उस दिन ज़िन्दगी ने हमें एक और अवसर दिया था। पर जब नियति प्रतिकूल हो, तब अवसर भी अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं। वे सामने होते हुए भी हाथ नहीं आते, और जब तक आपको उनके ‘अवसर’ होने की बात समझ में आती है, तब तक वे स्मृति बन जाते हैं। पता है, आज भी वह शाम आंखों के सामने जीवित खड़ी हो जाती है। केसरिया आसमान, तुम्हारी खामोशी, और मेरा असहाय ठहराव। सब कुछ वहीं का वहीं है, बस हम दोनों उस क्षण से बहुत आगे बढ़ चुके हैं, लेकिन वह क्षण मेरे भीतर तो आज भी ठहरा हुआ है।
उस पूरी शाम तुमने कुछ नहीं कहा, बस जाते-जाते पलटकर एक बार देखा था। शायद एक क्षण का दसवां हिस्सा रहा होगा। उस एक दृष्टि में कोई वादा नहीं था, कोई पश्चाताप नहीं था, बस इस बात की स्वीकार्यता थी कि जो हो रहा है, वही होना था और वही होगा। तुम्हारी आंखों में उस वक्त ज़रा-सी नमी थी, जिसे तुमने मुस्कान से छुपाने की कोशिश की, और वही कोशिश थी, जिसने मुझमें तुम्हारे प्रति ‘विश्वास’ को जीवित रखा था।
पता है! उस शाम अगर तुम अपने मौन का सहारा ना लिया होता और शब्दों से सब कह देती तो शायद सबकुछ आसान हो जाता, पर जो नहीं कहा गया, वही सबसे भारी बनकर रह गया। आज भी जब शाम उतरती है और आसमान वही धुंधला सा केसरिया रंग ओढ़ लेता है, तो तुम्हारा वही मौन, वही दृष्टि, और वह अधूरी मुस्कान मेरे भीतर कहीं फिर से जीवित हो उठती है।
लोग कहते हैं कि वक़्त बहुत कुछ बदल देता है, पर सच मानो, कुछ यादों को वक्त छू भी नहीं पाता। वह शाम भी उन्हीं में से एक है- जो बीत गई, पर मेरे भीतर से कभी गई नहीं।
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