दो दशक हो गए, लेकिन उस साल का वो आखिरी दिन आज तक नहीं भूल पाया हूं। तुम्हारी उस सालों पुरानी कहानी में आज भी इतना उलझा हूं कि किसी और के किस्से का हिस्सा ही नहीं बन पा रहा हूं। साल के उस आखिरी दिन गुलाबी ठंड में जब काले-भूरे कुल्हड़ में लाल चाय पी थी, सच मानो! दूध खत्म होने के बाद 'चाचा' से सिर्फ वक्त बिताने के लिए बनवाई गई उस लाल लेकिन 'चरित्रवान चाय' जैसी ताजगी और ऊर्जा आज तक न मिल पाई।
हर साल आखिरी दिन के जाते-जाते कम से कम 2-3 जगह तो जरूर जाता हूं और दूध होते हुए भी बिना दूध की चाय बनवाकर पीता हूं, कि शायद वही स्वाद, वही ताजगी, वही ऊर्जा मिल जाए, लेकिन अब तक एक बार भी नहीं मिला। पता नहीं क्यों, अब लगने लगा है कि शायद वो सब चाय से नहीं मिला था, जरूर कुछ ना कुछ उस साल में ही रहा होगा, नहीं तो इतनी सारी जगहों पर चाय पीने के बाद भी वो स्वाद क्यों नहीं मिल रहा?
उस शाम तुमने कहा था- तुम तो मेरे दिल हो, बात नहीं करते तो लगता है कि दिल धड़कना बंद कर रहा है। अगर वो सच था तो बताओ ना- आज बिना दिल के कैसे जिंदा हो तुम?
सुनो ना! एक, दो, तीन, चार.... पता नहीं कितने दिसंबर गुजर गए, लेकिन सच मानो, मुझे नई जनवरी से कभी कोई उम्मीद नहीं रहती। दरअसल मुझे किसी 'नए' की जरूरत ही नहीं है। मुझे जरूरत ही नहीं है कि कोई नया मेरे लिए फिर पुराना हो, और फिर वही करे जो उस दिसंबर ने किया था।
जनवरी हो, फरवरी हो, अप्रैल हो या नवंबर-दिसंबर... मेरी जिंदगी में अब परमानेंट 'बसंत' है...
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