वह कविता जो तुमने लिखी थी, तुम्हारा कॉन्फिडेंस कितना गिरा हुआ था उस दिन। आखिर पहली कविता थी तुम्हारी। डर रही थी तुम कि किसी को पसंद आएगी भी या नहीं। पता नहीं कैसी थी तुम्हारी वह कविता। लेकिन आज एक सच बता रहा हूँ तुम्हें। तुम्हारी उसी कविता से प्रेरणा लेकर मैंने भी लिखना शुरू किया था। तुम्हारी तरह सधा हुआ तो नहीं लिख पाया पर जो मन में आता था वह लिख देता था।
सच में 'कुछ भी' लिख देता था और आज भी वैसा ही हूँ। तुम तो खुद में एक कविता थी और मुझे तो सिर्फ 'भाषण' देना आता था। आकाश और पाताल का अंतर होता है लिखने और बोलने में...
पर आज देखो, शायरी भी लिखने लगा लेकिन वो मेरी नहीं होती। हर एक शब्द में तुम ही तो बसती हो, सिर्फ तुम...
#क्वीन
'क्वीन' कौन है? इस सवाल का जवाब तो मैं भी खोज रहा हूं। मैं तो बस इतना जानता हूं कि यह सामान्य को विशिष्ट बनाने का एक प्रयास है... कोई अलंकार नहीं... सिर्फ सच्ची भावनाएं... तुम थी तो सब कुछ था... तुम नहीं हो तो भी सब कुछ है....लेकिन तब वह 'सब कुछ' अच्छा लगता था लेकिन अब.... #क्वीन
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Saturday, June 25, 2016
मेरी पहली कविता
उस दिन जब तुमको अपनी पहली कविता भेजी थी, तो याद है तुमने क्या कहा था...गौरव, ये तो मेरी है...कुछ अपना लिखो...
मेरे जर्रे-जर्रे में बस तुम ही तो समाई थी, तुम्हारे सिवा कभी कुछ सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली। कैसे लिखता कुछ और? हर पल तुम्हारे ख्यालों में ही तो खोया रहता था। बहुत गुरूर था तुममें, मेरी लिखी हर चीज को अपना साबित कर देती थी। फिर अपनी 'उस' दोस्त को पढ़कर सुनाती थी कि देखो गौरव ने मेरे लिए क्या लिखा है।
तुमको लगता था कि मैं सब कुछ तुम्हारे लिए लिए ही लिखता हूँ सही सोचती थी तुम...लेकिन आज... आज तो अनजान लोग मेरी कहानी को खुद से जोड़ लेते हैं... कॉमेंट्स पढ़ती हो ना तुम... अब हमारी कहानी में तुम्हारी और मेरी जगह किन्हीं और लोगों ने ले ली है...कैसा लगता है तुमको?
#क्वीन
मेरे जर्रे-जर्रे में बस तुम ही तो समाई थी, तुम्हारे सिवा कभी कुछ सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली। कैसे लिखता कुछ और? हर पल तुम्हारे ख्यालों में ही तो खोया रहता था। बहुत गुरूर था तुममें, मेरी लिखी हर चीज को अपना साबित कर देती थी। फिर अपनी 'उस' दोस्त को पढ़कर सुनाती थी कि देखो गौरव ने मेरे लिए क्या लिखा है।
तुमको लगता था कि मैं सब कुछ तुम्हारे लिए लिए ही लिखता हूँ सही सोचती थी तुम...लेकिन आज... आज तो अनजान लोग मेरी कहानी को खुद से जोड़ लेते हैं... कॉमेंट्स पढ़ती हो ना तुम... अब हमारी कहानी में तुम्हारी और मेरी जगह किन्हीं और लोगों ने ले ली है...कैसा लगता है तुमको?
#क्वीन
Friday, June 24, 2016
आंखें देखी थी अपनी?
तुम्हें याद है? उस दिन तुम कॉलेज से जल्दी चली गई थी और मैं लंच टाइम में तुमको यहाँ से वहाँ खोजता रहा। वही 45 मिनट तो होता था मेरे पास, जब मैं तुम्हें इतने करीब से देख पाता था। क्या करता जिस दिन तुमको नहीं देखता था उस दिन मन में एक अजीब सी बेचैनी रहती थी। ऐसा लगता था जैसे कुछ खो सा गया हो। फिर तुम्हारी उस खास दोस्त ने बताया कि तुम्हारी तबियत ख़राब हो गई थी जिसकी वजह से तुम घर चली गई। दोपहर का 1 बज रहा था। मैंने तुम्हें 100 से भी ज्यादा कॉल किए लेकिन तुमने फोन नहीं उठाया। शायद आराम कर रही थी तुम।
तुम्हारे घर के नीचे शाम 7 बजे तक खड़ा रहा। आखिर तुमने फोन उठाया और मुझे अपनी बीमारी की वजह बताई। तुम बिलकुल पागल थी। क्यों करती थी इतनी परवाह उस इंसान की जो तुम्हें कुछ भी नहीं समझता था? उसकी वजह से खुद को बीमार कर लेती थी।
जब मैं दवाइयाँ लेकर वापस तुम्हारे घर आया और तुम दवाइयाँ लेने नीचे आई, उस वक़्त अपनी आँखें देखी थीं? कितनी लाल थीं वे....
कितना रोया था उस दिन मैं... जानती हो क्यों? क्योंकि मुझे तुम्हारे आंसुओं से फर्क पड़ता था, लेकिन तुम्हें.......
#क्वीन
जब मैं दवाइयाँ लेकर वापस तुम्हारे घर आया और तुम दवाइयाँ लेने नीचे आई, उस वक़्त अपनी आँखें देखी थीं? कितनी लाल थीं वे....
कितना रोया था उस दिन मैं... जानती हो क्यों? क्योंकि मुझे तुम्हारे आंसुओं से फर्क पड़ता था, लेकिन तुम्हें.......
#क्वीन
कैसे अपनाती मुझे...
हां, उस दिन हार गया था मैं। क्यों तुमने ऐसी शर्त रखी जिसे पूरा करना मेरे लिए मुमकिन ही नहीं था। तुम तो जानती थी ना कि मैं अपने दायित्व को किसी भी हालत में छोड़ नहीं सकता। मेरे लिए सब कुछ मेरा दायित्व ही तो था। मेरे कर्म के सिद्धान्त का आधार भी वही था और मेरी पहचान भी।
अगर तुम्हारी बात मान लेता तो शायद तुम्हें तो पा लेता लेकिन खुद को खो देता। क्या ऐसे गौरव को स्वीकार करना तुम्हारे लिए संभव होता?
#क्वीन
अगर तुम्हारी बात मान लेता तो शायद तुम्हें तो पा लेता लेकिन खुद को खो देता। क्या ऐसे गौरव को स्वीकार करना तुम्हारे लिए संभव होता?
#क्वीन
Thursday, June 23, 2016
कौन हो तुम...
लोग पूछते हैं कौन हो तुम।
अगर बताता हूँ तो मानते नहीं। क्यों नहीं हो सकती तुम वो?
अगर बताता हूँ तो मानते नहीं। क्यों नहीं हो सकती तुम वो?
कुछ पुराना:
क्या मेरा 'काफिर' होना मेरी गलती थी। बिलकुल नहीं।
ये तो एक तोहफा था जो मेरे पूर्व जन्मों के सद्कर्मों के कारण मिला था।
सिर्फ इस बात की वजह से तो नहीं गई थी ना तुम, फिर वजह क्या थी? बस उसी वजह को तो आज तक खोज रहा हूँ।
काश कोई बता पाता...
#क्वीन
क्या मेरा 'काफिर' होना मेरी गलती थी। बिलकुल नहीं।
ये तो एक तोहफा था जो मेरे पूर्व जन्मों के सद्कर्मों के कारण मिला था।
सिर्फ इस बात की वजह से तो नहीं गई थी ना तुम, फिर वजह क्या थी? बस उसी वजह को तो आज तक खोज रहा हूँ।
काश कोई बता पाता...
#क्वीन
अब लोग 'तुम्हें' पूछते हैं...
याद है तुम्हें, तुमने कहा था कि अगर अब कभी 'ये' सब लिखा तो मुझसे बात मत करना। मैंने तुम्हारी नहीं मानी, खैर तुमने कहा कि जैसा मन है वैसा करो लेकिन मुझसे सपॉर्ट की उम्मीद मत रखना।
मैंने भी कब अपेक्षा की थी की कोई मेरे दायित्व में मेरा साथ देते हुए साझेदारी करेगा।
लेकिन अपने मन के उन विचारों को किससे शेयर करता जो सिर्फ मेरे थे, जो किसी और के हिस्से में नहीं आते थे।
खैर, वह भी एक दौर था...काफी सुखद भी था...
जब तुम मेरे साथ थी तब लोग मुझे पूछते थे और अब 'तुम्हें' पूछने लगे हैं।
#क्वीन
मैंने भी कब अपेक्षा की थी की कोई मेरे दायित्व में मेरा साथ देते हुए साझेदारी करेगा।
लेकिन अपने मन के उन विचारों को किससे शेयर करता जो सिर्फ मेरे थे, जो किसी और के हिस्से में नहीं आते थे।
खैर, वह भी एक दौर था...काफी सुखद भी था...
जब तुम मेरे साथ थी तब लोग मुझे पूछते थे और अब 'तुम्हें' पूछने लगे हैं।
#क्वीन
Wednesday, June 22, 2016
वह अंतिम मुलाकात
तुम्हें अंतिम बार जब देखा था तो बहुत खुश था, इसलिए नहीँ कि तुम बहुत खूबसूरत लग रही थी बल्कि इसलिए क्योंकि मैं उस जगह पर आखिरी शख्श था जो तुम्हें देख रहा था।
तुम चली गई। उम्मीद थी कि तुम अपनी मंजिल तक पहुँच कर मुझसे एक बार तो बात जरूर करोगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कुछ दिन के इन्तजार के बाद मैंने तुम्हारा नंबर भी डिलीट कर दिया। जिंदगी की पहली ऐसी लड़की थी तुम जो मेरी कल्पनाओं को हक़ीक़त में बदल सकती थी। पता नहीं इसे मोहब्बत कहते हैं या कुछ और। मुझे तो बस इतना पता है कि जिस दिन तुम मेरी नजरों से देखोगी, तुम्हें अपनी ज़िन्दगी और भी खूबसूरत लगने लगेगी।
तुमने मुझे बहुत कुछ दिया है, अनजाने में ही सही लेकिन दिया तो है ही...
कल पूरे दिन तुम्हारी कॉल का इंतजार किया, लेकिन परिणाम तो शून्य ही होना था क्योंकि मेरा लक्ष्य भी तो 'शून्य' की प्राप्ति ही तो है...
मेरा स्वाभिमान ही मेरी ताकत है...और तुम्हारा 'बचपना' मेरी कमजोरी....
#क्वीन
तुम चली गई। उम्मीद थी कि तुम अपनी मंजिल तक पहुँच कर मुझसे एक बार तो बात जरूर करोगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कुछ दिन के इन्तजार के बाद मैंने तुम्हारा नंबर भी डिलीट कर दिया। जिंदगी की पहली ऐसी लड़की थी तुम जो मेरी कल्पनाओं को हक़ीक़त में बदल सकती थी। पता नहीं इसे मोहब्बत कहते हैं या कुछ और। मुझे तो बस इतना पता है कि जिस दिन तुम मेरी नजरों से देखोगी, तुम्हें अपनी ज़िन्दगी और भी खूबसूरत लगने लगेगी।
तुमने मुझे बहुत कुछ दिया है, अनजाने में ही सही लेकिन दिया तो है ही...
कल पूरे दिन तुम्हारी कॉल का इंतजार किया, लेकिन परिणाम तो शून्य ही होना था क्योंकि मेरा लक्ष्य भी तो 'शून्य' की प्राप्ति ही तो है...
मेरा स्वाभिमान ही मेरी ताकत है...और तुम्हारा 'बचपना' मेरी कमजोरी....
#क्वीन
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