तुम बस मेरे स्वप्नों में ही मेरी थी। यह बात समझने में मुझे 3 साल लग गए। क्या करता, तुम्हारे हर एक झूठ को सच मानकर उसी में जिए जा रहा था।
तुमको पता है मेरी ज़िन्दगी के हर एक हिस्से में , हर एक किस्से में बस तुम्हारी ही कल्पना तो बसती थी। लेकिन तुम्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मैं तो तुम्हारे लिए बस एक 'विकल्प' था। क्या करता मैं? क्या कर सकता था मैं?
अंत में तुम मजहबी बहाने बनाने लगी और मैं अपनी कल्पनाओं के समंदर में डूबने लगा। कल्पनाओं की अट्टालिका बनाने में मुझे कुछ वक़्त तो जरूर लगा लेकिन खुश हूँ कि उस अट्टालिका की नींव से लेकर अंतिम छोर तक तुम सिर्फ मेरी ही हो...
#क्वीन
'क्वीन' कौन है? इस सवाल का जवाब तो मैं भी खोज रहा हूं। मैं तो बस इतना जानता हूं कि यह सामान्य को विशिष्ट बनाने का एक प्रयास है... कोई अलंकार नहीं... सिर्फ सच्ची भावनाएं... तुम थी तो सब कुछ था... तुम नहीं हो तो भी सब कुछ है....लेकिन तब वह 'सब कुछ' अच्छा लगता था लेकिन अब.... #क्वीन
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Friday, September 2, 2016
उस दिन टूट गया था भ्रम
तुम्हारे साथ एक-एक पल बिताने का अहसास बेहद खास होता था। पहले तो ऐसा लगता था जैसे तुम भी मेरे साथ बिताए हर एक पल को दिल से जी लेना चाहती हो लेकिन बाद में महसूस हुआ कि यह मात्र मेरा भ्रम है। तुम्हारे प्रेम और समर्पण पर प्रश्नचिन्ह लगाने की क्षमता तो मुझमें नहीं है लेकिन ऐसा प्रारब्ध अवांछित था।
जीवन की सबसे आसान लड़ाई हार गया था मैं... और जानती हो दुःख यह नहीं है कि मैं वह लड़ाई हार गया बल्कि दुःख इस बात का है कि मैंने उस लड़ाई को लड़ा ही नहीं।तुमने अगर उस लड़ाई से पहले मेरा हाथ न छोड़ा होता तो मैं उस लड़ाई को लड़ जाता। और विश्वास मानो मैं वह लड़ाई जीत भी जाता। लेकिन जानता था बिना तुम्हारे उस जीत के मायने कुछ भी नहीं।
जब जंग अपनों से हो तो पीछे हट जाने में ही भलाई होती है और जब लड़ाई अपने आप से हो तो अपने अहंकार को कुचलकर विजय प्राप्त करने वाला ही तो पुरुषार्थी कहलाता है। तुम्हें हारकर खुद को जीत लिया था मैंने... लेकिन काश कि मैं तुमको भी जीत पाता... हमारी कहानी में इस काश की उपस्थिति कितनी अनिवार्य लगती है ना?
#क्वीन
जीवन की सबसे आसान लड़ाई हार गया था मैं... और जानती हो दुःख यह नहीं है कि मैं वह लड़ाई हार गया बल्कि दुःख इस बात का है कि मैंने उस लड़ाई को लड़ा ही नहीं।तुमने अगर उस लड़ाई से पहले मेरा हाथ न छोड़ा होता तो मैं उस लड़ाई को लड़ जाता। और विश्वास मानो मैं वह लड़ाई जीत भी जाता। लेकिन जानता था बिना तुम्हारे उस जीत के मायने कुछ भी नहीं।
जब जंग अपनों से हो तो पीछे हट जाने में ही भलाई होती है और जब लड़ाई अपने आप से हो तो अपने अहंकार को कुचलकर विजय प्राप्त करने वाला ही तो पुरुषार्थी कहलाता है। तुम्हें हारकर खुद को जीत लिया था मैंने... लेकिन काश कि मैं तुमको भी जीत पाता... हमारी कहानी में इस काश की उपस्थिति कितनी अनिवार्य लगती है ना?
#क्वीन
सिर्फ 5 कदम की दूरी पर थी तुम
कभी कभी कुछ ऐसा ही जाता है जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती। अपने शहर से हजारों किलोमीटर दूर, समंदर के किनारे बने उस होटल से मंदिर से आने के बाद हम सब घूमने के लिए निकले। समंदर के किनारे जब मैं तुम्हारी मोहब्बत के स्वप्न में कैद था तब तुम अपने भाई के साथ मुझसे 5 कदम की दूरी पर बैठी थी। क्या तुम कल्पना कर सकती हो कि मैं उस समय कैसा महसूस कर रहा होऊंगा। जिस इंसान को मैं अपने स्वप्नों में भी कभी इतने पास नहीं ला पाया था, वह मेरे सामने था। तुम तो शायद मुझे जानती भी नहीं थी।
तुम्हारी एक-एक हरकत को देखते -देखते कब 3 घंटे बीत गए पता ही नहीं चला। और फिर जब तुम वहां से निकली तो मैं भी अपने भाई-बहन को जबरदस्ती वहां से चलने को कहने लगा। जिस होटल में मैं रुका था, तुम भी उसी के बाहर जाकर रुक गई, तुमने भी अपना डेरा वहीँ डाला था। और फिर अगले दिन तुम्हें 'नंदन-कानन' में देखा। फिर उसी शाम बीच पर....क्या कहता इसे? प्यार? नहीं...यह प्यार नहीं था... फिर क्या था? ईश्वर की योजना... और कुछ नहीं कह सकते इसे....
उस दिन के 2 साल के बाद उसी बीच पर एक-दूसरे का हाथ थामकर समंदर के जल की निर्मलता और अपने प्रेम की पावनता के मधुर मिलन को महसूस करने के स्वप्न की अट्टालिका का ही तो निर्माण किया था हमने। पर एक सच यह भी है कि स्वप्नों की अट्टालिकाओं को ढहने में समय नहीं लगता....
#क्वीन
तुम्हारी एक-एक हरकत को देखते -देखते कब 3 घंटे बीत गए पता ही नहीं चला। और फिर जब तुम वहां से निकली तो मैं भी अपने भाई-बहन को जबरदस्ती वहां से चलने को कहने लगा। जिस होटल में मैं रुका था, तुम भी उसी के बाहर जाकर रुक गई, तुमने भी अपना डेरा वहीँ डाला था। और फिर अगले दिन तुम्हें 'नंदन-कानन' में देखा। फिर उसी शाम बीच पर....क्या कहता इसे? प्यार? नहीं...यह प्यार नहीं था... फिर क्या था? ईश्वर की योजना... और कुछ नहीं कह सकते इसे....
उस दिन के 2 साल के बाद उसी बीच पर एक-दूसरे का हाथ थामकर समंदर के जल की निर्मलता और अपने प्रेम की पावनता के मधुर मिलन को महसूस करने के स्वप्न की अट्टालिका का ही तो निर्माण किया था हमने। पर एक सच यह भी है कि स्वप्नों की अट्टालिकाओं को ढहने में समय नहीं लगता....
#क्वीन
Sunday, August 21, 2016
'अपनी' कैद में था मैं
मेरी तमन्ना एक ऐसे सफर की थी जिसमें तुम्हारा साथ हो और इस तमन्ना का सबसे खूबसूरत हिस्सा यह था कि मैं मंजिल भी तुम्हें ही मानता था। लेकिन स्वप्नलोक की इस तमन्ना का यथार्थ से कोई लकेना देना नहीं होता... काश यह बात मैं पहले ही समझ पाता। तो क्या हुआ कि हमारी पूजा पद्धति अलग थी, मैं जानता हूं कि तुम बिलकुल मेरे जैसी थी। तुम्हें पता था कि कोई काफिर किसी मस्जिद में नहीं जा सकता तो फिर तुम ही मेरे साथ मंदिर चली जाया करती थी....
तुम्हारे लिए मैं पूरी दुनिया से लड़ सकता था, लेकिन फिर भी तुम्हें 'आज़ाद' करना पड़ा.... काश! तुम मोहब्बत की इंतहा को समझ पाती….काश! तुम कभी समझ पाती कि मोहब्बत इतनी आगे बढ़ चुकी है कि वह मेरी आराधना बन गई है.. काश! तुम कभी समझ पाती कि जिससे प्रेम हो जाता है उसे अपनी सांसों तक में भी महसूस किया जाने लगता है... लेकिन फिर सोचता हूं कि आजादी तो हर एक का अधिकार है... बस उसी 'अधिकार' के लिए खुद को, खुद की कैद से आज़ाद कर दिया...
तुम्हारे लिए मैं पूरी दुनिया से लड़ सकता था, लेकिन फिर भी तुम्हें 'आज़ाद' करना पड़ा.... काश! तुम मोहब्बत की इंतहा को समझ पाती….काश! तुम कभी समझ पाती कि मोहब्बत इतनी आगे बढ़ चुकी है कि वह मेरी आराधना बन गई है.. काश! तुम कभी समझ पाती कि जिससे प्रेम हो जाता है उसे अपनी सांसों तक में भी महसूस किया जाने लगता है... लेकिन फिर सोचता हूं कि आजादी तो हर एक का अधिकार है... बस उसी 'अधिकार' के लिए खुद को, खुद की कैद से आज़ाद कर दिया...
Tuesday, August 16, 2016
बहुत पसंद थी ना तुमको...
उस दिन तक मैं अपने दिल की बात तुमसे इसलिए नहीं कह पाया क्योंकि मुझे डर था कि कहीं तुम मुझे गलत न समझ लो। तुम पहली और आखिरी इंसान थी जिसके साथ अपने पूरे जीवन को व्यतीत करने का स्वप्न मैंने देखा था। तुम मेरे सामने आती थी तो ऐसा लगता था मानो किसी निपुण और पारंगत मूर्तिकार ने खुद अपने हाथों से किसी संगमरमर को तराश कर जीवित मूर्ति का निर्माण किया हो। तुमसे मिलने से पहले मेरे जीवन में कुछ खोखलापन सा था, एक अजीब सा खालीपन था, जिसे उसदिन तक मेरे अलावा किसी ने महसूस नहीं किया था। और जब तुमसे मुलाकात हुई तो सब बदल गया। तुम्हारे ख्यालों ने ही मेरी जिंदगी के खालीपन को भर दिया।
अपनी जुबान पर तो नियंत्रण रख सकता था लेकिन आंखों पर कैसे रखता? जिस एक चेहरे को देखने के लिए घंटों इंतजार करता था, उसके सामने आने के बाद कैसे अपनी आंखों को चुराता...तुम्हें पता लग ही गया कि मेरे दिल में क्या था...हमने एक-दूसरे से बात करने के लिए उस 'नॉवेल' का सहारा लिया... तुम जानती हो ना कि मुझे प्रेम कहानियां पढ़ने में कोई रुचि नहीं... लेकिन तुम्हें थी और इसीलिए मुझे इसका सहारा लेना पड़ा... तुम्हें दूसरों के द्वारा अंग्रेजी में लिखी गईं 'मनगढ़ंत' प्रेम कहानियां बहुत पसंद थीं ना...और देखो आज तुम्हारी 'सच्ची' प्रेम कहानी को सब पढ़ रहे हैं...सब पसंद कर रहे हैं...खास बात यह है कि इसे पढ़ने के बाद अब लोग यह कहने की स्थिति में नहीं है कि 'प्रेम कहानियां' सिर्फ आईआईटी या आईआईएम वाले ही लिख सकते हैं...
#क्वीन
अपनी जुबान पर तो नियंत्रण रख सकता था लेकिन आंखों पर कैसे रखता? जिस एक चेहरे को देखने के लिए घंटों इंतजार करता था, उसके सामने आने के बाद कैसे अपनी आंखों को चुराता...तुम्हें पता लग ही गया कि मेरे दिल में क्या था...हमने एक-दूसरे से बात करने के लिए उस 'नॉवेल' का सहारा लिया... तुम जानती हो ना कि मुझे प्रेम कहानियां पढ़ने में कोई रुचि नहीं... लेकिन तुम्हें थी और इसीलिए मुझे इसका सहारा लेना पड़ा... तुम्हें दूसरों के द्वारा अंग्रेजी में लिखी गईं 'मनगढ़ंत' प्रेम कहानियां बहुत पसंद थीं ना...और देखो आज तुम्हारी 'सच्ची' प्रेम कहानी को सब पढ़ रहे हैं...सब पसंद कर रहे हैं...खास बात यह है कि इसे पढ़ने के बाद अब लोग यह कहने की स्थिति में नहीं है कि 'प्रेम कहानियां' सिर्फ आईआईटी या आईआईएम वाले ही लिख सकते हैं...
#क्वीन
Monday, August 15, 2016
लव नहीं, प्रेम लिखता हूं...
तुमसे मेरी बात नहीं होती थी क्योंकि मेरे पास तुमसे बात करने का कोई बहाना ही नहीं था। फिर उस दिन तुम्हारे हाथ में वह अंग्रेजी 'नॉवल' देखी। मुझे तब तक नहीं पता था कि अंग्रेजी में लिखी गईं प्रेम कहानियां कैसी होती हैं। बहुत हिम्मत करके तुमसे पहली बार बात की और कहा, 'प्लीज मुझे यह नॉवल दे दो, मैंने इसके बारे में बहुत सुना है लेकिन कहीं मिली नहीं।' मुझे तो यह भी नहीं पता था कि उस नॉवल को लिखा किसने है और तुम्हें एक सच और बताऊं मुझे आज भी नहीं पता कि वह नॉवल किसने लिखी थी। तुमने 2 दिन बाद मुझे उस नॉवल को देने का वादा किया और चली गई।
उस नॉवेल के शुरुआती 4 पेज पढ़ने के बाद मैं उसे आगे नहीं पढ़ सका क्योंकि उसमें प्रेम जैसा तो कुछ था ही नहीं। मैंने को श्रीराम और श्रीकृष्ण को पढ़ा था। मैंने तो यह पढ़ा था कि प्रेम ईश्वर का रूप होता है और इसी कारण जब मिथिला के बगीचे में श्रीराम और मां सीता ने एक-दूसरे को पहली बार देखा तो उनके मन में प्रेम प्रकट हुआ। अब प्रकट तो ईश्वर ही हो सकते हैं ना। लेकिन जब उस नॉवल में पढ़ा कि नायक 'fall in love with' नायिका, तो समझ में नहीं आया कि आखिर ये 'लव' में गिरा क्यों? धीरे-धीरे जब अंग्रेजी लव का प्रत्यक्ष रूप देखा, जो फेसबुक की प्रोफाइल पिक्चर देखकर शुरू होता था और चंद महीनों में बिस्तर तक आकर खत्म हो जाता था तो समझ में आया कि गिरी हुई हरकतों वाला 'लव' हमारे ईश्वरीय 'प्रेम' के सामने कहीं नहीं टिकता...
बस तभी से तय किया कि 'लव' नहीं प्रेम लिखूंगा... वह प्रेम जो मां गंगा के जल की भांति शाश्वत, निर्मल, निच्छल, पावन एवं पवित्र होता है। शारीरिक सुन्दरता के जाल में फंसकर कभी प्रेम नहीं होता उसे वासना कहा जाता है...वासना शरीर का मिलन है परन्तु प्रेम आत्मा का मिलन है...
#क्वीन
उस नॉवेल के शुरुआती 4 पेज पढ़ने के बाद मैं उसे आगे नहीं पढ़ सका क्योंकि उसमें प्रेम जैसा तो कुछ था ही नहीं। मैंने को श्रीराम और श्रीकृष्ण को पढ़ा था। मैंने तो यह पढ़ा था कि प्रेम ईश्वर का रूप होता है और इसी कारण जब मिथिला के बगीचे में श्रीराम और मां सीता ने एक-दूसरे को पहली बार देखा तो उनके मन में प्रेम प्रकट हुआ। अब प्रकट तो ईश्वर ही हो सकते हैं ना। लेकिन जब उस नॉवल में पढ़ा कि नायक 'fall in love with' नायिका, तो समझ में नहीं आया कि आखिर ये 'लव' में गिरा क्यों? धीरे-धीरे जब अंग्रेजी लव का प्रत्यक्ष रूप देखा, जो फेसबुक की प्रोफाइल पिक्चर देखकर शुरू होता था और चंद महीनों में बिस्तर तक आकर खत्म हो जाता था तो समझ में आया कि गिरी हुई हरकतों वाला 'लव' हमारे ईश्वरीय 'प्रेम' के सामने कहीं नहीं टिकता...
बस तभी से तय किया कि 'लव' नहीं प्रेम लिखूंगा... वह प्रेम जो मां गंगा के जल की भांति शाश्वत, निर्मल, निच्छल, पावन एवं पवित्र होता है। शारीरिक सुन्दरता के जाल में फंसकर कभी प्रेम नहीं होता उसे वासना कहा जाता है...वासना शरीर का मिलन है परन्तु प्रेम आत्मा का मिलन है...
#क्वीन
तकदीर जुल्फों की तरह नहीं होती
हां, उस दिन भी 15 अगस्त ही था जब तुम उस मंदिर के बाहर स्कूल तक साथ चलने के लिए मेरा इंतजार कर रही थी। मुझे तुम्हारे पास देरी से पहुंचना बहुत बुरा लगता था लेकिन क्या करता, सड़क पर चलने वाली बड़ी गाड़ियों ने मेरी छोटी सी बाइक को 'फंसा' लिया था। तुम चाहती थी कि कम से कम हम साथ चलकर कुछ पल एक साथ बिताएं लेकिन हमें उन पलों में छोटी सी कटौती करनी पड़ी। मैंने मंदिर के बाहर अपनी बाइक खड़ी की और फिर हम पैदल स्कूल की ओर जाने लगे। कई महीनों के बाद तुम्हारे साथ अकेले 10 मिनट बिताने का समय मिला था। उन 10 मिनटों में आजादी के उस दिन को बेहद खास तरीके से मनाया था हमने। ख्वाब बनाया था तुमने मुझे और मैं तुम्हारा साया बनने की कोशिश में था।
पता है समस्या क्या है? समस्या यह है कि परिंदे सोचते हैं कि रहने को घर मिले और इंसान सोचता है कि उड़ने को पर मिलें। तुम भी उड़ना चाहती थी लेकिन तुम भूल गई कि तकदीर जुल्फों की तरह नहीं होती, जिसे बिखरने पर संवार लिया जाए।
#क्वीन
पता है समस्या क्या है? समस्या यह है कि परिंदे सोचते हैं कि रहने को घर मिले और इंसान सोचता है कि उड़ने को पर मिलें। तुम भी उड़ना चाहती थी लेकिन तुम भूल गई कि तकदीर जुल्फों की तरह नहीं होती, जिसे बिखरने पर संवार लिया जाए।
#क्वीन
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