ही कहानी हमारी भी थी। तुम मुझे अजमाती जा रही थी लेकिन तुम यह भूल गई कि मोहब्बत में अजमाने जैसा कुछ नहीं होता। तुम्हारी 'अजमाइश' के भ्रमर जाल में फंसा तो मैं था लेकिन हारी तुम थी... 

Friday, September 2, 2016

मेरे स्वप्नलोक की वास्तविकता

तुम बस मेरे स्वप्नों में ही मेरी थी। यह बात समझने में मुझे 3 साल लग गए।  क्या करता, तुम्हारे हर एक झूठ को सच मानकर उसी में जिए जा रहा था।

तुमको पता है मेरी ज़िन्दगी के हर एक हिस्से में , हर एक किस्से में बस तुम्हारी ही कल्पना तो बसती थी। लेकिन तुम्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मैं तो तुम्हारे लिए बस एक 'विकल्प' था। क्या करता मैं? क्या कर सकता था मैं?

अंत में तुम मजहबी बहाने बनाने लगी और मैं अपनी कल्पनाओं के समंदर में डूबने लगा। कल्पनाओं की अट्टालिका बनाने में मुझे कुछ वक़्त तो जरूर लगा लेकिन खुश हूँ कि उस अट्टालिका की नींव से लेकर अंतिम छोर तक तुम सिर्फ मेरी ही हो...

#क्वीन

उस दिन टूट गया था भ्रम

तुम्हारे साथ एक-एक पल बिताने का अहसास बेहद खास होता था। पहले तो ऐसा लगता था जैसे तुम भी मेरे साथ बिताए हर एक पल को दिल से जी लेना चाहती हो लेकिन बाद में महसूस हुआ कि यह मात्र मेरा भ्रम है। तुम्हारे प्रेम और समर्पण पर प्रश्नचिन्ह लगाने की क्षमता तो मुझमें नहीं है लेकिन ऐसा प्रारब्ध अवांछित था।

जीवन की सबसे आसान लड़ाई हार गया था मैं... और जानती हो दुःख यह नहीं है कि मैं वह लड़ाई हार गया बल्कि दुःख इस बात का है कि मैंने उस लड़ाई को लड़ा ही नहीं।तुमने अगर उस लड़ाई से पहले मेरा हाथ न छोड़ा होता तो मैं उस लड़ाई को लड़ जाता। और विश्वास मानो मैं वह लड़ाई जीत भी जाता। लेकिन जानता था बिना तुम्हारे उस जीत के मायने कुछ भी नहीं।

जब जंग अपनों से हो तो पीछे हट जाने में ही भलाई होती है और जब लड़ाई अपने आप से हो तो अपने अहंकार को कुचलकर विजय प्राप्त करने वाला ही तो पुरुषार्थी कहलाता है। तुम्हें हारकर खुद को जीत लिया था मैंने... लेकिन काश कि मैं तुमको भी जीत पाता... हमारी कहानी में इस काश की उपस्थिति कितनी अनिवार्य लगती है ना?
#क्वीन

सिर्फ 5 कदम की दूरी पर थी तुम

कभी कभी कुछ ऐसा ही जाता है जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती। अपने शहर से हजारों किलोमीटर दूर, समंदर के किनारे बने उस होटल से मंदिर से आने के बाद हम सब घूमने के लिए निकले। समंदर के किनारे जब मैं तुम्हारी मोहब्बत के स्वप्न में कैद था तब तुम अपने भाई के साथ मुझसे 5 कदम की दूरी पर बैठी थी। क्या तुम कल्पना कर सकती हो कि मैं उस समय कैसा महसूस कर रहा होऊंगा। जिस इंसान को मैं अपने स्वप्नों में भी कभी इतने पास नहीं ला पाया था, वह मेरे सामने था। तुम तो शायद मुझे जानती भी नहीं थी।

तुम्हारी एक-एक हरकत को देखते -देखते कब 3 घंटे बीत गए पता ही नहीं चला। और फिर जब तुम वहां से निकली तो मैं भी अपने भाई-बहन को जबरदस्ती वहां से चलने को कहने लगा। जिस होटल में मैं रुका था, तुम भी उसी के बाहर जाकर रुक गई, तुमने भी अपना डेरा वहीँ डाला था। और फिर अगले दिन तुम्हें 'नंदन-कानन' में देखा। फिर उसी शाम बीच पर....क्या कहता इसे? प्यार? नहीं...यह प्यार नहीं था... फिर क्या था?  ईश्वर की योजना... और कुछ नहीं कह सकते इसे....


उस दिन के 2 साल के बाद उसी बीच पर एक-दूसरे का हाथ थामकर समंदर के जल की निर्मलता और अपने प्रेम की पावनता के मधुर मिलन को महसूस करने के स्वप्न की अट्टालिका का ही तो निर्माण किया था हमने। पर एक सच यह भी है कि स्वप्नों की अट्टालिकाओं को ढहने में समय नहीं लगता....
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Tuesday, August 16, 2016

बहुत पसंद थी ना तुमको...

उस दिन तक मैं अपने दिल की बात तुमसे इसलिए नहीं कह पाया क्योंकि मुझे डर था कि कहीं तुम मुझे गलत न समझ लो। तुम पहली और आखिरी इंसान थी जिसके साथ अपने पूरे जीवन को व्यतीत करने का स्वप्न मैंने देखा था। तुम मेरे सामने आती थी तो ऐसा लगता था मानो किसी निपुण और पारंगत मूर्तिकार ने खुद अपने हाथों से किसी संगमरमर को तराश कर जीवित मूर्ति का निर्माण किया हो। तुमसे मिलने से पहले मेरे जीवन में कुछ खोखलापन सा था, एक अजीब सा खालीपन था, जिसे उसदिन तक मेरे अलावा किसी ने महसूस नहीं किया था। और जब तुमसे मुलाकात हुई तो सब बदल गया। तुम्हारे ख्यालों ने ही मेरी जिंदगी के खालीपन को भर दिया।

अपनी जुबान पर तो नियंत्रण रख सकता था लेकिन आंखों पर कैसे रखता? जिस एक चेहरे को देखने के लिए घंटों इंतजार करता था, उसके सामने आने के बाद कैसे अपनी आंखों को चुराता...तुम्हें पता लग ही गया कि मेरे दिल में क्या था...हमने एक-दूसरे से बात करने के लिए उस 'नॉवेल' का सहारा लिया... तुम जानती हो ना कि मुझे प्रेम कहानियां पढ़ने में कोई रुचि नहीं... लेकिन तुम्हें थी और इसीलिए मुझे इसका सहारा लेना पड़ा... तुम्हें दूसरों के द्वारा अंग्रेजी में लिखी गईं 'मनगढ़ंत' प्रेम कहानियां बहुत पसंद थीं ना...और देखो आज तुम्हारी 'सच्ची' प्रेम कहानी को सब पढ़ रहे हैं...सब पसंद कर रहे हैं...खास बात यह है कि इसे पढ़ने के बाद अब लोग यह कहने की स्थिति में नहीं है कि 'प्रेम कहानियां' सिर्फ आईआईटी या आईआईएम वाले ही लिख सकते हैं...
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Saturday, August 13, 2016

जिंदगी की कुछ मजबूरियां...

लोग कहते हैं कि "मुश्किल वक्त" दुनिया का सबसे बड़ा जादूगर होता है जो एक पल में आपके चाहने वालों के चेहरे से नकाब हटा देता है लेकिन तुम्हारे चेहरे से तो नकाब तब हटा जब मैं अपने मुश्किल दौर से बाहर निकल चुका था। मतलबी दुनिया में भी तुम मेरी बातों के मतलब को नहीं समझ पाई। तुम समझने की कोशिश करती भी कैसे आखिर तुम्हारी अपनी जिंदगी थी, तुम्हारे अपने सपने थे... तुम अपने सपनों को तोड़कर मेरी हमसफर कैसे बनती... तुम्हारे बदल जाने का मुझे कोई दुख नहीं लेकिन एक बार सोचकर देखो कि जिनके लिए तुम्हारी पहचान मैं था, उनसे नजरें कैसे मिलाऊं...

क्या उनसे यह कह दूं कि जिसके लिए मैं रोता हूं, वह किसी और को खुश रखने में व्यस्त है...खैर मैं बस इस बात से खुद को तसल्ली दे देता हूं कि "जिंदगी में कुछ मजबूरियां" मोहब्बत से ज्यादा ताकतवर होती हैं जिनकी वजह से ना चाहते हुए भी साथ छोड़ना ही पड़ता है। हम अपने रिश्तों के लिए वक़्त नहीं निकाल पा रहे थे और फिर वक़्त ने अपनी चाल चली और हमारे बीच से रिश्ता ही निकाल दिया। अगर कभी मौका मिला तो कुछ पल उन दिनों का ज़िक्र करेंगे, जब तुम मेरे और मैं तुम्हारा हुआ करता था....
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