उस दिन जब तुमको अपनी पहली कविता भेजी थी, तो याद है तुमने क्या कहा था...गौरव, ये तो मेरी है...कुछ अपना लिखो...
मेरे जर्रे-जर्रे में बस तुम ही तो समाई थी, तुम्हारे सिवा कभी कुछ सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली। कैसे लिखता कुछ और? हर पल तुम्हारे ख्यालों में ही तो खोया रहता था। बहुत गुरूर था तुममें, मेरी लिखी हर चीज को अपना साबित कर देती थी। फिर अपनी 'उस' दोस्त को पढ़कर सुनाती थी कि देखो गौरव ने मेरे लिए क्या लिखा है।
तुमको लगता था कि मैं सब कुछ तुम्हारे लिए लिए ही लिखता हूँ सही सोचती थी तुम...लेकिन आज... आज तो अनजान लोग मेरी कहानी को खुद से जोड़ लेते हैं... कॉमेंट्स पढ़ती हो ना तुम... अब हमारी कहानी में तुम्हारी और मेरी जगह किन्हीं और लोगों ने ले ली है...कैसा लगता है तुमको?
#क्वीन
'क्वीन' कौन है? इस सवाल का जवाब तो मैं भी खोज रहा हूं। मैं तो बस इतना जानता हूं कि यह सामान्य को विशिष्ट बनाने का एक प्रयास है... कोई अलंकार नहीं... सिर्फ सच्ची भावनाएं... तुम थी तो सब कुछ था... तुम नहीं हो तो भी सब कुछ है....लेकिन तब वह 'सब कुछ' अच्छा लगता था लेकिन अब.... #क्वीन
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