उस दिन तुमने बताया कि तुम्हारे मामा जी मुझसे मिलना चाहते हैं। तुमने उनको हमारे बारे में सब कुछ बता दिया था। जैसे ही मैंने उनको अपना नाम बताया, उनके मुंह से बस एक ही वाक्य निकला, 'हिन्दू हो?' फिर जब तुमने उनको बताया कि मैं संघ से भी जुड़ा हूँ तो उनका लाल चेहरा पीला सा दिखने लगा। पूरे दो घंटे तक उनसे संघ की विचारधारा को लेकर बहस हुई।
उन्होंने 1000 तर्क देकर यह साबित करने की कोशिश की कि संघ एक कट्टर विचारधारा वाला संगठन है लेकिन व्यवहारिकता के ज्ञान और तुम्हारी मोहब्बत की शक्ति ने आखिर उनसे यह कहलवा ही दिया कि संघ कट्टर विचारधारा वाला नहीं बल्कि राष्ट्रवादी विचारधारा वाला संगठन है। उसके बाद वो जिस तरह से तुम्हारे मेरे प्रेम को नए आयाम दे रहे थे वह सचमुच आश्चर्यजनक था।
तुमने बताया था ना कि जब तुम्हारेे पापा को मेरे बारे में पता लगा तो उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया था कि एक काफिर से कोई रिश्ता नहीं हो सकता। पता है आज यह बात क्यों याद आयी? आज मैं फिर उसी मंदिर में गया था जहाँ चलने के लिए तुमने मेरे साथ फिल्म देखने के ऑफर को ठुकरा दिया था। तुम तो शायद अब कभी वहां नहीं जा पाओगी लेकिन आज उस मंदिर में माँ की प्रतिमा के सामने जाकर तुम्हारे द्वारा किए गए सारे वादे याद आ गए। वो सारे वादे जिनमें मैं और तुम, 'हम' हुआ करते थे।
#क्वीन
'क्वीन' कौन है? इस सवाल का जवाब तो मैं भी खोज रहा हूं। मैं तो बस इतना जानता हूं कि यह सामान्य को विशिष्ट बनाने का एक प्रयास है... कोई अलंकार नहीं... सिर्फ सच्ची भावनाएं... तुम थी तो सब कुछ था... तुम नहीं हो तो भी सब कुछ है....लेकिन तब वह 'सब कुछ' अच्छा लगता था लेकिन अब.... #क्वीन
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Sunday, April 9, 2017
काश! उस दिन बात कर लेता तुमसे
जब पता लगा कि शादी के बाद तुम अपने पति के साथ दिल्ली शिफ्ट हो गई तो मन में एक उम्मीद जगी कि 10 साल के बाद शायद तुमसे अचानक किसी मॉल, किसी मार्केट में मुलाकात हो जाए। उस दिन मैं क्लास लेने के लिए मेट्रो से हौज खास जा रहा था। राजीव चौक पर जब येलो लाइन मेट्रो पर चढ़ा तभी अचानक मेट्रो का गेट बंद होते होते रुक गया। बैग फंस गया था तुम्हारा, तुम अंदर आयी और मैं पीछे मुड़ा। उस भीड़ में तुम्हारी नजरें तो मुझसे नहीं मिल पायीं लेकिन तुम्हें अपने सामने देखकर ऐसा लगा जैसे वर्षों की कामना पूरी हो गई।
तुम मेरे सामने थी लेकिन मैं तुमसे बात नहीं करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। मैं चाहता था कि बात करने से पहले एक बार फिर से तुम्हारी नजरों से मेरी नजरें मिल जाएं। मैं चाहता था कि तुम एक बार थोड़ा सा बाईं ओर घूम जाओ और मैं तुम्हारी आँख के किसी कोने में खुद को संजोया हुआ देख लूं। लेकिन तुम तो जैसे किसी और ही दुनिया में ही खोई थी। फिर मन किया कि चलो बात कर ही लूं लेकिन दूसरे ही पल 5 महीने पुरानी तुम्हारी शादी की वह तस्वीर मेरी आँखों के सामने गयी जो तुमने अपने पति के साथ #बार_बार_देखो लिखकर पोस्ट की थी।
मैं इन्हीं उलझनों में फंसा था कि ग्रीन पार्क मेट्रो स्टेशन आ गया और तुम मेट्रो से उतर कर चंद पलों में मेरी आँखों के सामने से ओझल हो गई। फिर से तुम्हारे इतना करीब आकर दूर जाने के अहसास को झेलना मेरे लिए शायद नामुमकिन सा था, शायद इसीलिए मेरी आंख खुल गई और मैं उस सुखद स्वप्न से बाहर आ गया। सुबह का 5:30 बज रहा था।
कहते हैं सुबह के सपने सच हो जाते हैं। काश! मेरा यह सपना सच हो जाये, अगर ऐसा हुआ तो इस बार तुमसे बात करने से खुद को नहीं रोकूंगा। और अगर यह सपना कभी सच नहीं हुआ तो आज से 10 साल बाद भी खुद को इस बात के लिए कभी माफ नहीं कर पाऊंगा कि उस सपने में तुमसे बात नहीं की। काश! मैं उस हसीन सपने में तुमसे बात कर लेता, तो शायद वो सपना कुछ ज्यादा लंबा हो जाता और मुझे सपने में ही सही लेकिन तुम्हारे साथ बिताने के लिए कुछ और टाइम तो मिल जाता...
#क्वीन
तुम मेरे सामने थी लेकिन मैं तुमसे बात नहीं करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। मैं चाहता था कि बात करने से पहले एक बार फिर से तुम्हारी नजरों से मेरी नजरें मिल जाएं। मैं चाहता था कि तुम एक बार थोड़ा सा बाईं ओर घूम जाओ और मैं तुम्हारी आँख के किसी कोने में खुद को संजोया हुआ देख लूं। लेकिन तुम तो जैसे किसी और ही दुनिया में ही खोई थी। फिर मन किया कि चलो बात कर ही लूं लेकिन दूसरे ही पल 5 महीने पुरानी तुम्हारी शादी की वह तस्वीर मेरी आँखों के सामने गयी जो तुमने अपने पति के साथ #बार_बार_देखो लिखकर पोस्ट की थी।
मैं इन्हीं उलझनों में फंसा था कि ग्रीन पार्क मेट्रो स्टेशन आ गया और तुम मेट्रो से उतर कर चंद पलों में मेरी आँखों के सामने से ओझल हो गई। फिर से तुम्हारे इतना करीब आकर दूर जाने के अहसास को झेलना मेरे लिए शायद नामुमकिन सा था, शायद इसीलिए मेरी आंख खुल गई और मैं उस सुखद स्वप्न से बाहर आ गया। सुबह का 5:30 बज रहा था।
कहते हैं सुबह के सपने सच हो जाते हैं। काश! मेरा यह सपना सच हो जाये, अगर ऐसा हुआ तो इस बार तुमसे बात करने से खुद को नहीं रोकूंगा। और अगर यह सपना कभी सच नहीं हुआ तो आज से 10 साल बाद भी खुद को इस बात के लिए कभी माफ नहीं कर पाऊंगा कि उस सपने में तुमसे बात नहीं की। काश! मैं उस हसीन सपने में तुमसे बात कर लेता, तो शायद वो सपना कुछ ज्यादा लंबा हो जाता और मुझे सपने में ही सही लेकिन तुम्हारे साथ बिताने के लिए कुछ और टाइम तो मिल जाता...
#क्वीन
Sunday, January 8, 2017
स्कूल की वह बेंच सब याद दिला गई...
पता है आज 6 साल के बाद कॉलेज गया। सोचा था सब बदल गया होगा लेकिन तभी 12th के एक बच्चे ने कक्षा में परिचय कराने के लिए मुझे अंदर बुलाया। परिचय के बाद मैंने अपने उन्हीं हिंदी वाले सर से कहा, 'सर, मैं एक बार पुराने दिनों को याद करना चाहता हूं। कृपया मुझे अपनी कक्षा में बैठने की अनुमति दीजिए।' उन्होंने स्वीकृति दी तो कक्षा की पहली सीट पर बैठ गया।
उस सीट पर एक प्यारे से दिल के अंदर घुसा हुआ तीर और उसके दोनों छोरों पर तुम्हारे और मेरे नाम का पहला अक्षर गुदा हुआ नजर आया। हमारी जिंदगी में भले ही हम अलग हो गए हों लेकिन कैंपस की उस सीट पर हम आज भी छोटे से फासले पर ही बसते हैं...
पता नहीं कि तुम कभी मेरी मोहब्बत की हकीकत से रूबरू हो भी पाई थी या नहीं लेकिन आज इतने सालों के बाद भी लोग मुझे तुम्हारी कसम देकर मेरी अनचाही बात को भी मनवा लेते हैं। मैं तुम्हें अपने दिल में रखना चाहता था लेकिन तुम्हें तो गुरूर में रहना ज्यादा पसंद था... देखो, तुम्हारे गुरूर ने मेरी मोहब्बत को हरा दिया... लेकिन मुझे अपनी हार का अफसोस इसलिए नहीं है क्योंकि अगर मैं कुछ हारा हूं तो तुम भी तो कुछ जीती हो...
उस सीट पर एक प्यारे से दिल के अंदर घुसा हुआ तीर और उसके दोनों छोरों पर तुम्हारे और मेरे नाम का पहला अक्षर गुदा हुआ नजर आया। हमारी जिंदगी में भले ही हम अलग हो गए हों लेकिन कैंपस की उस सीट पर हम आज भी छोटे से फासले पर ही बसते हैं...
पता नहीं कि तुम कभी मेरी मोहब्बत की हकीकत से रूबरू हो भी पाई थी या नहीं लेकिन आज इतने सालों के बाद भी लोग मुझे तुम्हारी कसम देकर मेरी अनचाही बात को भी मनवा लेते हैं। मैं तुम्हें अपने दिल में रखना चाहता था लेकिन तुम्हें तो गुरूर में रहना ज्यादा पसंद था... देखो, तुम्हारे गुरूर ने मेरी मोहब्बत को हरा दिया... लेकिन मुझे अपनी हार का अफसोस इसलिए नहीं है क्योंकि अगर मैं कुछ हारा हूं तो तुम भी तो कुछ जीती हो...
उस खेल में थकी सिर्फ तुम थी लेकिन...
पता है ऐसे मौके जिंदगी में बहुत कम आते हैं जब कुछ मिलने और उसी के खोने के लम्हें एक जैसे हों... मैंने दोनों लम्हों को महसूस किया है... जब तुमने मोहब्बत का इजहार किया और जब मोहब्बत से इनकार किया, वे दोनों लम्हें जानलेवा थे... बेहद अजीब था वह खेल, उसमें थकी तो सिर्फ तुम थी लेकिन हार हम दोनों गए थे... तुम खुद से और मैं अपने आप से ...
तुम्हारा मजबूर कर देना और मेरा मजबूर हो जाना, बस यही तो थी अपनी मोहब्बत की कहानी... लोग कहते थे कि तुम्हारी आंखें मेरे लिए मोहब्बत बयां करती हैं, मैंने उन आंखों पर भरोसा कर लिया और अपने अरमानों को अपनी आंखों तक न आने दिया... मेरे होंठों पर छाई रहने वाली वह बनावटी मुस्कान, मेरे सैकड़ों दुखों को दिल में ही दफन करने पर मजबूर कर देती थी... तुम हर दिन मुझमें कमियां निकालती थी और मैं उन कमियों को खुद से दूर कर देता था और फिर एक दिन ऐसा आया कि मेरी सारी कमियां दूर हो गईं... मुझमें बचीं तो सिर्फ खूबियां... फिर तुम किसी और को 'सुधारने' के लिए चली गईं...
उन अधूरी कहानियों को याद करके, बिखरे पड़े टूटे ख्वाबों को एक धागे में पिरोकर, तुम्हारे बेरहम कुतर्कों को अपना नसीब मानकर होठों पर अपनी वही पुरानी मुस्कान बचाकर रखी है... आज भी उन अनजानी राहों पर सिर्फ इसलिए जाता हूं कि काश तुम किसी मोड़ पर मिल जाओ... मैं किसी अंजाम से नहीं डरता लेकिन तुम्हारे साथ किए गए उस वादे का मान रखने के लिए दुनिया से, अपने चाहने वालों से हजारों राज छुपाकर, तुम्हें लिखकर उनकी झोली में थोड़ी सा दर्द भरी खुशियां डालकर तुम्हें जिंदा रखने की, अपनी मोहब्बत को जिंदा रखने की कोशिश कर रहा हूं...
#क्वीन
तुम्हारा मजबूर कर देना और मेरा मजबूर हो जाना, बस यही तो थी अपनी मोहब्बत की कहानी... लोग कहते थे कि तुम्हारी आंखें मेरे लिए मोहब्बत बयां करती हैं, मैंने उन आंखों पर भरोसा कर लिया और अपने अरमानों को अपनी आंखों तक न आने दिया... मेरे होंठों पर छाई रहने वाली वह बनावटी मुस्कान, मेरे सैकड़ों दुखों को दिल में ही दफन करने पर मजबूर कर देती थी... तुम हर दिन मुझमें कमियां निकालती थी और मैं उन कमियों को खुद से दूर कर देता था और फिर एक दिन ऐसा आया कि मेरी सारी कमियां दूर हो गईं... मुझमें बचीं तो सिर्फ खूबियां... फिर तुम किसी और को 'सुधारने' के लिए चली गईं...
उन अधूरी कहानियों को याद करके, बिखरे पड़े टूटे ख्वाबों को एक धागे में पिरोकर, तुम्हारे बेरहम कुतर्कों को अपना नसीब मानकर होठों पर अपनी वही पुरानी मुस्कान बचाकर रखी है... आज भी उन अनजानी राहों पर सिर्फ इसलिए जाता हूं कि काश तुम किसी मोड़ पर मिल जाओ... मैं किसी अंजाम से नहीं डरता लेकिन तुम्हारे साथ किए गए उस वादे का मान रखने के लिए दुनिया से, अपने चाहने वालों से हजारों राज छुपाकर, तुम्हें लिखकर उनकी झोली में थोड़ी सा दर्द भरी खुशियां डालकर तुम्हें जिंदा रखने की, अपनी मोहब्बत को जिंदा रखने की कोशिश कर रहा हूं...
#क्वीन
तब मेरी इच्छाएं शून्य हो जाती थीं
मैं तुम्हारे अंदर अपने भगवान को खोजता था, पता नहीं क्यों लेकिन तुम जैसे ही मेरे सामने आती थी मेरी सारी हसरतें, मेरी आकांक्षाएं, मेरी इच्छाएं शून्य हो जाती थीं। ऐसा लगता था कि मेरे भगवान मेरे सामने आ गए हों, अब जिसके सामने, जिसके साथ उसके भगवान हों, उसे और क्या चाहिए....
समय बीता, माहौल बदला... फिर समझ में आया कि तुम तो मेरे भगवान से भी कहीं ऊपर का दर्जा रखती हो... बताओ भला! मैं हर दिन अपने भगवान की पूजा करता था लेकिन उनसे कभी नहीं पूछा कि भगवान, आपने खाना खाया? उनसे कभी नहीं पूछा कि आपको ठंड तो नहीं लग रही है? उन्हें अपने अवचेतन मस्तिष्क से दिल तक नहीं ला पाया लेकिन तुम्हारे पल-पल की चिंता करता था...
लेकिन इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी... सारी गलती मेरी थी... मैं ही तो था जो यह भी भूल गया कि तुम तो इंसान हो, मेरी तरह ही... अब तुम्हें भगवान की जगह पर बैठा दूंगा तो उन्हें बुरा तो लगेगा ही औऱ लगना भी चाहिए... बस उन्होंने कहा कि जाओ, तुम एक इंसान को मुझसे भी ऊपर का समझ बैठे हो तो मैं तुम्हारे भ्रम को तोड़ देता हूं... और उन्होंने मेरे उस भ्रम को तोड़ दिया... आखिर उनकी भी खुद को लेकर कुछ तो जिम्मेदारियां हैं ना...
तुम्हीं बताओ इन सब बातों के अलावा खुद को सांत्वना कैसे दे सकता हूं मैं?
#क्वीन
समय बीता, माहौल बदला... फिर समझ में आया कि तुम तो मेरे भगवान से भी कहीं ऊपर का दर्जा रखती हो... बताओ भला! मैं हर दिन अपने भगवान की पूजा करता था लेकिन उनसे कभी नहीं पूछा कि भगवान, आपने खाना खाया? उनसे कभी नहीं पूछा कि आपको ठंड तो नहीं लग रही है? उन्हें अपने अवचेतन मस्तिष्क से दिल तक नहीं ला पाया लेकिन तुम्हारे पल-पल की चिंता करता था...
लेकिन इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी... सारी गलती मेरी थी... मैं ही तो था जो यह भी भूल गया कि तुम तो इंसान हो, मेरी तरह ही... अब तुम्हें भगवान की जगह पर बैठा दूंगा तो उन्हें बुरा तो लगेगा ही औऱ लगना भी चाहिए... बस उन्होंने कहा कि जाओ, तुम एक इंसान को मुझसे भी ऊपर का समझ बैठे हो तो मैं तुम्हारे भ्रम को तोड़ देता हूं... और उन्होंने मेरे उस भ्रम को तोड़ दिया... आखिर उनकी भी खुद को लेकर कुछ तो जिम्मेदारियां हैं ना...
तुम्हीं बताओ इन सब बातों के अलावा खुद को सांत्वना कैसे दे सकता हूं मैं?
#क्वीन
कैसे उस दिन अपने भाई से नजर मिला पाई होगी तुम?
कैसा लगा होगा तुम्हें जब उसने तुम्हारे माथे से आंचल हटाया होगा... कैसा लगा होगा तुम्हें जब उसने तुम्हारे माथे को चूमा होगा, क्या तब तुम्हारा सुर्ख लाल चेहरा पीला नहीं हो गया होगा... कैसा लगा होगा जब अगले दिन सुबह तुमने खुद को उसकी बाहों में जकड़ा पाया होगा...
काश! काश कि तुम उन ऊंची अट्टालिकाओं ने नीचे जमीन पर आकर मेरी मोहब्बत को समझने की कोशिश करती... काश कि तुम समझ पाती कि बुलंदी से जर्रों का अंदाजा नहीं होता... पता है! अगर तुममें मेरे साथ जिंदगी गुजारने का अरमान होता हो मजहबी दीवारें कभी हमारे बीच में नहीं आतीं लेकिन तुम तो हार के उस कंगूरे पर खड़ी थी जिसकी नींव में सिर्फ मेरी नाकामयाब मोहब्बत मेरी जिंदगी के अनकहे पहलुओं पर मुस्कुराती दिख रही थी...
#क्वीन
Sunday, December 25, 2016
क्रिसमस और मेरा डर
याद है 25 दिसंबर की वह शाम जब तुमने फोन करके 'मैरी क्रिसमस' बोला था और मैंने सनातनी अहंकार में तुमसे कह दिया था कि हिंदू त्योहार कम पड़ गए हैं क्या? 'गौरव! तुमसे तो बात करना ही बेकार है...' तुमने तुरंत यही कहते हुए फोन काट दिया था ना.... उसके बाद अगले 3 दिन तुमने मुझसे बात ही नहीं की...
मुझे याद है 29 दिसंबर को सुबह तुमने फिर फोन किया... मैं हैरान था कि रात 3 बजे तक तो मैं तुमको सैकड़ों कॉल कर चुका हूं लेकिन तुमने फोन नहीं उठाया और फिर अचानक सुबह 5:45 पर कॉल क्यों? बस मानसिक जद्दोजहद में फोन उठाकर बाहर आ गया... मन में एक अजीब सा डर था कि ऐसा क्या हुआ जो तुमने इतनी सुबह फोन कर दिया...
तुमने कहा, 'गौरव! उस दिन लखनऊ में मेरी फ्रेंड के घर पर पार्टी थी और मैंने बहुत मुश्किल से पापा-मम्मी को मनाया था, पूरे 4 महीने 11 दिन के बाद मिल सकते थे हम लेकिन तुम्हे पूरी बात सुनने की आदत ही कहां है... मुझे पता है कि अब तुम्हारी आंखों से आंसू निकलने वाले हैं लेकिन प्लीज इतना याद रखना कि तुम्हारे सिद्धान्तों पर सिर्फ तुम्हारे लिए आघात कर सकती हूं...'
अब मेरा डर पश्चाताप में बदल चुका था....
# क्वीन
मुझे याद है 29 दिसंबर को सुबह तुमने फिर फोन किया... मैं हैरान था कि रात 3 बजे तक तो मैं तुमको सैकड़ों कॉल कर चुका हूं लेकिन तुमने फोन नहीं उठाया और फिर अचानक सुबह 5:45 पर कॉल क्यों? बस मानसिक जद्दोजहद में फोन उठाकर बाहर आ गया... मन में एक अजीब सा डर था कि ऐसा क्या हुआ जो तुमने इतनी सुबह फोन कर दिया...
तुमने कहा, 'गौरव! उस दिन लखनऊ में मेरी फ्रेंड के घर पर पार्टी थी और मैंने बहुत मुश्किल से पापा-मम्मी को मनाया था, पूरे 4 महीने 11 दिन के बाद मिल सकते थे हम लेकिन तुम्हे पूरी बात सुनने की आदत ही कहां है... मुझे पता है कि अब तुम्हारी आंखों से आंसू निकलने वाले हैं लेकिन प्लीज इतना याद रखना कि तुम्हारे सिद्धान्तों पर सिर्फ तुम्हारे लिए आघात कर सकती हूं...'
अब मेरा डर पश्चाताप में बदल चुका था....
# क्वीन
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