याद है ना तुम्हें!
उन दिनों तुम्हें देखने करने के लिए, तुमसे बातें करने के लिए किसी बड़े बहाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। बस ‘ऑरकुट’ खोलता था और तुम्हारा प्रोफाइल सामने आ जाता था, लगता था जैसे तुमसे थोड़ी-सी मुलाक़ात हो गई।
तुम्हारी स्क्रैपबुक में कुछ लिखने से पहले जाने कितनी बार सोचता था, क्या लिखूँ, कितना लिखूँ, कहीं मेरी बातों से तुम्हें मेरे मन की बात ‘हद से ज़्यादा’ समझ न आ जाए। फिर कुछ लिखकर देर तक अपने ही लिखे को देखता रहता था।
याहू मैसेंजर पर तुम्हारे ऑनलाइन आने का इंतज़ार तो जैसे रोज़ का एक ‘काम’ था। तुम्हारा नाम ऑनलाइन दिखता, तो दिल कुछ और तेज़ धड़कने लगता। “Hi” लिखता… फिर मिटा देता। “Hello” लिखता… फिर सोचता, ये भी बहुत साधारण है। और कई बार कुछ लिखे बिना ही तुम्हारे ऑफलाइन होने का इंतज़ार करता रह जाता था।
तुम अपनी डीपी बदलती थीं तो शायद कोई अनजान शक्ति थी जो मुझे बता देती थी, और मैं तुम्हें नए रूप में देखने तुरंत 20 रुपये घंटे देकर उस साइबर कैफे में अपने होने की सार्थकता सिद्ध करने पहुंच जाता था। तुम्हारे चेहरे में आई छोटी सी तब्दीली भी मेरे लिए खबर हुआ करती थी। वो सब आज याद करता हूँ तो हँसी भी आती है और उस उम्र की मासूमियत पर थोड़ा प्यार भी।
अजीब है ना… कुछ लोग इसलिए अकेले हो जाते हैं क्योंकि जिनसे भी मिलते हैं, उनके पास अपना थोड़ा-थोड़ा हिस्सा छोड़ते जाते हैं। मैंने भी शायद अपना बहुत कुछ तुम्हारे पास छोड़ दिया था, इसलिए तुम्हारे जाने के बाद भी बहुत दिनों तक लगता रहा कि तुम लौटोगी।
और शायद इसी झूठ को सच के रूप में स्वीकार करते-करते अकेलापन भी अपना हो गया। अकेले रहने और अकेला हो जाने में फ़र्क़ होता है। अकेले में सुकून मिलता है और अकेलेपन में आदमी अपने ही भीतर कहीं खो जाता है।
आज तुम्हें याद करता हूँ तो कोई शिकायत नहीं होती। बस कभी-कभी सोचता हूँ, अगर तुम उस पुराने ऑरकुट की स्क्रैपबुक में लौटकर एक बार “Hello” लिख देतीं, तो शायद मैं आज हम ‘अजनबी’ ना होते…
#Queen #क्वीन

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