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Friday, September 4, 2026

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, तुम और कन्हैया पर विश्वास

याद है ना तुम्हें वह जन्माष्टमी…

उस दिन तुमसे बात नहीं हो पाई थी।

आज इतने वर्षों बाद उस दिन को याद करता हूँ तो लगता है, कुछ दिन जीवन में घटित नहीं होते, वे भीतर कहीं प्रतिष्ठित हो जाते हैं। समय उन्हें पीछे छोड़ आता है, पर स्मृति उन्हें आपके मस्तिष्क में वहीं रोक देती है, जहाँ मन ने पहली बार किसी भाव को उसकी संपूर्ण निष्कपटता में अनुभव किया था।

तुम्हारे घर का वही एकलौता मोबाइल नंबर था, रिलाइंस का CDMA, बिना सिम वाला फोन।
उस नंबर को किसी PCO से लगाने से पहले ही मन में जाने कितने संशय, संकोच और आशंकाओं का कोलाहल उठ खड़ा होता था। भय यह नहीं था कि तुमसे बात नहीं होगी; भय यह था कि किसी और ने फोन उठाया तो क्या बोलूंगा? घर में एक लड़की के होते हुए, ऐसे कॉल्स शोभा तो नहीं देते ना!

और उसी उधेड़बुन में मैंने आइडिया का दस रुपये वाला टॉप-अप स्क्रैच किया था।

दस रुपये! आज के समय में शायद कुछ भी नहीं, पर उस समय उन 10 रुपयों के लिए बहुत प्रयास करने पड़ते थे। उसमें छह या सात रुपये ही मिले होंगे। लेकिन उस समय वे छह-सात रुपये मेरे लिए जैसे किसी दुर्लभ निधि से कम नहीं थे। अपने घर के नंबर से हर 15 मिनट पर एक ब्लैंक मैसेज, कि शायद तुम मैसेज देखकर एक बार मिस कॉल करो, और मैं 2 रुपये प्रति मिनट वाली कॉल से बचकर किसी कॉइन बॉक्स पीसीओ में जाकर तुमसे बात कर पाऊं।

पता है! उस मैसेज को भेजने में भी एक डर था कि कहीं कोई और ‘आलम’ नाम से आ रहे उन ब्लैंक मैसेजेज को देख ना ले! लेकिन उस भय के ऊपर एक और चीज़ थी, एक विचित्र, अबोध और आज की दृष्टि से लगभग हास्यास्पद-सा विश्वास।

मन कहता था- 

आज कैसे कोई देख लेगा?
आज तो जन्माष्टमी है।

आज उस पुरुषोत्तम का जन्मदिवस है, जिसे संसार ने प्रेम का सबसे विराट प्रतीक माना है। आज तो स्वयं कृष्ण की जन्मतिथि है। प्रेम के देवता के जन्मोत्सव पर भेजे गए मेरा ये ‘कोरे’ संदेश भला किसी अनिष्ट के भागी कैसे होंगे?

मुझे सचमुच लगता था कि वे रक्षा करेंगे।

मेरे ‘रिक्त’ शब्दों की भी।
तुम्हारी मर्यादा की भी।
और उस अल्पवयस्क, अबोध प्रेम की भी, जिसे संसार की दृष्टि से अधिक तुम्हारे होने भर की आवश्यकता थी।

उस दिन तुमसे बात नहीं हो पाई थी।
कितनी साधारण-सी बात है यह, दो लोग ‘कथित’ तौर पर प्रेम करते थे और एक दिन उनकी बात नहीं हो सकी। लेकिन स्मृति में वही तुम्हारी छोटी-सी अनुपस्थिति आज एक पूरा दर्शन बन गई है। क्योंकि उस दिन पहली बार समझ आया था कि प्रेम केवल संवाद नहीं है; कभी-कभी संवाद के अभाव में भी जो विश्वास अक्षुण्ण रहता है, वही प्रेम का वास्तविक स्वरूप होता है।

आज उस जन्माष्टमी को स्मरण करता हूँ तो उस दस रुपये के टॉप-अप की याद भी आ जाती है। 

धन अल्प था, अभिलाषा अनंत।
साधन क्षुद्र था, भावना विराट।
और उम्र छोटी थी, पर विश्वास….न जाने क्यों…बहुत बड़ा… बहुत ही बड़ा…

#क्वीन #Queen

ऑरकुट की वो स्क्रैपबुक

 याद है ना तुम्हें!

उन दिनों तुम्हें देखने करने के लिए, तुमसे बातें करने के लिए किसी बड़े बहाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। बस ‘ऑरकुट’ खोलता था और तुम्हारा प्रोफाइल सामने आ जाता था, लगता था जैसे तुमसे थोड़ी-सी मुलाक़ात हो गई।

तुम्हारी स्क्रैपबुक में कुछ लिखने से पहले जाने कितनी बार सोचता था, क्या लिखूँ, कितना लिखूँ, कहीं मेरी बातों से तुम्हें मेरे मन की बात ‘हद से ज़्यादा’ समझ न आ जाए। फिर कुछ लिखकर देर तक अपने ही लिखे को देखता रहता था।

याहू मैसेंजर पर तुम्हारे ऑनलाइन आने का इंतज़ार तो जैसे रोज़ का एक ‘काम’ था। तुम्हारा नाम ऑनलाइन दिखता, तो दिल कुछ और तेज़ धड़कने लगता। “Hi” लिखता… फिर मिटा देता। “Hello” लिखता… फिर सोचता, ये भी बहुत साधारण है। और कई बार कुछ लिखे बिना ही तुम्हारे ऑफलाइन होने का इंतज़ार करता रह जाता था।

तुम अपनी डीपी बदलती थीं तो शायद कोई अनजान शक्ति थी जो मुझे बता देती थी, और मैं तुम्हें नए रूप में देखने तुरंत 20 रुपये घंटे देकर उस साइबर कैफे में अपने होने की सार्थकता सिद्ध करने पहुंच जाता था। तुम्हारे चेहरे में आई छोटी सी तब्दीली भी मेरे लिए खबर हुआ करती थी। वो सब आज याद करता हूँ तो हँसी भी आती है और उस उम्र की मासूमियत पर थोड़ा प्यार भी। 

अजीब है ना… कुछ लोग इसलिए अकेले हो जाते हैं क्योंकि जिनसे भी मिलते हैं, उनके पास अपना थोड़ा-थोड़ा हिस्सा छोड़ते जाते हैं। मैंने भी शायद अपना बहुत कुछ तुम्हारे पास छोड़ दिया था, इसलिए तुम्हारे जाने के बाद भी बहुत दिनों तक लगता रहा कि तुम लौटोगी।

और शायद इसी झूठ को सच के रूप में स्वीकार करते-करते अकेलापन भी अपना हो गया। अकेले रहने और अकेला हो जाने में फ़र्क़ होता है। अकेले में सुकून मिलता है और अकेलेपन में आदमी अपने ही भीतर कहीं खो जाता है।

आज तुम्हें याद करता हूँ तो कोई शिकायत नहीं होती। बस कभी-कभी सोचता हूँ, अगर तुम उस पुराने ऑरकुट की स्क्रैपबुक में लौटकर एक बार “Hello” लिख देतीं, तो शायद मैं आज हम ‘अजनबी’ ना होते…

#Queen #क्वीन


Tuesday, September 1, 2026

रक्षाबंधन से पहले वाला वो 'उपहार'

इस रक्षाबंधन, उस रक्षाबंधन की याद आ गई!

याद है ना तुम्हें!

रक्षाबंधन से पहले की उस शाम मैं तुम्हारे लिए एक छोटा-सा उपहार लेकर पूरे पाँच घंटे तक तुम्हारे घर के पड़ोस में खड़ा रहा था। तुमने बताया था कि तुम्हें अगले दिन अपने मामा जी के घर जाना है और फिर पता नहीं था कि हमारी अगली मुलाकात कब होगी। उस वक्त न संपर्क के लिए मेरे या तुम्हारे पास फोन थे, न ही यूँ ही तुम्हारे घर चले आने की कोई गुंजाइश। बस एक उम्मीद थी कि तुम हमारे उस ‘निश्चित समय’ पर बालकनी में तो आओगी! लेकिन उस दिन विधि ने कुछ और ही लिख रखा था।

तुमने कितनी बार मुझे हराया है… उस दिन भी तुम्हारे इंतज़ार में हारकर मैं वापस घर लौट आया और उस ‘उपहार’ को यूँ ही अलमारी में रख दिया। 19 दिन बाद लौटकर तुमने कितनी ही बार उसके बारे में पूछा, लेकिन मैंने कभी उसका ज़िक्र नहीं किया। जानती हो क्यों? क्योंकि कुछ उपहारों की उपयोगिता भी समय के साथ समाप्त हो जाती है। 

पता है! मैं जानता था कि उस दिन के बाद हमारे बीच मुलाकातों और बातों का एक लंबा अंतराल आने वाला है। और शायद तब तुम्हारे मन में उठने वाली बहुत-सी बातें ऐसी होंगी, जिन्हें तुम किसी से कह नहीं पाओगी। इसलिए मैं तुम्हारे लिए एक लॉकेबल डायरी लाया था। एक ऐसी डायरी, जिसमें तुम अपने मन की हर वो बात लिख पातीं, जो उस वक्त मुझसे कह पाने का अवसर नहीं था। सोचा था, जब कभी शब्द साथ न दें, तो कागज़ तुम्हारा हमराज़ बन जाएगा, और फिर कागजों के सहारे मैं।

वो डायरी आज भी मेरी अलमारी में रखी है। उसके पन्ने आज तक कोरे हैं, लेकिन उनमें एक पूरा समय दर्ज है, इंतज़ार का, अधूरी बातों का और मेरी उस उम्र की मासूम उम्मीदों का। कभी-कभी सोचता हूँ, अगर उस दिन तुम बालकनी में आ जातीं, तो शायद वह डायरी तुम्हारे पास होती और उसकी कहानी कुछ और होती। लेकिन शायद कुछ कहानियाँ पूरी होने के लिए नहीं, उम्र भर याद रहने के लिए लिखी जाती हैं।

और आज, इतने वर्षों बाद जब रक्षाबंधन आया है, तो उस भूले हुए उपहार से ज़्यादा वो पाँच घंटे याद आ गए, जब हाथ में एक छोटी-सी डायरी थी और मन में तुम्हारे आने की बहुत बड़ी उम्मीद।

#Queen #क्वीन

Friday, August 21, 2026

तुम्हारे जाने के बाद जो बचा, वह आत्मसम्मान था

 याद है ना तुम्हें! बहुत खुश थी तुम उस दिन… बिल्कुल एक बच्चे की तरह। तुम्हारी आँखों में एक अजीब-सी चमक थी, जैसे तुम बस मेरा ही इंतज़ार कर रही थीं अपनी ज़िंदगी में। तुम्हारे चेहरे की वो मुस्कान देखकर मुझे भी यक़ीन हो गया था कि शायद मुझे वो शख़्स मिल गया है, जिसके सामने मुझे कुछ बनने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी… जिसके सामने मैं वैसा ही रह सकता हूँ, जैसा मैं हूँ।

मगर शायद हम दोनों की शाश्वत प्रेम की परिभाषाएँ अलग थीं। तुम उस रिश्ते में हर हद पार कर देना चाहती थीं और मैं हर रिश्ते की मर्यादा जानता था। मेरे लिए प्रेम सिर्फ़ पाने का नाम नहीं था, उसमें संयम था, सम्मान था और एक-दूसरे की सीमाओं का लिहाज़ भी था। मुझे लगता था कि किसी भी रिश्ते की सबसे मज़बूत डोर हाथों में नहीं, नज़रों में बसी इज़्ज़त और बोलने में रखा गया लिहाज़ होता है। जहाँ प्रेम हो, वहाँ अधिकार हो सकता है… मगर अनादर नहीं।

मैंने तुम्हें कभी बाँधकर नहीं रखना चाहा। मैं चाहता था कि तुम मेरे साथ रहो क्योंकि तुम्हारा मन हो, इसलिए नहीं कि तुम्हारे पास कोई दूसरा विकल्प न हो। शायद इसी वजह से मैंने रिश्ते में बहुत कुछ अनदेखा किया और बहुत कुछ चुपचाप होने दिया। क्योंकि रिश्ता बनाना हो तो तारीफ़ करना सीखना पड़ता है… सामने वाले की अच्छाइयों को देखना पड़ता है। लेकिन रिश्ता खत्म करना हो तो ‘सच’ बोलना सीखना पड़ता है। झूठे दिलासे और अधूरे बहाने किसी रिश्ते को ज़िंदा नहीं रखते, बस उसकी मृत्यु को थोड़ा लंबा कर देते हैं।

तुमने मुझे बहुत कुछ दिया… कुछ खूबसूरत यादें, कुछ बहुत गहरी बातें और कुछ ऐसे सबक, जिन्हें शायद कोई किताब कभी नहीं सिखा सकती थी। तुम्हारे साथ मैंने जाना कि ईमानदार कौन होता है। वही, जिसे बेईमानी का अवसर मिलने पर भी बेईमान होने का ख़याल न आए। और मैंने यह भी जाना कि कोई जाने या न जाने, कोई समझे या न समझे… हर इंसान की अंतरात्मा जानती है कि वह कहाँ सही था और कहाँ ग़लत। शायद हम दोनों भी जानते हैं।

किसी मोड़ पर मैंने तुम्हें समझने में देर की… और किसी मोड़ पर तुमने मुझे समझना छोड़ दिया। फिर भी तुम्हारे लिए मेरे मन में कोई द्वेष नहीं है। कुछ रिश्ते भले ही अपनी मंज़िल तक न पहुँचें, लेकिन वे हमें रास्ते पहचानना सिखा जाते हैं। और कुछ दोस्त… ज़िंदगी का वो रिश्ता होते हैं जिन्हें शायद ईश्वर परिवार की किसी कमी को पूरा करने के लिए भेजता है। ऐसे लोग खून के रिश्ते नहीं होते, मगर कई बार खून के रिश्तों से भी ज़्यादा अपने हो जाते हैं।

पता है! आज जब उन दिनों को याद करता हूँ तो लगता है, शायद हमारा साथ भी किसी बारिश की तरह था। बारिश के पानी का अपना कोई रंग नहीं होता… मगर बरसते ही फ़िज़ा को रंगीन बना देता है। तुम भी मेरी ज़िंदगी में कुछ ऐसी ही आई थीं। तुम्हारा अपना रंग शायद कोई अलग से पहचान न पाए, लेकिन तुम्हारे आने से मेरी दुनिया का रंग बदल गया था। और फिर एक दिन बारिश रुक गई। फ़िज़ा में रंग तो रह गए… मगर तुम नहीं रहीं।

मैं जानता था कि जहाँ आत्मीयता का प्रत्युत्तर न मिले और अस्तित्व का क्षरण एवं उपेक्षा होने लगे, वहाँ स्वयं को रोककर रखना स्वाभिमान का पराभव है; स्वविवेक से लिया गया निर्णय ही जीवन का सर्वाधिक हितकारी निर्णय सिद्ध होता है। तुम्हारी स्मृतियों से स्वयं को पृथक करने का वर्षों पुराना निर्णय भी उस समय भले ही कठिन लगा था, पर आज समझ आता है कि कुछ विरक्तियाँ भी जीवन के लिए वरदान होती हैं।

और शायद हमारी कहानी का प्राप्त भी यही है- कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने के लिए नहीं आते… वे हमें यह सिखाने आते हैं कि अपने पसंदीदा शख्स के बिना भी मुस्कुराना कैसे है।

#क्वीन

Tuesday, August 18, 2026

मेरे वो मासूम बहाने और तुम

याद है ना तुम्हें! क्या हसीन दिन थे वो… तुम्हारी एक झलक पाने के लिए कितने बहाने बनाने होते थे। तुम क्लास में अकाउंट्स पढ़ रही होती थीं और मैं तुम्हारे अकाउंट्स के टीचर से मैथ्य की प्रॉब्लम्स समझने आ जाता था। और सबसे मज़ेदार तो वो था…
तुम अपनी उस दोस्त के साथ बैठकर रमज़ान के उस महीने में गुफ़्तगू कर रही थीं और मैंने आकर तुम्हारी उसी दोस्त से हिंदी की कॉपी माँग ली। तुम्हारे इश्क़ में मैं तो ये तक भूल गया था कि हिंदी तो उसका विषय ही नहीं है। 117 लोगों की साइंस क्लास में 80 से ज़्यादा स्टूडेंट्स ने हिंदी ले रखी थी और मैं हिंदी की कॉपी माँगने कॉमर्स में पढ़ने वाली एक लड़की के पास चला गया था… उस विषय की कॉपी, जिसमें मेरा काम हमेशा कम से कम दो चैप्टर आगे चलता था।
आज सोचता हूँ तो हँसी आती है खुद पर। कितना मासूम था वो इश्क़…
तुम्हें देखने के लिए बहाने चाहिए होते थे, तुमसे बात करने के लिए बेवजह की वजहें और तुम्हारे आसपास कुछ देर रहने के लिए एक परफेक्ट प्लानिंग। तुम्हें शायद अंदाज़ा भी नहीं था कि तुम्हारी एक छोटी-सी मुस्कान मेरे पूरे दिन का मूड बदल देती थी। तुम्हारा एक बार मेरी तरफ़ देख लेना ऐसा लगता था जैसे दिन भर की सारी थकान कहीं चली गई हो।
और अगर तुमने बात कर ली…
तो फिर क्या ही कहने!
उस एक बातचीत को मैं पूरे दिन याद करता था। जब दिल किसी से लग जाता है तो अक्सर ऐसा ही होता है, सामने वाला कुछ नहीं कहता, फिर भी हमें बहुत कुछ सुनाई देता है।
वो दिन भी क्या दिन थे…न कोई उम्मीद बड़ी थी, न कोई शिकायत। बस तुम थीं और तुम्हें देखने में मिलने वाली एक छोटी-सी खुशी। फिर धीरे-धीरे वही छोटी-सी खुशी मेरी सबसे बड़ी ज़रूरत बन गई। मैंने तुम्हें कभी पाना नहीं चाहा था। मैं बस चाहता था कि तुम खुश रहो। तुम्हारे भीतर जो दर्द है, तुम उसे किसी के साथ बाँट सको। क्योंकि मैं समझता हूँ, जानता हूँ कि दर्द बाँटने से उसका बोझ कम होता है और शायद उसी से खुशी के लिए थोड़ी जगह बनती है। मैं चाहता था कि अगर मेरी उपस्थिति से तुम्हें सुकून मिलता है, तो मैं ठहरूँ। और विश्वास मानो! मैंने पहले ही तय कर लिया था कि अगर मेरी अनुपस्थिति से तुम्हारा जीवन थोड़ा भी आसान हो सकता है, तो मैं चुपचाप चला जाऊँगा। और देखो ना! चला भी गया मैं। 
पता है! मोहब्बत का मतलब हमेशा किसी को अपने पास रखना नहीं होता। कभी-कभी मोहब्बत का सबसे कठिन रूप होता है, किसी को उसकी खुशी के लिए आज़ाद कर देना। लेकिन इंसान भी कितना अजीब है ना? जिस चीज़ को छोड़ने का फैसला हम समझदारी से करते हैं, दिल उसे छोड़ने के लिए तैयार ही नहीं होता। हम बहुत कोशिश करते हैं। बहुत समझाते हैं खुद को। बहुत सारे तर्क देते हैं। कभी कहते हैं, “अब नहीं।” कभी कहते हैं, “बहुत हो गया।” कभी खुद से वादा करते हैं कि अब पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। फिर हम थककर वो सब होने देते हैं, जिसे रोकने के लिए हमने अपना सारा सुकून दाँव पर लगाया होता है।
मैंने भी बहुत कोशिश की। तुम्हारे बिना जीने के कई तरीके सोचे। सोचा, खुद को काम में व्यस्त रखूँगा। सोचा, तुम्हारी याद आने पर कोई और बात सोचूँगा। सोचा, तुम्हारी तस्वीरें नहीं देखूँगा। सोचा, तुम्हारे बारे में पूछूँगा भी नहीं। लेकिन हर तरीके में तुम्हारी कमी पहले से ज़्यादा मिली। तब समझ आया कि किसी इंसान को भूलने का कोई तय तरीका नहीं होता।
कुछ लोग यादों से नहीं जाते। वो हमारे स्वभाव में रह जाते हैं। हमारी आदतों में। हमारी खामोशियों में। हमारे अकेलेपन में। और कभी-कभी तो हमारी मुस्कुराहट में भी।
मैंने सुना था! लोग कहते हैं, समय बहुत कीमती होता है। सही कहते हैं। लेकिन उस वक्त से भी कीमती कुछ होता है… समय से भी महंगी होती हैं भावनाएँ। इसलिए उन्हें वहीं खर्च करना चाहिए, जो उनकी कीमत समझ सके। क्योंकि समय चला जाए तो शायद वापस मिल जाए… लेकिन गलत जगह खर्च की गई भावनाएँ इंसान को भीतर से बहुत खाली कर जाती हैं।
मैंने भी बहुत कुछ कहा। बहुत कुछ समझाने की कोशिश की। बहुत बार अपनी खामोशी तोड़ी। और हर बार बाद में लगा कि शायद चुप रहना बेहतर होता, लेकिन हर बार ये मुझे बोलने के बाद समझ आया।
पर क्या करूँ?
तुम्हारे सामने होते ही मन करता है कि जो कुछ भी मन में है, सब बोल दूँ। ये न सोचूँ कि मेरे इतना कहने से तुम क्या सोचोगी। न ये सोचूँ कि मेरी बात तुम्हें अच्छी लगेगी या नहीं। बस बोलता रहूँ… क्योंकि तुम्हारे सामने आते ही मेरी सारी समझदारी कहीं पीछे छूट जाती है। वही पुराना लड़का वापस आ जाता है… जो हिंदी की कॉपी माँगने कॉमर्स की लड़की के पास चला गया था। वही लड़का, जिसे तुम्हारी एक झलक के लिए पूरी दुनिया बेवकूफ़ी लगती थी, लेकिन अपनी बेवकूफ़ियाँ बहुत खूबसूरत लगती थीं। शायद यही वजह है कि आज भी तुम्हारे सामने मैं अपने सबसे सच्चे रूप में होता हूँ।
तुमने मुझे बहुत कुछ सिखाया। बात करना। परेशान होने पर भी मुस्कुराते रहना। इंतज़ार करना। खामोशी समझना। और सबसे मुश्किल… छोड़ देना।
अब लौट रहा हूँ अपनी जिंदगी में वापस। कोशिश यही रहेगी कि अब किसी के बहकावे में न आऊँ। अपने रास्ते पर चलूँ। अपने सपनों को फिर से उठाऊँ। जो खो गया, उसे स्वीकार करूँ। और जो बचा है, उसे संभालूँ। तुम्हारे लिए कोई शिकायत नहीं है।
शायद कुछ रिश्तों का मुकम्मल होना उनके साथ रहने में नहीं, बल्कि उन्हें खूबसूरत याद बनाकर अपने भीतर बचाए रखने में होता है।और अगर कभी अचानक तुम्हें उन दिनों की याद आए… तो उस लड़के को ज़रूर याद करना, जो तुम्हें देखने के लिए बहाने बनाया करता था। जो तुम्हारी दोस्त से हिंदी की कॉपी माँगने पहुँच गया था। जो 500 किलोमीटर की दूरी को भी तुम्हारे लिए छोटा समझता था। जो तुम्हें पाना नहीं चाहता था… बस तुम्हें खुश देखना चाहता था। 

और हाँ… अगर कभी उस लड़के से पूछना कि उसने इतना सब क्यों किया था… तो शायद वो मुस्कुराकर सिर्फ इतना कहेगा-  “मैंने उस दिन अपने दिल में रहने वाले भगवान की सुनी थी…” “लेकिन तुमने तो मेरे भगवान को भी हरा दिया।”

तुम तक पहुँचने की आख़िरी कोशिश

याद है तुम्हें वो दिन!
500 किलोमीटर दूर था तुमसे… अगले दिन परीक्षा की तैयारी चल रही थी… ना बात हो रही थी और ना ही तुम्हारा चेहरा दिख रहा था। पता नहीं क्यों, लेकिन उस दिन दिल ने कहा कि मेरा तुम्हारे साथ होना ज़्यादा ज़रूरी है। दिल कह रहा था, बस तुम पास रहो। लेकिन दिमाग कह रहा था, नहीं! परीक्षा ज़रूरी है, करियर ज़रूरी है।

क्या फैसला करता मैं?
पता है! मुझे हमेशा पढ़ाया गया था कि जब किसी फैसले को लेने में कठिनाई आए, तो अपने दिल की सुनो, क्योंकि दिल में भगवान रहते हैं और भगवान कभी गलत रास्ता नहीं दिखाते। मैंने भी उस दिन भगवान की बात सुनी… और आ गया उस शहर में, जहाँ तुम थीं।
बिल्कुल वैसे ही, जैसे पहली बार तुम्हें देखते वक्त दिल ने कहा था, “तुमसे बात कर सकता हूं।” बिल्कुल वैसे ही, जैसे पहली बार तुम्हारे साथ अकेले होते हुए भी दिल के कहने पर वो सब कह डाला था, जो शायद मैंने कभी किसी से नहीं कहा था।
शायद दोस्ती की शुरुआत भी ऐसे ही होती है… बिना किसी योजना के, बिना किसी वादे के और बिना किसी शर्त के।
तुम हमेशा कहा करती थीं ना, “हमारे साथ होने में कभी कोई शर्त नहीं आएगी, बस तुम साथ रहना।”
मुझे भी बस तुम्हारा साथ चाहिए था। तुम्हारी आवाज़, तुम्हारी बातें, तुम्हारा मेरे पास होना… इतना ही काफी था।
किसी रिश्ते को बचाने के लिए अगर बार-बार खुद को समझाना पड़े कि शायद सामने वाला व्यस्त है, शायद उसे समय नहीं मिल रहा, शायद परिस्थितियां ठीक नहीं हैं… तो एक दिन इंसान सामने वाले से नहीं, खुद से सवाल करने लगता है, “क्या सच में मेरी कोई अहमियत है?”
और शायद रिश्तों की सबसे तकलीफदेह बात यही होती है, जब सामने वाला दूर नहीं जाता, लेकिन पहले जैसा पास भी नहीं रहता। तुम मेरे साथ थीं… फिर भी कहीं बहुत दूर होती जा रही थीं। मैं हर बार तुम्हारे पास आने की कोशिश करता रहा। तुम्हारी चुप्पियों को समझने की कोशिश करता रहा। तुम्हारे बदलते व्यवहार के पीछे वजह तलाशता रहा। कभी खुद को दोष दिया, कभी हालात को… लेकिन तुम्हें कभी दोष नहीं दिया। क्योंकि जिसे हम सच में समझने का दावा करते हैं, उसे कटघरे में खड़ा करना हमें आता ही नहीं।क्योंकि जो समझ सकता है, वही संभाल सकता है, वक़्त भी, हालात भी और रिश्ता भी।
मैं चाहता था कि तुम मुझे समझो। मेरे शब्दों से ज्यादा मेरी खामोशी को समझो। मेरे मिलने की ज़िद से ज्यादा उसके पीछे छिपी बेचैनी को समझो, तुम्हारे खुद के लिए तुमसे मिलने की जरूरत को समझो। लेकिन शायद हर रिश्ता दोनों तरफ से एक जैसा नहीं समझा जाता। और फिर एक दिन मुझे यह भी समझ आया कि रिश्तों में जबरदस्ती अच्छी नहीं होती। जिसे जहाँ सुकून मिलता है, उसे वहीं छोड़ देना चाहिए। किसी को अपने पास रोककर रखा जा सकता है, लेकिन उसके दिल को नहीं।
किसी को अपनी जिंदगी में रहने के लिए मनाया जा सकता है, लेकिन उसके मन में रहने के लिए नहीं। और शायद इस रिश्ते की सबसे खूबसूरत बात यही है कि उसमें अधिकार से ज्यादा आज़ादी होती है। मैं तुम्हें बुलाना चाहता था… लेकिन तुम्हारी खुशी के आगे अपनी इच्छा को छोटा करना सीख गया। मैं चाहता था कि तुम मेरे साथ रहो… लेकिन....
कभी-कभी हम किसी इंसान को खोने से नहीं डरते… हम उस एहसास को खोने से डरते हैं, जो उसके साथ रहते हुए हमें मिलता है।तुम्हारे साथ मुझे वही सुकून मिलता था। और शायद इसलिए तुम्हारे साथ बिताए गए वो कुछ एक पल मेरे लिए बहुत कीमती थे।इसके साथ एक शाश्वत सत्य और भी है कि जिसके साथ असली सुकून मिलता है, उसके साथ अक्सर वक़्त कम मिलता है। काश! वक़्त को भी रिश्तों की तरह समझाया जा सकता। काश! उससे कहा जा सकता कि थोड़ा ठहर जा… अभी कुछ बातें बाकी हैं। कुछ मुलाकातें अधूरी हैं। कुछ सपने अधूरे हैं। कुछ वादे अधूरे हैं। कुछ बातें ऐसी हैं, जो कहनी थीं लेकिन रह गईं। लेकिन एक सच और भी है कि वक़्त कभी किसी के लिए नहीं रुकता।
इसलिए मैंने एक दिन खुद से कहा,  अगर कल दूर होना तय ही है, तो फिर क्यों न आज को अच्छे से जी लिया जाए? क्यों न जब तक साथ हैं, तब तक बिना किसी शिकायत के साथ रहा जाए? क्यों न हर मुलाकात को आखिरी मुलाकात समझकर जी लिया जाए? क्यों न हर हंसी को याद बना लिया जाए? क्यों न हर छोटी-सी बात को दिल में रख लिया जाए?
मैं उन तीन दिनों में यही करने की कोशिश कर रहा था?
तुम्हारी बातें, तुम्हारी हंसी, तुम्हारा चुप हो जाना… सब कुछ समेटकर अपनी यादों में बसा लेना चाहता था... लेकिन.... और इस लेकिन पर आते-आते कई कहानियां चरित्रहीन हो जाती हैं...
#क्वीन

Friday, August 14, 2026

उस शाम का वो साथ

 सुनो ना! याद है तुम्हें वो शाम?

सबके लिए हर शाम की तरह बहुत आम सी ही रही होगी, पर मेरे लिए वो बहुत खास थी। पहली बार साथ थे हम... सिर्फ हम... बिना किसी विशेष प्रयोजन के, बिना किसी पूर्वाभास के।

तुम कुछ कह रही थी और मैं सुन रहा था। सच कहूँ तो, तुम्हारी सारी बातें मुझे याद भी नहीं; लेकिन तुम्हारी आवाज़ का वह ठहराव, मुस्कुराते हुए बात करने का ढंग और बीच-बीच में मेरी ओर देख लेना... सब कहीं भीतर ठहर सा गया था।
उस एक शाम में पहली बार लगा कि किसी के साथ होना भी एक तरह का सुकून हो सकता है। उस दिन विदा लेते हुए कुछ भी असाधारण नहीं हुआ। न कोई वादा, न कोई इकरार। बस एक साधारण सा वाक्य- 'फिर मिलते हैं'
अगली सुबह पता नहीं क्यों, मन बार-बार यही सोच रहा था कि आज तुमसे बात होगी या नहीं। फोन उठाता, रख देता। कोई मैसेज आता तो पहले तुम्हारा नाम ही तलाशता। ये प्रतीक्षा अकारण थी, फिर भी व्यर्थ नहीं लग रही थी।
मुझ जैसे बेपरवाह इंसान के साथ उस एक शाम में जो हुआ, वो कोई अलग ही अवस्था थी, एक ऐसी अवस्था, जहाँ कोई आपको अच्छा लगने लगता है, उस एक शख्स की उपस्थिति से ही आपके होठों पर मुस्कान आ जाती है।
उन चंद पलों की मुलाकात में, तुम्हारे साथ चुप रहना भी सहज लगा था और तुम्हारी आंखों में आंखें डालकर अपने मन की अनगढ़ बातें कहने में भी संकोच नहीं था। कुछ अजीब सा ही था सबकुछ...
और शायद मेरी रोमांचक कहानी में तुम्हारा अचानक से शामिल हो जाना, 'यूं' ही तो नहीं हो सकता... शायद जीवन में 'लगभग सबकुछ' होने के बाद 'लगभग' को हटाकर 'सबकुछ' होने के अहसास को जिंदा करने आई थी तुम... एक अच्छे दोस्त की तरह... जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत महसूस करता था मैं... जिसके सामने ये ना सोचूं कि क्या कहना है और क्या नहीं... जिसकी सुन सकूं और जिसे सुना सकूं... मुझे चाहिए था कोई मेरे जैसा...
#क्वीन

Wednesday, June 24, 2026

जिस दिन तुमने कहा था, "कभी छोड़कर मत जाना"

तुम्हें याद है वो दिन?
सर्दियों की हल्की धूप थी। कॉलेज के बाहर उस पुराने वाले पार्क में हम दोनों घंटों बैठे रहे थे। तुमने अपनी हथेलियाँ मेरी जैकेट की जेब में छिपा ली थीं और हँसते हुए कहा था, "तुम्हारे साथ वक़्त बहुत जल्दी भागता है।"
उस दिन मुझे पहली बार लगा था कि शायद दुनिया की सारी बेचैनियाँ तुम्हारे पास आकर ख़त्म हो जाती हैं।
हमने सड़क के किनारे वाले उस छोटे से ठेले से चाय पी थी। तुम्हारी आदत थी, चाय का पहला घूँट लेते ही आँखें बंद कर लेना। मैं तुम्हें देखता रहा था और तुमने मुस्कुरा कर पूछा था, "क्या देख रहे हो?" और मैं हर बार वही झूठ बोल देता-"कुछ नहीं।" 
सच तो यह था कि मैं उस चेहरे को याद कर लेना चाहता था, जिसे मैं उम्र भर देखना चाहता था।
शाम को जब हम लौट रहे थे, तुम अचानक रुक गई थीं। तुमने मेरा हाथ कसकर पकड़ा था और बेहद दबी आवाज में कहा था, "कभी मुझे 'दर्द' तो नहीं दोगे ना?"
मैंने हँसकर कहा था, "हम जैसे लोग अपनों की खुशी के लिए उनसे दूर चले जाते हैं, लेकिन उनके दुःख की वजह नहीं बनते।"
तुमने मेरी बात पर लगभग डाँटते हुए मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया था।
मुझे यक़ीन की हद तक गुमान था कि तुम मेरे सिवा किसी और की हो ही नहीं सकती। शायद प्रेम आदमी को अंधा नहीं, बहुत भरोसेमंद बना देता है।
फिर धीरे-धीरे तुम बदलने लगीं।
तुम्हारे पास वक़्त कम होने लगा, बातें छोटी होने लगीं, और बहाने लंबे। लेकिन अजीब बात है, तुमने कभी जाने की बात नहीं कही। तुमने बस इतना किया कि मुझे हर दिन थोड़ा-थोड़ा अकेला छोड़ती रहीं।
और मैं... मैं अपने हिस्से में बस तुम्हारा थोड़ा सा वक्त मांगता रहा। 
आज सोचता हूँ, देखता हूं, समझता हूं, उनकी बेबसी, जो किसी से अपने हिस्से का प्यार माँगते हैं, जबकि उसपर सिर्फ उनका ही हक होता है।
कभी-कभी कल्पना करता हूँ, अगर किसी दिन तुम मेरे सामने बैठो, बिल्कुल पास, तो क्या तुम मेरे भीतर उस आदमी को तलाशोगी, जो तुम्हें बिना किसी शर्त के चाहता था? क्या तुम्हें उस शख्स का एक छोटा सा हिस्सा भी मुझमें मिलेगा?
एक बात जानना चाहता हूँ...
उस दिन जब तुमने कहा था, "कभी छोड़कर मत जाना", क्या उस वक़्त भी तुम्हें मालूम था कि जाने के लिए तुम ही मुझे मजबूर कर दोगी?

Saturday, June 6, 2026

भरोसा...

वो शाम आज भी मेरे भीतर कहीं थमी सी है।
याद है तुम्हें? बारिश अभी-अभी थमी थी। सड़क किनारे चाय की उस छोटी-सी दुकान पर हम दोनों बैठे थे। हवा में मिट्टी की खुशबू थी और तुम्हारे बाल बार-बार चेहरे पर आ रहे थे। तुम उन्हें संभालते हुए मुस्कुरा रही थीं, और मैं तुम्हें देख रहा था। शायद उतनी शांति मैंने अपने जीवन में कभी महसूस नहीं की थी।
तुमने अचानक पूछा था, "अगर कभी मैं दूर चली गई तो?"
मैं हंस पड़ा था। उस वक्त तक मुझे लगता था कि कम से कम तुम तो दूर जाने के लिए नहीं, मेरे साथ चलने के लिए, हमेशा साथ रहने के लिए मिली हो। मैंने कहा था, "जीवन में लोग आते हैं, बहुत से जाते हैं, लेकिन खास वही होते हैं, जो आख़िर तक साथ रहते हैं।" तुम कुछ पल चुप रही, फिर मुस्कुराकर मेरी तरफ देखा। उस मुस्कान में मुझे कुटिलता नहीं दिखी थी, या फिर शायद मैं उसे देखना ही नहीं चाहता था।
उस दिन हमने बहुत सारी बातें की थीं। रिश्तों की, भरोसे की, लोगों की। तुमने मेरे गले का रुद्राक्ष देखते हुए कहा था, "एकमुखी रुद्राक्ष बहुत मुश्किल से मिलता है ना?"
मैंने जवाब दिया था, "हां, और एकमुखी इंसान भी।"
तुम हंस दी थीं। मैं भी हंस दिया था। मगर आज सोचता हूं, शायद उस वाक्य में हमारा भविष्य छिपा हुआ था।
समय बीतता गया। हालात बदले। या शायद खराब हुए... संभाल सकता था मैं उसे लेकिन देखना चाहता था कि तुम उन हालातों को संभालने में मेरा हाथ थामने आती भी हो या नहीं! उस दौर में बहुत से लोग चले गए। कुछ चुपचाप, कुछ बहाने बनाकर।
और तुम...
तुम तो उस धन्यभागी के लिए हुलास सा सर्वाधिक सुलभ माध्यम बनी हुई थीं। हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं हुआ था। कोई नाटकीय तथाकथित 'ब्रेकअप' भी नहीं हुआ था। बस एक चाय भर की दूरियां बढ़ गई थीं।
आज इतने साल बीतने के बाद भी अक्सर बारिश के मौसम में मैं उसी चाय की दुकान, उसी शाम और उसी सवाल तक लौट जाता हूं।
वहां बैठकर सोचता हूं... कि क्या तुम्हें वो शाम याद आती होगी?
क्या तुम्हें वो चाय, वो भरोसा, वो सपने याद आते होंगे जो हमने साथ मिलकर देखे थे? या फिर मैं ही उन यादों का आखिरी पहरेदार बचा हूं?

Saturday, February 21, 2026

सुनो ना!

 याद है ना तुम्हें!

उस शाम ढाबे पर खाने का इंतजार करते वक्त तुमने अपनी उँगलियों से मेज़ पर अनजाने में आड़ी-तिरछी लकीरें बनाते हुए कहा था- “काश, कभी ऐसा हो कि मैं तुम्हारा इंतजार तुम्हारी तरह से करूं और तुम मेरी तरह आने से इनकार कर दो...” मैं तुम्हारी इस बात पर हँसा तो था, लेकिन सच मानो, भीतर कहीं एक अजीब सी पीड़ा उठी थी। मैं कभी नहीं चाहता था कि मैं तुम्हारी किसी भी इच्छा, आकांक्षा या प्रश्न पर 'ना' कह पाऊं।

प्रेम किसी का भी हो, अगर छोड़कर जाता है तो विरासत में थोड़ी-सी उदासी भी छोड़ जाता है। और वो उदासी अब भी मुझे उस ढाबे पर महसूस होती है। खुले आसमान के नीचे, मुट्टी की भीनी खुशबू के बीच तुम्हारा वो सवाल, जो अनकहा रह गया था, उसका उत्तर तो मैंने उसी वक्त दे दिया था, लेकिन तुम उसे समझ ही न सकी थी।

तुमने कहा था- “सुनो…”

और मैं चौकन्ना हो गया था- “हाँ?”

तुम मुस्कुराईं नहीं, बस मेरी आंखों में खुद को तलाशने लगी।

उस “सुनो” में कितना कुछ था, है ना?

कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिनके जवाबों की चाहत नहीं होती… वो बस पूछ लिए जाते हैं।

तुम्हारा “सुनो” भी ऐसा ही था। मेरे “हाँ” में तुम्हें जवाब नहीं चाहिए था, बस तसल्ली चाहिए थी- कि मैं हूँ… कि मैं सुन रहा हूँ… कि तुम अकेली नहीं हो।

विश्वास मानो! तुम्हारे लिए जितना उस दिन 'उपलब्ध' था, उतना ही सदा था।

उस दिन तुमने पहली बार अपना हाथ मेरी हथेली में रखा था। वो हाथ ठंडा था, लेकिन पकड़ में अजीब-सी गर्माहट थी। तुम्हारी उँगलियों की हल्की-सी कंपकपाहट आज भी महसूस होती है।

तुम्हारे जाने के बाद कई बार कहा- “सुनो…”

और इंतज़ार करता रहा तुम्हारे “हाँ” का।

उस इंतजार ने भीतर तक हर दिन तोड़ा, और टूटने के बाद कुछ चुभन भी महसूस हुई। हर दिन ऐसे ही महसूस हुआ जैसे सब अभी आँखों के सामने हो रहा हो। जैसे तुम अभी भी अपनी हथेली में हाथ में देकर खड़ी हो, लेकिन सपने तो सपने ही होते हैं, वो तो टूटेंगे ही और चुभेंगे भी।

Friday, February 20, 2026

दिसंबर हर साल आता है, पर तुम नहीं आती

दो दशक हो गए, लेकिन उस साल का वो आखिरी दिन आज तक नहीं भूल पाया हूं। तुम्हारी उस सालों पुरानी कहानी में आज भी इतना उलझा हूं कि किसी और के किस्से का हिस्सा ही नहीं बन पा रहा हूं। साल के उस आखिरी दिन गुलाबी ठंड में जब काले-भूरे कुल्हड़ में लाल चाय पी थी, सच मानो! दूध खत्म होने के बाद 'चाचा' से सिर्फ वक्त बिताने के लिए बनवाई गई उस लाल लेकिन 'चरित्रवान चाय' जैसी ताजगी और ऊर्जा आज तक न मिल पाई। 

हर साल आखिरी दिन के जाते-जाते कम से कम 2-3 जगह तो जरूर जाता हूं और दूध होते हुए भी बिना दूध की चाय बनवाकर पीता हूं, कि शायद वही स्वाद, वही ताजगी, वही ऊर्जा मिल जाए, लेकिन अब तक एक बार भी नहीं मिला। पता नहीं क्यों, अब लगने लगा है कि शायद वो सब चाय से नहीं मिला था, जरूर कुछ ना कुछ उस साल में ही रहा होगा, नहीं तो इतनी सारी जगहों पर चाय पीने के बाद भी वो स्वाद क्यों नहीं मिल रहा?

उस शाम तुमने कहा था- तुम तो मेरे दिल हो, बात नहीं करते तो लगता है कि दिल धड़कना बंद कर रहा है। अगर वो सच था तो बताओ ना- आज बिना दिल के कैसे जिंदा हो तुम? 

सुनो ना! एक, दो, तीन, चार.... पता नहीं कितने दिसंबर गुजर गए, लेकिन सच मानो, मुझे नई जनवरी से कभी कोई उम्मीद नहीं रहती। दरअसल मुझे किसी 'नए' की जरूरत ही नहीं है। मुझे जरूरत ही नहीं है कि कोई नया मेरे लिए फिर पुराना हो, और फिर वही करे जो उस दिसंबर ने किया था। 

जनवरी हो, फरवरी हो, अप्रैल हो या नवंबर-दिसंबर... मेरी जिंदगी में अब परमानेंट 'बसंत' है...

Monday, February 16, 2026

वो शाम, जो बीतकर भी नहीं बीती

याद है ना तुम्हें! वो शाम धीमे-धीमे उतर रही थी। बिलकुल वैसे ही, जैसे कोई थका हुआ दिन बिना शोर किए विदा लेता है। आसमान पर केसरिया रंग की एक धुंधली चादर बिछी थी, जिसमें सूरज की आख़िरी किरणें मानो ठिठक-ठिठक कर सांस ले रही थीं। हवा में हल्की-सी ठंडक थी। तुम सामने चुपचाप बैठी थी। इतनी स्थिर कि समय भी शायद तुम्हें छूने से डर रहा था, बिलकुल शिलावत। तुम्हारी आंखें कुछ तो कहना चाहती थीं। पर क्या? उनमें ना शिकायत थी, ना कोई आग्रह, ना बीते कल का हिसाब और ना आने वाले कल की मांग। फिर क्या था जो मैं उसदिन तुम्हारी आंखों में पढ़ नहीं पाया। मैं खुद को तुम्हारी आंखों में खोजने की कोशिश कर रहा था। पर उसदिन शायद तुम्हारे सामने होते हुए भी तुम्हारे लिए नहीं था। 

उस दिन ज़िन्दगी ने हमें एक और अवसर दिया था। पर जब नियति प्रतिकूल हो, तब अवसर भी अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं। वे सामने होते हुए भी हाथ नहीं आते, और जब तक आपको उनके ‘अवसर’ होने की बात समझ में आती है, तब तक वे स्मृति बन जाते हैं। पता है, आज भी वह शाम आंखों के सामने जीवित खड़ी हो जाती है। केसरिया आसमान, तुम्हारी खामोशी, और मेरा असहाय ठहराव। सब कुछ वहीं का वहीं है, बस हम दोनों उस क्षण से बहुत आगे बढ़ चुके हैं, लेकिन वह क्षण मेरे भीतर तो आज भी ठहरा हुआ है।

उस पूरी शाम तुमने कुछ नहीं कहा, बस जाते-जाते पलटकर एक बार देखा था। शायद एक क्षण का दसवां हिस्सा रहा होगा। उस एक दृष्टि में कोई वादा नहीं था, कोई पश्चाताप नहीं था, बस इस बात की स्वीकार्यता थी कि जो हो रहा है, वही होना था और वही होगा। तुम्हारी आंखों में उस वक्त ज़रा-सी नमी थी, जिसे तुमने मुस्कान से छुपाने की कोशिश की, और वही कोशिश थी, जिसने मुझमें तुम्हारे प्रति ‘विश्वास’ को जीवित रखा था।

पता है! उस शाम अगर तुम अपने मौन का सहारा ना लिया होता और शब्दों से सब कह देती तो शायद सबकुछ आसान हो जाता, पर जो नहीं कहा गया, वही सबसे भारी बनकर रह गया। आज भी जब शाम उतरती है और आसमान वही धुंधला सा केसरिया रंग ओढ़ लेता है, तो तुम्हारा वही मौन, वही दृष्टि, और वह अधूरी मुस्कान मेरे भीतर कहीं फिर से जीवित हो उठती है।


लोग कहते हैं कि वक़्त बहुत कुछ बदल देता है, पर सच मानो, कुछ यादों को वक्त छू भी नहीं पाता। वह शाम भी उन्हीं में से एक है- जो बीत गई, पर मेरे भीतर से कभी गई नहीं।