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Tuesday, August 18, 2026

मेरे वो मासूम बहाने और तुम

याद है ना तुम्हें! क्या हसीन दिन थे वो… तुम्हारी एक झलक पाने के लिए कितने बहाने बनाने होते थे। तुम क्लास में अकाउंट्स पढ़ रही होती थीं और मैं तुम्हारे अकाउंट्स के टीचर से मैथ्य की प्रॉब्लम्स समझने आ जाता था। और सबसे मज़ेदार तो वो था…
तुम अपनी उस दोस्त के साथ बैठकर रमज़ान के उस महीने में गुफ़्तगू कर रही थीं और मैंने आकर तुम्हारी उसी दोस्त से हिंदी की कॉपी माँग ली। तुम्हारे इश्क़ में मैं तो ये तक भूल गया था कि हिंदी तो उसका विषय ही नहीं है। 117 लोगों की साइंस क्लास में 80 से ज़्यादा स्टूडेंट्स ने हिंदी ले रखी थी और मैं हिंदी की कॉपी माँगने कॉमर्स में पढ़ने वाली एक लड़की के पास चला गया था… उस विषय की कॉपी, जिसमें मेरा काम हमेशा कम से कम दो चैप्टर आगे चलता था।
आज सोचता हूँ तो हँसी आती है खुद पर। कितना मासूम था वो इश्क़…
तुम्हें देखने के लिए बहाने चाहिए होते थे, तुमसे बात करने के लिए बेवजह की वजहें और तुम्हारे आसपास कुछ देर रहने के लिए एक परफेक्ट प्लानिंग। तुम्हें शायद अंदाज़ा भी नहीं था कि तुम्हारी एक छोटी-सी मुस्कान मेरे पूरे दिन का मूड बदल देती थी। तुम्हारा एक बार मेरी तरफ़ देख लेना ऐसा लगता था जैसे दिन भर की सारी थकान कहीं चली गई हो।
और अगर तुमने बात कर ली…
तो फिर क्या ही कहने!
उस एक बातचीत को मैं पूरे दिन याद करता था। जब दिल किसी से लग जाता है तो अक्सर ऐसा ही होता है, सामने वाला कुछ नहीं कहता, फिर भी हमें बहुत कुछ सुनाई देता है।
वो दिन भी क्या दिन थे…न कोई उम्मीद बड़ी थी, न कोई शिकायत। बस तुम थीं और तुम्हें देखने में मिलने वाली एक छोटी-सी खुशी। फिर धीरे-धीरे वही छोटी-सी खुशी मेरी सबसे बड़ी ज़रूरत बन गई। मैंने तुम्हें कभी पाना नहीं चाहा था। मैं बस चाहता था कि तुम खुश रहो। तुम्हारे भीतर जो दर्द है, तुम उसे किसी के साथ बाँट सको। क्योंकि मैं समझता हूँ, जानता हूँ कि दर्द बाँटने से उसका बोझ कम होता है और शायद उसी से खुशी के लिए थोड़ी जगह बनती है। मैं चाहता था कि अगर मेरी उपस्थिति से तुम्हें सुकून मिलता है, तो मैं ठहरूँ। और विश्वास मानो! मैंने पहले ही तय कर लिया था कि अगर मेरी अनुपस्थिति से तुम्हारा जीवन थोड़ा भी आसान हो सकता है, तो मैं चुपचाप चला जाऊँगा। और देखो ना! चला भी गया मैं। 
पता है! मोहब्बत का मतलब हमेशा किसी को अपने पास रखना नहीं होता। कभी-कभी मोहब्बत का सबसे कठिन रूप होता है, किसी को उसकी खुशी के लिए आज़ाद कर देना। लेकिन इंसान भी कितना अजीब है ना? जिस चीज़ को छोड़ने का फैसला हम समझदारी से करते हैं, दिल उसे छोड़ने के लिए तैयार ही नहीं होता। हम बहुत कोशिश करते हैं। बहुत समझाते हैं खुद को। बहुत सारे तर्क देते हैं। कभी कहते हैं, “अब नहीं।” कभी कहते हैं, “बहुत हो गया।” कभी खुद से वादा करते हैं कि अब पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। फिर हम थककर वो सब होने देते हैं, जिसे रोकने के लिए हमने अपना सारा सुकून दाँव पर लगाया होता है।
मैंने भी बहुत कोशिश की। तुम्हारे बिना जीने के कई तरीके सोचे। सोचा, खुद को काम में व्यस्त रखूँगा। सोचा, तुम्हारी याद आने पर कोई और बात सोचूँगा। सोचा, तुम्हारी तस्वीरें नहीं देखूँगा। सोचा, तुम्हारे बारे में पूछूँगा भी नहीं। लेकिन हर तरीके में तुम्हारी कमी पहले से ज़्यादा मिली। तब समझ आया कि किसी इंसान को भूलने का कोई तय तरीका नहीं होता।
कुछ लोग यादों से नहीं जाते। वो हमारे स्वभाव में रह जाते हैं। हमारी आदतों में। हमारी खामोशियों में। हमारे अकेलेपन में। और कभी-कभी तो हमारी मुस्कुराहट में भी।
मैंने सुना था! लोग कहते हैं, समय बहुत कीमती होता है। सही कहते हैं। लेकिन उस वक्त से भी कीमती कुछ होता है… समय से भी महंगी होती हैं भावनाएँ। इसलिए उन्हें वहीं खर्च करना चाहिए, जो उनकी कीमत समझ सके। क्योंकि समय चला जाए तो शायद वापस मिल जाए… लेकिन गलत जगह खर्च की गई भावनाएँ इंसान को भीतर से बहुत खाली कर जाती हैं।
मैंने भी बहुत कुछ कहा। बहुत कुछ समझाने की कोशिश की। बहुत बार अपनी खामोशी तोड़ी। और हर बार बाद में लगा कि शायद चुप रहना बेहतर होता, लेकिन हर बार ये मुझे बोलने के बाद समझ आया।
पर क्या करूँ?
तुम्हारे सामने होते ही मन करता है कि जो कुछ भी मन में है, सब बोल दूँ। ये न सोचूँ कि मेरे इतना कहने से तुम क्या सोचोगी। न ये सोचूँ कि मेरी बात तुम्हें अच्छी लगेगी या नहीं। बस बोलता रहूँ… क्योंकि तुम्हारे सामने आते ही मेरी सारी समझदारी कहीं पीछे छूट जाती है। वही पुराना लड़का वापस आ जाता है… जो हिंदी की कॉपी माँगने कॉमर्स की लड़की के पास चला गया था। वही लड़का, जिसे तुम्हारी एक झलक के लिए पूरी दुनिया बेवकूफ़ी लगती थी, लेकिन अपनी बेवकूफ़ियाँ बहुत खूबसूरत लगती थीं। शायद यही वजह है कि आज भी तुम्हारे सामने मैं अपने सबसे सच्चे रूप में होता हूँ।
तुमने मुझे बहुत कुछ सिखाया। बात करना। परेशान होने पर भी मुस्कुराते रहना। इंतज़ार करना। खामोशी समझना। और सबसे मुश्किल… छोड़ देना।
अब लौट रहा हूँ अपनी जिंदगी में वापस। कोशिश यही रहेगी कि अब किसी के बहकावे में न आऊँ। अपने रास्ते पर चलूँ। अपने सपनों को फिर से उठाऊँ। जो खो गया, उसे स्वीकार करूँ। और जो बचा है, उसे संभालूँ। तुम्हारे लिए कोई शिकायत नहीं है।
शायद कुछ रिश्तों का मुकम्मल होना उनके साथ रहने में नहीं, बल्कि उन्हें खूबसूरत याद बनाकर अपने भीतर बचाए रखने में होता है।और अगर कभी अचानक तुम्हें उन दिनों की याद आए… तो उस लड़के को ज़रूर याद करना, जो तुम्हें देखने के लिए बहाने बनाया करता था। जो तुम्हारी दोस्त से हिंदी की कॉपी माँगने पहुँच गया था। जो 500 किलोमीटर की दूरी को भी तुम्हारे लिए छोटा समझता था। जो तुम्हें पाना नहीं चाहता था… बस तुम्हें खुश देखना चाहता था। 

और हाँ… अगर कभी उस लड़के से पूछना कि उसने इतना सब क्यों किया था… तो शायद वो मुस्कुराकर सिर्फ इतना कहेगा-  “मैंने उस दिन अपने दिल में रहने वाले भगवान की सुनी थी…” “लेकिन तुमने तो मेरे भगवान को भी हरा दिया।”

तुम तक पहुँचने की आख़िरी कोशिश

याद है तुम्हें वो दिन!
500 किलोमीटर दूर था तुमसे… अगले दिन परीक्षा की तैयारी चल रही थी… ना बात हो रही थी और ना ही तुम्हारा चेहरा दिख रहा था। पता नहीं क्यों, लेकिन उस दिन दिल ने कहा कि मेरा तुम्हारे साथ होना ज़्यादा ज़रूरी है। दिल कह रहा था, बस तुम पास रहो। लेकिन दिमाग कह रहा था, नहीं! परीक्षा ज़रूरी है, करियर ज़रूरी है।

क्या फैसला करता मैं?
पता है! मुझे हमेशा पढ़ाया गया था कि जब किसी फैसले को लेने में कठिनाई आए, तो अपने दिल की सुनो, क्योंकि दिल में भगवान रहते हैं और भगवान कभी गलत रास्ता नहीं दिखाते। मैंने भी उस दिन भगवान की बात सुनी… और आ गया उस शहर में, जहाँ तुम थीं।
बिल्कुल वैसे ही, जैसे पहली बार तुम्हें देखते वक्त दिल ने कहा था, “तुमसे बात कर सकता हूं।” बिल्कुल वैसे ही, जैसे पहली बार तुम्हारे साथ अकेले होते हुए भी दिल के कहने पर वो सब कह डाला था, जो शायद मैंने कभी किसी से नहीं कहा था।
शायद दोस्ती की शुरुआत भी ऐसे ही होती है… बिना किसी योजना के, बिना किसी वादे के और बिना किसी शर्त के।
तुम हमेशा कहा करती थीं ना, “हमारे साथ होने में कभी कोई शर्त नहीं आएगी, बस तुम साथ रहना।”
मुझे भी बस तुम्हारा साथ चाहिए था। तुम्हारी आवाज़, तुम्हारी बातें, तुम्हारा मेरे पास होना… इतना ही काफी था।
किसी रिश्ते को बचाने के लिए अगर बार-बार खुद को समझाना पड़े कि शायद सामने वाला व्यस्त है, शायद उसे समय नहीं मिल रहा, शायद परिस्थितियां ठीक नहीं हैं… तो एक दिन इंसान सामने वाले से नहीं, खुद से सवाल करने लगता है, “क्या सच में मेरी कोई अहमियत है?”
और शायद रिश्तों की सबसे तकलीफदेह बात यही होती है, जब सामने वाला दूर नहीं जाता, लेकिन पहले जैसा पास भी नहीं रहता। तुम मेरे साथ थीं… फिर भी कहीं बहुत दूर होती जा रही थीं। मैं हर बार तुम्हारे पास आने की कोशिश करता रहा। तुम्हारी चुप्पियों को समझने की कोशिश करता रहा। तुम्हारे बदलते व्यवहार के पीछे वजह तलाशता रहा। कभी खुद को दोष दिया, कभी हालात को… लेकिन तुम्हें कभी दोष नहीं दिया। क्योंकि जिसे हम सच में समझने का दावा करते हैं, उसे कटघरे में खड़ा करना हमें आता ही नहीं।क्योंकि जो समझ सकता है, वही संभाल सकता है, वक़्त भी, हालात भी और रिश्ता भी।
मैं चाहता था कि तुम मुझे समझो। मेरे शब्दों से ज्यादा मेरी खामोशी को समझो। मेरे मिलने की ज़िद से ज्यादा उसके पीछे छिपी बेचैनी को समझो, तुम्हारे खुद के लिए तुमसे मिलने की जरूरत को समझो। लेकिन शायद हर रिश्ता दोनों तरफ से एक जैसा नहीं समझा जाता। और फिर एक दिन मुझे यह भी समझ आया कि रिश्तों में जबरदस्ती अच्छी नहीं होती। जिसे जहाँ सुकून मिलता है, उसे वहीं छोड़ देना चाहिए। किसी को अपने पास रोककर रखा जा सकता है, लेकिन उसके दिल को नहीं।
किसी को अपनी जिंदगी में रहने के लिए मनाया जा सकता है, लेकिन उसके मन में रहने के लिए नहीं। और शायद इस रिश्ते की सबसे खूबसूरत बात यही है कि उसमें अधिकार से ज्यादा आज़ादी होती है। मैं तुम्हें बुलाना चाहता था… लेकिन तुम्हारी खुशी के आगे अपनी इच्छा को छोटा करना सीख गया। मैं चाहता था कि तुम मेरे साथ रहो… लेकिन....
कभी-कभी हम किसी इंसान को खोने से नहीं डरते… हम उस एहसास को खोने से डरते हैं, जो उसके साथ रहते हुए हमें मिलता है।तुम्हारे साथ मुझे वही सुकून मिलता था। और शायद इसलिए तुम्हारे साथ बिताए गए वो कुछ एक पल मेरे लिए बहुत कीमती थे।इसके साथ एक शाश्वत सत्य और भी है कि जिसके साथ असली सुकून मिलता है, उसके साथ अक्सर वक़्त कम मिलता है। काश! वक़्त को भी रिश्तों की तरह समझाया जा सकता। काश! उससे कहा जा सकता कि थोड़ा ठहर जा… अभी कुछ बातें बाकी हैं। कुछ मुलाकातें अधूरी हैं। कुछ सपने अधूरे हैं। कुछ वादे अधूरे हैं। कुछ बातें ऐसी हैं, जो कहनी थीं लेकिन रह गईं। लेकिन एक सच और भी है कि वक़्त कभी किसी के लिए नहीं रुकता।
इसलिए मैंने एक दिन खुद से कहा,  अगर कल दूर होना तय ही है, तो फिर क्यों न आज को अच्छे से जी लिया जाए? क्यों न जब तक साथ हैं, तब तक बिना किसी शिकायत के साथ रहा जाए? क्यों न हर मुलाकात को आखिरी मुलाकात समझकर जी लिया जाए? क्यों न हर हंसी को याद बना लिया जाए? क्यों न हर छोटी-सी बात को दिल में रख लिया जाए?
मैं उन तीन दिनों में यही करने की कोशिश कर रहा था?
तुम्हारी बातें, तुम्हारी हंसी, तुम्हारा चुप हो जाना… सब कुछ समेटकर अपनी यादों में बसा लेना चाहता था... लेकिन.... और इस लेकिन पर आते-आते कई कहानियां चरित्रहीन हो जाती हैं...
#क्वीन