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Tuesday, September 1, 2026

रक्षाबंधन से पहले वाला वो 'उपहार'

इस रक्षाबंधन, उस रक्षाबंधन की याद आ गई!

याद है ना तुम्हें!

रक्षाबंधन से पहले की उस शाम मैं तुम्हारे लिए एक छोटा-सा उपहार लेकर पूरे पाँच घंटे तक तुम्हारे घर के पड़ोस में खड़ा रहा था। तुमने बताया था कि तुम्हें अगले दिन अपने मामा जी के घर जाना है और फिर पता नहीं था कि हमारी अगली मुलाकात कब होगी। उस वक्त न संपर्क के लिए मेरे या तुम्हारे पास फोन थे, न ही यूँ ही तुम्हारे घर चले आने की कोई गुंजाइश। बस एक उम्मीद थी कि तुम हमारे उस ‘निश्चित समय’ पर बालकनी में तो आओगी! लेकिन उस दिन विधि ने कुछ और ही लिख रखा था।

तुमने कितनी बार मुझे हराया है… उस दिन भी तुम्हारे इंतज़ार में हारकर मैं वापस घर लौट आया और उस ‘उपहार’ को यूँ ही अलमारी में रख दिया। 19 दिन बाद लौटकर तुमने कितनी ही बार उसके बारे में पूछा, लेकिन मैंने कभी उसका ज़िक्र नहीं किया। जानती हो क्यों? क्योंकि कुछ उपहारों की उपयोगिता भी समय के साथ समाप्त हो जाती है। 

पता है! मैं जानता था कि उस दिन के बाद हमारे बीच मुलाकातों और बातों का एक लंबा अंतराल आने वाला है। और शायद तब तुम्हारे मन में उठने वाली बहुत-सी बातें ऐसी होंगी, जिन्हें तुम किसी से कह नहीं पाओगी। इसलिए मैं तुम्हारे लिए एक लॉकेबल डायरी लाया था। एक ऐसी डायरी, जिसमें तुम अपने मन की हर वो बात लिख पातीं, जो उस वक्त मुझसे कह पाने का अवसर नहीं था। सोचा था, जब कभी शब्द साथ न दें, तो कागज़ तुम्हारा हमराज़ बन जाएगा, और फिर कागजों के सहारे मैं।

वो डायरी आज भी मेरी अलमारी में रखी है। उसके पन्ने आज तक कोरे हैं, लेकिन उनमें एक पूरा समय दर्ज है, इंतज़ार का, अधूरी बातों का और मेरी उस उम्र की मासूम उम्मीदों का। कभी-कभी सोचता हूँ, अगर उस दिन तुम बालकनी में आ जातीं, तो शायद वह डायरी तुम्हारे पास होती और उसकी कहानी कुछ और होती। लेकिन शायद कुछ कहानियाँ पूरी होने के लिए नहीं, उम्र भर याद रहने के लिए लिखी जाती हैं।

और आज, इतने वर्षों बाद जब रक्षाबंधन आया है, तो उस भूले हुए उपहार से ज़्यादा वो पाँच घंटे याद आ गए, जब हाथ में एक छोटी-सी डायरी थी और मन में तुम्हारे आने की बहुत बड़ी उम्मीद।

#Queen #क्वीन