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Tuesday, June 28, 2016

तुमसे ही तो सीखा है

मेरी जिन बातों को तुम बड़ी आसानी से अनसुना कर देती थी, वे सामान्य बातें नहीं थीं, उन बातों के हर एक शब्द में बस तुम्हारा ही अहसास तो होता था...मेरी ओर चुपके से एक नजर देख कर निगाहें फेर लेना बड़ा आसान था ना तुम्हारे लिए, लेकिन तुम्हारी उस अनदेखी का दर्द आज भी दिल की गहराइयों में दबा बैठा है। तुम्हारी एक झलक के लिए अपने उसूलों तक से बगावत कर लेता था... आसान नहीं था मेरे लिए वह सब करना लेकिन करता था, जानती हो क्यों? क्योंकि तुम्हारी बेरुखी को करीब से महसूस करने की आदत पड़ गई थी...
मोहब्बत में शर्तें नहीं होतीं, बस यही मानकर तुम्हारी हर एक बात को मानता गया, मुझे तो इतना ख्याल भी नहीं रहा कि मैं तो शर्त नहीं रख रहा था लेकिन अनजाने में तुम्हारी हर एक शर्त को मानता जा रहा था। क्या मैं गलत था? नहीं, मैं तब भी सही था और आज भी सही हूं... मैं तुम्हारे सामने जितना कमजोर पड़ता था, आज परिस्थितियों के सामने उतनी ही मजबूती से खड़ा रहता हूं....
जब वह सब कुछ झेल लिया तो उसके सामने तो यह कुछ भी नहीं है... मेरी कमजोरियों को मेरी ताकत तुमने ही तो बनाया था... मुझे पता है आज तुमको मेरी बेरुखी परेशान करती होगी लेकिन यह भी तो तुमने ही सिखाया है ना....
‪#‎क्वीन‬

Monday, June 27, 2016

कैसे बताऊँ कौन हो तुम?

अब तो कभी-कभी यह तक सोचने लगता हूँ कि तुम्हारा मेरी ज़िन्दगी में एक 'स्वप्न' की तरह आना कहीं कोई ईश्वरीय योजना तो नहीं थी... क्या था मैं...कुछ भी तो नहीं...कोई नहीं जानता था मुझे...जो जानते भी थे, वे 'मानते' नहीं थे...पर अब लोग जानने लगे हैं...इससे भी ख़ुशी की बात यह है कि वे मानने भी लगे हैं।
एक वादा करता हूँ आज तुमसे...तुमको सब कुछ ब्याज सहित वापस करूँगा...तुम मेरी पहचान बनाने में जो सहयोग कर रही हो उसका बदले में मैं तुम्हें 'विशिष्ट' बना दूंगा। मैं जानता हूँ किसी सामान्य(व्यवहार के परिपेक्ष्य में) सी लड़की को #क्वीन बनाना इतना आसान नहीं है पर विश्वास करो इतना मुश्किल भी नहीं है। तुमने ही तो सिखाया था मुझे...
पर कभी-कभी एक बात बहुत परेशान करती है, अजब सी कश्मकश में फंस जाता हूँ जब कोई तुम्हारा नाम पूछता है...निरुत्तर हो जाता हूँ जब कोई यह पूछता है कि आखिर #क्वीन है कौन...
बस यहीं पर चुप हो जाता हूँ और कोसिस करता हूँ लोगों को बरगलाने की...और कोई विकल्प भी तो नहीं है ना... कल्पनाओं का वास्तविक नाम हो भी कैसे सकता है...

मेरी कोई 'एक्स' नहीं...

उस दिन पहली बार देखा था तुम्हें और उसी दिन 'मोहब्बत' पर पहला ब्लॉग भी लिखा था। तुमको लिंक भी भेजा था ब्लॉग का...पर भूल गया था कि तुम्हारा स्मार्टफोन तो हिंदी सपोर्ट ही नहीं करता था। पता नहीं तुमने वह ब्लॉग आज तक पढ़ा या नहीं लेकिन तुमको पता है मेरे द्वारा लिखे गए ब्लॉग्स में सबसे ज्यादा पढ़े गए 5 ब्लॉग्स में से 1 है वह ब्लॉग।
इसके बाद जब कभी तुम्हारी नजर में मेरी कोई शायरी आती थी तो तुम मुझसे पूछा करती थी, 'गौरव, कौन है वह?' कैसे बताता तुमको,तुम्हारे ही सामने खड़े होकर...वह भी तब जब मुझे इस शाश्वत सत्य का ज्ञान हो कि हम दोनों कभी एक नहीं हो सकते।
तुम अटकलें लगाती थी, तुमको यही लगता था ना कि वो सब मैं अपनी किसी 'एक्स' के लिए लिखता हूँ। गलत थी तुम, ना तो मेरी कोई 'एक्स' थी और ना ही कोई 'प्रेजेंट'...
मैं कल्पनाओं के सागर में डूबकर वांछित प्रेम की पराकाष्ठा तक पहुँच जाता था। अकथित शब्दों के पीछे छिपे शाश्वत भाव को काश तुमने समझ लिया होता...कभी-कभी यह ख्याल भी आ जाता है लेकिन फिर इस ख्याल की हत्या कर देता हूँ क्योंकि अगर तुम समझ भी जाती तो भी किसी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता....
आज भी उन्हीं कल्पनाओं में डूबकर तुम्हें अपने हर एक लम्हे में महसूस करता हूँ लेकिन एक बार सोचकर देखो अगर मुझमें यह कल्पनाशक्ति भी न होती तो क्या होता...
#क्वीन

Sunday, June 26, 2016

पहली छुअन का अहसास

याद है ना तुमको...उस दिन तुम मेरे साथ अपने एडमिशन की बात करने के लिए कॉलेज गई थी... बहुत मुश्किल होता था तुम्हारा घर से बाहर निकलना... पहली बार हम एक साथ कहीं बाहर निकले थे...नहीं तो घर और कॉलेज के सिवा कहीं देखना भी नहीं हो पाता था। तुम्हारे घर वाले बहुत विश्वास करते थे मुझ पर... छात्र राजनीति से जुड़े रहने के कारण हमें लाइन में नहीं लगना पड़ा और 10 मिनट में सारी जानकारियां लेकर हम कॉलेज से बाहर निकल आए..

इस शानदार मौके को हम दोनों में से कोई गवांना नहीं चाहता था... मैंने तुमसे कहा कि चलो मूवी देखने चलते हैं लेकिन तुम... आखिर तुम तो तुम ही थी ना...तुमने कहा कि नहीं आज पहली बार साथ में बाहर निकले हैं तो मंदिर चलेंगे... 

वहां से 35 किलोमीटर दूर के एक मंदिर में जाने का हमने प्लान बनाया... मां भगवती ने दर्शन तो दे दिए लेकिन वहां से वापस आने के बाद जो बारिश शुरू हुई थी, उसको बयां करना नामुमकिन है... आंखें नहीं खुल रही थीं... बाइक पर जब उस दिन तुम मेरे साथ बैठी थी और तुम्हारे हाथों ने मेरे कंधे को डरकर दबाया था, तुम्हारे उस डर ने मुझे पहली छुअन का अहसास दिलाया था... 2 घंटे तक हम बारिश में भीगते रहे लेकिन बारिश रुकने के बाद सिर्फ 10 मिनट में जिस तरह से हमारे कपड़े पूरी तरह से सूख गए थे वह सच में अकल्पनीय था...
लेकिन यही तो ईश्वर की क्षमता है...
‪#‎क्वीन‬

हमारी पहली चैटिंग

उस दिन पहली बार चैट कर रहे थे हम। अब की तरह ही मैं हिंदी में लिख रहा था और तुम अंग्रेजी में...उस दिन तुमने कहा था, 'गौरव, तुम तो इंग्लिश मीडियम से हो फिर भी हिंदी में मेसेज करते हो, इंग्लिश में मेसेज करो...मुझे ज्यादा अच्छे से समझ में आएगा।' और फिर मैंने क्या कहा था याद है तुम्हें, ' दुनिया की कोई भी महिला बहुत सुंदर हो सकती है। यहाँ तक कि वह एमा स्टोन,चार्लीज़ थेरॉन, ओलिविया वाइल्ड,कैटरीना या माधुरी से भी ज्यादा खूबसूरत हो सकती है लेकिन वह मेरी मां से सुंदर नहीं हो सकती... और उसी तरह हिंदी भी है... मां है मेरी...उससे बेहतर और सुविधाजनक कुछ भी नहीं हो सकता।'

आज भी वह मेसेज सेव है। वैसे तुमको हिंदी ज्यादा नहीं आती थी तो उसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी। तुम जहाँ से आई थी वहां तो कोई हिंदी का क..ख..ग.. भी नहीं जानता था। और फिर वह दिन तो याद ही होगा तुम्हें जब मैं तुमसे किसी छोटी सी बात पर नाराज होकर बात नहीं कर रहा था...तुमने बहुत मासूमियत से भरा हुआ हिंदी में वह मेसेज किया था, 'गौरव, देखो अब तो हिंदी में भी लिखना सीख गई, प्लीज बात करो ना...'
सच में बिलकुल पागल थी तुम...और मुझे भी बना कर चली गई...
लेकिन एक सच और भी है...तुम भले ही मुझको न मिली हो लेकिन मोहब्बत की भाषा 'उर्दू' तो तुम्हारी वजह से ही सीख पाया...लिखना न सही पर सुनकर समझना तो सिखा ही दिया था तुम्हारी मोहब्बत ने....
#क्वीन

Saturday, June 25, 2016

तुम्हारी वह पहली कविता

वह कविता जो तुमने लिखी थी, तुम्हारा कॉन्फिडेंस कितना गिरा हुआ था उस दिन। आखिर पहली कविता थी तुम्हारी। डर रही थी तुम कि किसी को पसंद आएगी भी या नहीं। पता नहीं कैसी थी तुम्हारी वह कविता। लेकिन आज एक सच बता रहा हूँ तुम्हें। तुम्हारी उसी कविता से प्रेरणा लेकर मैंने भी लिखना शुरू किया था। तुम्हारी तरह सधा हुआ तो नहीं लिख पाया पर जो मन में आता था वह लिख देता था।
सच में 'कुछ भी' लिख देता था और आज भी वैसा ही हूँ। तुम तो खुद में एक कविता थी और मुझे तो सिर्फ 'भाषण' देना आता था। आकाश और पाताल का अंतर होता है लिखने और बोलने में...
पर आज देखो, शायरी भी लिखने लगा लेकिन वो मेरी नहीं होती। हर एक शब्द में तुम ही तो बसती हो, सिर्फ तुम...
‪#‎क्वीन‬

मेरी पहली कविता

उस दिन जब तुमको अपनी पहली कविता भेजी थी, तो याद है तुमने क्या कहा था...गौरव, ये तो मेरी है...कुछ अपना लिखो...
मेरे जर्रे-जर्रे में बस तुम ही तो समाई थी, तुम्हारे सिवा कभी कुछ सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली। कैसे लिखता कुछ और? हर पल तुम्हारे ख्यालों में ही तो खोया रहता था। बहुत गुरूर था तुममें, मेरी लिखी हर चीज को अपना साबित कर देती थी। फिर अपनी 'उस' दोस्त को पढ़कर सुनाती थी कि देखो गौरव ने मेरे लिए क्या लिखा है।
तुमको लगता था कि मैं सब कुछ तुम्हारे लिए लिए ही लिखता हूँ सही सोचती थी तुम...लेकिन आज... आज तो अनजान लोग मेरी कहानी को खुद से जोड़ लेते हैं... कॉमेंट्स पढ़ती हो ना तुम... अब हमारी कहानी में तुम्हारी और मेरी जगह किन्हीं और लोगों ने ले ली है...कैसा लगता है तुमको?
‪#‎क्वीन‬