मगर शायद हम दोनों की शाश्वत प्रेम की परिभाषाएँ अलग थीं। तुम उस रिश्ते में हर हद पार कर देना चाहती थीं और मैं हर रिश्ते की मर्यादा जानता था। मेरे लिए प्रेम सिर्फ़ पाने का नाम नहीं था, उसमें संयम था, सम्मान था और एक-दूसरे की सीमाओं का लिहाज़ भी था। मुझे लगता था कि किसी भी रिश्ते की सबसे मज़बूत डोर हाथों में नहीं, नज़रों में बसी इज़्ज़त और बोलने में रखा गया लिहाज़ होता है। जहाँ प्रेम हो, वहाँ अधिकार हो सकता है… मगर अनादर नहीं।
मैंने तुम्हें कभी बाँधकर नहीं रखना चाहा। मैं चाहता था कि तुम मेरे साथ रहो क्योंकि तुम्हारा मन हो, इसलिए नहीं कि तुम्हारे पास कोई दूसरा विकल्प न हो। शायद इसी वजह से मैंने रिश्ते में बहुत कुछ अनदेखा किया और बहुत कुछ चुपचाप होने दिया। क्योंकि रिश्ता बनाना हो तो तारीफ़ करना सीखना पड़ता है… सामने वाले की अच्छाइयों को देखना पड़ता है। लेकिन रिश्ता खत्म करना हो तो ‘सच’ बोलना सीखना पड़ता है। झूठे दिलासे और अधूरे बहाने किसी रिश्ते को ज़िंदा नहीं रखते, बस उसकी मृत्यु को थोड़ा लंबा कर देते हैं।
तुमने मुझे बहुत कुछ दिया… कुछ खूबसूरत यादें, कुछ बहुत गहरी बातें और कुछ ऐसे सबक, जिन्हें शायद कोई किताब कभी नहीं सिखा सकती थी। तुम्हारे साथ मैंने जाना कि ईमानदार कौन होता है। वही, जिसे बेईमानी का अवसर मिलने पर भी बेईमान होने का ख़याल न आए। और मैंने यह भी जाना कि कोई जाने या न जाने, कोई समझे या न समझे… हर इंसान की अंतरात्मा जानती है कि वह कहाँ सही था और कहाँ ग़लत। शायद हम दोनों भी जानते हैं।
किसी मोड़ पर मैंने तुम्हें समझने में देर की… और किसी मोड़ पर तुमने मुझे समझना छोड़ दिया। फिर भी तुम्हारे लिए मेरे मन में कोई द्वेष नहीं है। कुछ रिश्ते भले ही अपनी मंज़िल तक न पहुँचें, लेकिन वे हमें रास्ते पहचानना सिखा जाते हैं। और कुछ दोस्त… ज़िंदगी का वो रिश्ता होते हैं जिन्हें शायद ईश्वर परिवार की किसी कमी को पूरा करने के लिए भेजता है। ऐसे लोग खून के रिश्ते नहीं होते, मगर कई बार खून के रिश्तों से भी ज़्यादा अपने हो जाते हैं।
पता है! आज जब उन दिनों को याद करता हूँ तो लगता है, शायद हमारा साथ भी किसी बारिश की तरह था। बारिश के पानी का अपना कोई रंग नहीं होता… मगर बरसते ही फ़िज़ा को रंगीन बना देता है। तुम भी मेरी ज़िंदगी में कुछ ऐसी ही आई थीं। तुम्हारा अपना रंग शायद कोई अलग से पहचान न पाए, लेकिन तुम्हारे आने से मेरी दुनिया का रंग बदल गया था। और फिर एक दिन बारिश रुक गई। फ़िज़ा में रंग तो रह गए… मगर तुम नहीं रहीं।
मैं जानता था कि जहाँ आत्मीयता का प्रत्युत्तर न मिले और अस्तित्व का क्षरण एवं उपेक्षा होने लगे, वहाँ स्वयं को रोककर रखना स्वाभिमान का पराभव है; स्वविवेक से लिया गया निर्णय ही जीवन का सर्वाधिक हितकारी निर्णय सिद्ध होता है। तुम्हारी स्मृतियों से स्वयं को पृथक करने का वर्षों पुराना निर्णय भी उस समय भले ही कठिन लगा था, पर आज समझ आता है कि कुछ विरक्तियाँ भी जीवन के लिए वरदान होती हैं।
और शायद हमारी कहानी का प्राप्त भी यही है- कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने के लिए नहीं आते… वे हमें यह सिखाने आते हैं कि अपने पसंदीदा शख्स के बिना भी मुस्कुराना कैसे है।
#क्वीन
