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Sunday, January 8, 2017

उस खेल में थकी सिर्फ तुम थी लेकिन...

पता है ऐसे मौके जिंदगी में बहुत कम आते हैं जब कुछ मिलने और उसी के खोने के लम्हें एक जैसे हों... मैंने दोनों लम्हों को महसूस किया है... जब तुमने मोहब्बत का इजहार किया और जब मोहब्बत से इनकार किया, वे दोनों लम्हें जानलेवा थे... बेहद अजीब था वह खेल, उसमें थकी तो सिर्फ तुम थी लेकिन हार हम दोनों गए थे... तुम खुद से और मैं अपने आप से ...

तुम्हारा मजबूर कर देना और मेरा मजबूर हो जाना, बस यही तो थी अपनी मोहब्बत की कहानी... लोग कहते थे कि तुम्हारी आंखें मेरे लिए मोहब्बत बयां करती हैं, मैंने उन आंखों पर भरोसा कर लिया और अपने अरमानों को अपनी आंखों तक न आने दिया... मेरे होंठों पर छाई रहने वाली वह बनावटी मुस्कान, मेरे सैकड़ों दुखों को दिल में ही दफन करने पर मजबूर कर देती थी... तुम हर दिन मुझमें कमियां निकालती थी और मैं उन कमियों को खुद से दूर कर देता था और फिर एक दिन ऐसा आया कि मेरी सारी कमियां दूर हो गईं...  मुझमें बचीं तो सिर्फ खूबियां... फिर तुम किसी और को 'सुधारने' के लिए चली गईं...

उन अधूरी कहानियों को याद करके, बिखरे पड़े टूटे ख्वाबों को एक धागे में पिरोकर, तुम्हारे बेरहम कुतर्कों को अपना नसीब मानकर होठों पर अपनी वही पुरानी मुस्कान बचाकर रखी है... आज भी उन अनजानी राहों पर सिर्फ इसलिए जाता हूं कि काश तुम किसी मोड़ पर मिल जाओ... मैं किसी अंजाम से नहीं डरता लेकिन तुम्हारे साथ किए गए उस वादे का मान रखने के लिए दुनिया से, अपने चाहने वालों से हजारों राज छुपाकर, तुम्हें लिखकर उनकी झोली में थोड़ी सा दर्द भरी खुशियां डालकर तुम्हें जिंदा रखने की, अपनी मोहब्बत को जिंदा रखने की कोशिश कर रहा हूं...
#क्वीन

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