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Wednesday, June 24, 2026

जिस दिन तुमने कहा था, "कभी छोड़कर मत जाना"

तुम्हें याद है वो दिन?
सर्दियों की हल्की धूप थी। कॉलेज के बाहर उस पुराने वाले पार्क में हम दोनों घंटों बैठे रहे थे। तुमने अपनी हथेलियाँ मेरी जैकेट की जेब में छिपा ली थीं और हँसते हुए कहा था, "तुम्हारे साथ वक़्त बहुत जल्दी भागता है।"
उस दिन मुझे पहली बार लगा था कि शायद दुनिया की सारी बेचैनियाँ तुम्हारे पास आकर ख़त्म हो जाती हैं।
हमने सड़क के किनारे वाले उस छोटे से ठेले से चाय पी थी। तुम्हारी आदत थी, चाय का पहला घूँट लेते ही आँखें बंद कर लेना। मैं तुम्हें देखता रहा था और तुमने मुस्कुरा कर पूछा था, "क्या देख रहे हो?" और मैं हर बार वही झूठ बोल देता-"कुछ नहीं।" 
सच तो यह था कि मैं उस चेहरे को याद कर लेना चाहता था, जिसे मैं उम्र भर देखना चाहता था।
शाम को जब हम लौट रहे थे, तुम अचानक रुक गई थीं। तुमने मेरा हाथ कसकर पकड़ा था और बेहद दबी आवाज में कहा था, "कभी मुझे 'दर्द' तो नहीं दोगे ना?"
मैंने हँसकर कहा था, "हम जैसे लोग अपनों की खुशी के लिए उनसे दूर चले जाते हैं, लेकिन उनके दुःख की वजह नहीं बनते।"
तुमने मेरी बात पर लगभग डाँटते हुए मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया था।
मुझे यक़ीन की हद तक गुमान था कि तुम मेरे सिवा किसी और की हो ही नहीं सकती। शायद प्रेम आदमी को अंधा नहीं, बहुत भरोसेमंद बना देता है।
फिर धीरे-धीरे तुम बदलने लगीं।
तुम्हारे पास वक़्त कम होने लगा, बातें छोटी होने लगीं, और बहाने लंबे। लेकिन अजीब बात है, तुमने कभी जाने की बात नहीं कही। तुमने बस इतना किया कि मुझे हर दिन थोड़ा-थोड़ा अकेला छोड़ती रहीं।
और मैं... मैं अपने हिस्से में बस तुम्हारा थोड़ा सा वक्त मांगता रहा। 
आज सोचता हूँ, देखता हूं, समझता हूं, उनकी बेबसी, जो किसी से अपने हिस्से का प्यार माँगते हैं, जबकि उसपर सिर्फ उनका ही हक होता है।
कभी-कभी कल्पना करता हूँ, अगर किसी दिन तुम मेरे सामने बैठो, बिल्कुल पास, तो क्या तुम मेरे भीतर उस आदमी को तलाशोगी, जो तुम्हें बिना किसी शर्त के चाहता था? क्या तुम्हें उस शख्स का एक छोटा सा हिस्सा भी मुझमें मिलेगा?
एक बात जानना चाहता हूँ...
उस दिन जब तुमने कहा था, "कभी छोड़कर मत जाना", क्या उस वक़्त भी तुम्हें मालूम था कि जाने के लिए तुम ही मुझे मजबूर कर दोगी?

Saturday, June 6, 2026

भरोसा...

वो शाम आज भी मेरे भीतर कहीं थमी सी है।
याद है तुम्हें? बारिश अभी-अभी थमी थी। सड़क किनारे चाय की उस छोटी-सी दुकान पर हम दोनों बैठे थे। हवा में मिट्टी की खुशबू थी और तुम्हारे बाल बार-बार चेहरे पर आ रहे थे। तुम उन्हें संभालते हुए मुस्कुरा रही थीं, और मैं तुम्हें देख रहा था। शायद उतनी शांति मैंने अपने जीवन में कभी महसूस नहीं की थी।
तुमने अचानक पूछा था, "अगर कभी मैं दूर चली गई तो?"
मैं हंस पड़ा था। उस वक्त तक मुझे लगता था कि कम से कम तुम तो दूर जाने के लिए नहीं, मेरे साथ चलने के लिए, हमेशा साथ रहने के लिए मिली हो। मैंने कहा था, "जीवन में लोग आते हैं, बहुत से जाते हैं, लेकिन खास वही होते हैं, जो आख़िर तक साथ रहते हैं।" तुम कुछ पल चुप रही, फिर मुस्कुराकर मेरी तरफ देखा। उस मुस्कान में मुझे कुटिलता नहीं दिखी थी, या फिर शायद मैं उसे देखना ही नहीं चाहता था।
उस दिन हमने बहुत सारी बातें की थीं। रिश्तों की, भरोसे की, लोगों की। तुमने मेरे गले का रुद्राक्ष देखते हुए कहा था, "एकमुखी रुद्राक्ष बहुत मुश्किल से मिलता है ना?"
मैंने जवाब दिया था, "हां, और एकमुखी इंसान भी।"
तुम हंस दी थीं। मैं भी हंस दिया था। मगर आज सोचता हूं, शायद उस वाक्य में हमारा भविष्य छिपा हुआ था।
समय बीतता गया। हालात बदले। या शायद खराब हुए... संभाल सकता था मैं उसे लेकिन देखना चाहता था कि तुम उन हालातों को संभालने में मेरा हाथ थामने आती भी हो या नहीं! उस दौर में बहुत से लोग चले गए। कुछ चुपचाप, कुछ बहाने बनाकर।
और तुम...
तुम तो उस धन्यभागी के लिए हुलास सा सर्वाधिक सुलभ माध्यम बनी हुई थीं। हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं हुआ था। कोई नाटकीय तथाकथित 'ब्रेकअप' भी नहीं हुआ था। बस एक चाय भर की दूरियां बढ़ गई थीं।
आज इतने साल बीतने के बाद भी अक्सर बारिश के मौसम में मैं उसी चाय की दुकान, उसी शाम और उसी सवाल तक लौट जाता हूं।
वहां बैठकर सोचता हूं... कि क्या तुम्हें वो शाम याद आती होगी?
क्या तुम्हें वो चाय, वो भरोसा, वो सपने याद आते होंगे जो हमने साथ मिलकर देखे थे? या फिर मैं ही उन यादों का आखिरी पहरेदार बचा हूं?