उस दिन पहली बार देखा था तुम्हें और उसी दिन 'मोहब्बत' पर पहला ब्लॉग भी लिखा था। तुमको लिंक भी भेजा था ब्लॉग का...पर भूल गया था कि तुम्हारा स्मार्टफोन तो हिंदी सपोर्ट ही नहीं करता था। पता नहीं तुमने वह ब्लॉग आज तक पढ़ा या नहीं लेकिन तुमको पता है मेरे द्वारा लिखे गए ब्लॉग्स में सबसे ज्यादा पढ़े गए 5 ब्लॉग्स में से 1 है वह ब्लॉग।
इसके बाद जब कभी तुम्हारी नजर में मेरी कोई शायरी आती थी तो तुम मुझसे पूछा करती थी, 'गौरव, कौन है वह?' कैसे बताता तुमको,तुम्हारे ही सामने खड़े होकर...वह भी तब जब मुझे इस शाश्वत सत्य का ज्ञान हो कि हम दोनों कभी एक नहीं हो सकते।
तुम अटकलें लगाती थी, तुमको यही लगता था ना कि वो सब मैं अपनी किसी 'एक्स' के लिए लिखता हूँ। गलत थी तुम, ना तो मेरी कोई 'एक्स' थी और ना ही कोई 'प्रेजेंट'...
मैं कल्पनाओं के सागर में डूबकर वांछित प्रेम की पराकाष्ठा तक पहुँच जाता था। अकथित शब्दों के पीछे छिपे शाश्वत भाव को काश तुमने समझ लिया होता...कभी-कभी यह ख्याल भी आ जाता है लेकिन फिर इस ख्याल की हत्या कर देता हूँ क्योंकि अगर तुम समझ भी जाती तो भी किसी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता....
आज भी उन्हीं कल्पनाओं में डूबकर तुम्हें अपने हर एक लम्हे में महसूस करता हूँ लेकिन एक बार सोचकर देखो अगर मुझमें यह कल्पनाशक्ति भी न होती तो क्या होता...
#क्वीन
'क्वीन' कौन है? इस सवाल का जवाब तो मैं भी खोज रहा हूं। मैं तो बस इतना जानता हूं कि यह सामान्य को विशिष्ट बनाने का एक प्रयास है... कोई अलंकार नहीं... सिर्फ सच्ची भावनाएं... तुम थी तो सब कुछ था... तुम नहीं हो तो भी सब कुछ है....लेकिन तब वह 'सब कुछ' अच्छा लगता था लेकिन अब.... #क्वीन
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Monday, June 27, 2016
मेरी कोई 'एक्स' नहीं...
Sunday, June 26, 2016
पहली छुअन का अहसास
इस शानदार मौके को हम दोनों में से कोई गवांना नहीं चाहता था... मैंने तुमसे कहा कि चलो मूवी देखने चलते हैं लेकिन तुम... आखिर तुम तो तुम ही थी ना...तुमने कहा कि नहीं आज पहली बार साथ में बाहर निकले हैं तो मंदिर चलेंगे...
वहां से 35 किलोमीटर दूर के एक मंदिर में जाने का हमने प्लान बनाया... मां भगवती ने दर्शन तो दे दिए लेकिन वहां से वापस आने के बाद जो बारिश शुरू हुई थी, उसको बयां करना नामुमकिन है... आंखें नहीं खुल रही थीं... बाइक पर जब उस दिन तुम मेरे साथ बैठी थी और तुम्हारे हाथों ने मेरे कंधे को डरकर दबाया था, तुम्हारे उस डर ने मुझे पहली छुअन का अहसास दिलाया था... 2 घंटे तक हम बारिश में भीगते रहे लेकिन बारिश रुकने के बाद सिर्फ 10 मिनट में जिस तरह से हमारे कपड़े पूरी तरह से सूख गए थे वह सच में अकल्पनीय था...
लेकिन यही तो ईश्वर की क्षमता है...
#क्वीन
हमारी पहली चैटिंग
उस दिन पहली बार चैट कर रहे थे हम। अब की तरह ही मैं हिंदी में लिख रहा था और तुम अंग्रेजी में...उस दिन तुमने कहा था, 'गौरव, तुम तो इंग्लिश मीडियम से हो फिर भी हिंदी में मेसेज करते हो, इंग्लिश में मेसेज करो...मुझे ज्यादा अच्छे से समझ में आएगा।' और फिर मैंने क्या कहा था याद है तुम्हें, ' दुनिया की कोई भी महिला बहुत सुंदर हो सकती है। यहाँ तक कि वह एमा स्टोन,चार्लीज़ थेरॉन, ओलिविया वाइल्ड,कैटरीना या माधुरी से भी ज्यादा खूबसूरत हो सकती है लेकिन वह मेरी मां से सुंदर नहीं हो सकती... और उसी तरह हिंदी भी है... मां है मेरी...उससे बेहतर और सुविधाजनक कुछ भी नहीं हो सकता।'
आज भी वह मेसेज सेव है। वैसे तुमको हिंदी ज्यादा नहीं आती थी तो उसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी। तुम जहाँ से आई थी वहां तो कोई हिंदी का क..ख..ग.. भी नहीं जानता था। और फिर वह दिन तो याद ही होगा तुम्हें जब मैं तुमसे किसी छोटी सी बात पर नाराज होकर बात नहीं कर रहा था...तुमने बहुत मासूमियत से भरा हुआ हिंदी में वह मेसेज किया था, 'गौरव, देखो अब तो हिंदी में भी लिखना सीख गई, प्लीज बात करो ना...'
सच में बिलकुल पागल थी तुम...और मुझे भी बना कर चली गई...
लेकिन एक सच और भी है...तुम भले ही मुझको न मिली हो लेकिन मोहब्बत की भाषा 'उर्दू' तो तुम्हारी वजह से ही सीख पाया...लिखना न सही पर सुनकर समझना तो सिखा ही दिया था तुम्हारी मोहब्बत ने....
#क्वीन
Saturday, June 25, 2016
तुम्हारी वह पहली कविता
सच में 'कुछ भी' लिख देता था और आज भी वैसा ही हूँ। तुम तो खुद में एक कविता थी और मुझे तो सिर्फ 'भाषण' देना आता था। आकाश और पाताल का अंतर होता है लिखने और बोलने में...
पर आज देखो, शायरी भी लिखने लगा लेकिन वो मेरी नहीं होती। हर एक शब्द में तुम ही तो बसती हो, सिर्फ तुम...
#क्वीन
मेरी पहली कविता
मेरे जर्रे-जर्रे में बस तुम ही तो समाई थी, तुम्हारे सिवा कभी कुछ सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली। कैसे लिखता कुछ और? हर पल तुम्हारे ख्यालों में ही तो खोया रहता था। बहुत गुरूर था तुममें, मेरी लिखी हर चीज को अपना साबित कर देती थी। फिर अपनी 'उस' दोस्त को पढ़कर सुनाती थी कि देखो गौरव ने मेरे लिए क्या लिखा है।
तुमको लगता था कि मैं सब कुछ तुम्हारे लिए लिए ही लिखता हूँ सही सोचती थी तुम...लेकिन आज... आज तो अनजान लोग मेरी कहानी को खुद से जोड़ लेते हैं... कॉमेंट्स पढ़ती हो ना तुम... अब हमारी कहानी में तुम्हारी और मेरी जगह किन्हीं और लोगों ने ले ली है...कैसा लगता है तुमको?
#क्वीन
Friday, June 24, 2016
आंखें देखी थी अपनी?
जब मैं दवाइयाँ लेकर वापस तुम्हारे घर आया और तुम दवाइयाँ लेने नीचे आई, उस वक़्त अपनी आँखें देखी थीं? कितनी लाल थीं वे....
कितना रोया था उस दिन मैं... जानती हो क्यों? क्योंकि मुझे तुम्हारे आंसुओं से फर्क पड़ता था, लेकिन तुम्हें.......
#क्वीन
कैसे अपनाती मुझे...
अगर तुम्हारी बात मान लेता तो शायद तुम्हें तो पा लेता लेकिन खुद को खो देता। क्या ऐसे गौरव को स्वीकार करना तुम्हारे लिए संभव होता?
#क्वीन