याद है ना तुम्हें वह जन्माष्टमी…
उस दिन तुमसे बात नहीं हो पाई थी।
आज इतने वर्षों बाद उस दिन को याद करता हूँ तो लगता है, कुछ दिन जीवन में घटित नहीं होते, वे भीतर कहीं प्रतिष्ठित हो जाते हैं। समय उन्हें पीछे छोड़ आता है, पर स्मृति उन्हें आपके मस्तिष्क में वहीं रोक देती है, जहाँ मन ने पहली बार किसी भाव को उसकी संपूर्ण निष्कपटता में अनुभव किया था।
तुम्हारे घर का वही एकलौता मोबाइल नंबर था, रिलाइंस का CDMA, बिना सिम वाला फोन।
उस नंबर को किसी PCO से लगाने से पहले ही मन में जाने कितने संशय, संकोच और आशंकाओं का कोलाहल उठ खड़ा होता था। भय यह नहीं था कि तुमसे बात नहीं होगी; भय यह था कि किसी और ने फोन उठाया तो क्या बोलूंगा? घर में एक लड़की के होते हुए, ऐसे कॉल्स शोभा तो नहीं देते ना!
और उसी उधेड़बुन में मैंने आइडिया का दस रुपये वाला टॉप-अप स्क्रैच किया था।
दस रुपये! आज के समय में शायद कुछ भी नहीं, पर उस समय उन 10 रुपयों के लिए बहुत प्रयास करने पड़ते थे। उसमें छह या सात रुपये ही मिले होंगे। लेकिन उस समय वे छह-सात रुपये मेरे लिए जैसे किसी दुर्लभ निधि से कम नहीं थे। अपने घर के नंबर से हर 15 मिनट पर एक ब्लैंक मैसेज, कि शायद तुम मैसेज देखकर एक बार मिस कॉल करो, और मैं 2 रुपये प्रति मिनट वाली कॉल से बचकर किसी कॉइन बॉक्स पीसीओ में जाकर तुमसे बात कर पाऊं।
पता है! उस मैसेज को भेजने में भी एक डर था कि कहीं कोई और ‘आलम’ नाम से आ रहे उन ब्लैंक मैसेजेज को देख ना ले! लेकिन उस भय के ऊपर एक और चीज़ थी, एक विचित्र, अबोध और आज की दृष्टि से लगभग हास्यास्पद-सा विश्वास।
मन कहता था-
आज कैसे कोई देख लेगा?
आज तो जन्माष्टमी है।
आज उस पुरुषोत्तम का जन्मदिवस है, जिसे संसार ने प्रेम का सबसे विराट प्रतीक माना है। आज तो स्वयं कृष्ण की जन्मतिथि है। प्रेम के देवता के जन्मोत्सव पर भेजे गए मेरा ये ‘कोरे’ संदेश भला किसी अनिष्ट के भागी कैसे होंगे?
मुझे सचमुच लगता था कि वे रक्षा करेंगे।
मेरे ‘रिक्त’ शब्दों की भी।
तुम्हारी मर्यादा की भी।
और उस अल्पवयस्क, अबोध प्रेम की भी, जिसे संसार की दृष्टि से अधिक तुम्हारे होने भर की आवश्यकता थी।
उस दिन तुमसे बात नहीं हो पाई थी।
कितनी साधारण-सी बात है यह, दो लोग ‘कथित’ तौर पर प्रेम करते थे और एक दिन उनकी बात नहीं हो सकी। लेकिन स्मृति में वही तुम्हारी छोटी-सी अनुपस्थिति आज एक पूरा दर्शन बन गई है। क्योंकि उस दिन पहली बार समझ आया था कि प्रेम केवल संवाद नहीं है; कभी-कभी संवाद के अभाव में भी जो विश्वास अक्षुण्ण रहता है, वही प्रेम का वास्तविक स्वरूप होता है।
आज उस जन्माष्टमी को स्मरण करता हूँ तो उस दस रुपये के टॉप-अप की याद भी आ जाती है।
धन अल्प था, अभिलाषा अनंत।
साधन क्षुद्र था, भावना विराट।
और उम्र छोटी थी, पर विश्वास….न जाने क्यों…बहुत बड़ा… बहुत ही बड़ा…
#क्वीन #Queen