सबसे ज्यादा पढ़ी गईं पोस्ट

Saturday, June 6, 2026

भरोसा...

वो शाम आज भी मेरे भीतर कहीं थमी सी है।
याद है तुम्हें? बारिश अभी-अभी थमी थी। सड़क किनारे चाय की उस छोटी-सी दुकान पर हम दोनों बैठे थे। हवा में मिट्टी की खुशबू थी और तुम्हारे बाल बार-बार चेहरे पर आ रहे थे। तुम उन्हें संभालते हुए मुस्कुरा रही थीं, और मैं तुम्हें देख रहा था। शायद उतनी शांति मैंने अपने जीवन में कभी महसूस नहीं की थी।
तुमने अचानक पूछा था, "अगर कभी मैं दूर चली गई तो?"
मैं हंस पड़ा था। उस वक्त तक मुझे लगता था कि कम से कम तुम तो दूर जाने के लिए नहीं, मेरे साथ चलने के लिए, हमेशा साथ रहने के लिए मिली हो। मैंने कहा था, "जीवन में लोग आते हैं, बहुत से जाते हैं, लेकिन खास वही होते हैं, जो आख़िर तक साथ रहते हैं।" तुम कुछ पल चुप रही, फिर मुस्कुराकर मेरी तरफ देखा। उस मुस्कान में मुझे कुटिलता नहीं दिखी थी, या फिर शायद मैं उसे देखना ही नहीं चाहता था।
उस दिन हमने बहुत सारी बातें की थीं। रिश्तों की, भरोसे की, लोगों की। तुमने मेरे गले का रुद्राक्ष देखते हुए कहा था, "एकमुखी रुद्राक्ष बहुत मुश्किल से मिलता है ना?"
मैंने जवाब दिया था, "हां, और एकमुखी इंसान भी।"
तुम हंस दी थीं। मैं भी हंस दिया था। मगर आज सोचता हूं, शायद उस वाक्य में हमारा भविष्य छिपा हुआ था।
समय बीतता गया। हालात बदले। या शायद खराब हुए... संभाल सकता था मैं उसे लेकिन देखना चाहता था कि तुम उन हालातों को संभालने में मेरा हाथ थामने आती भी हो या नहीं! उस दौर में बहुत से लोग चले गए। कुछ चुपचाप, कुछ बहाने बनाकर।
और तुम...
तुम तो उस धन्यभागी के लिए हुलास सा सर्वाधिक सुलभ माध्यम बनी हुई थीं। हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं हुआ था। कोई नाटकीय तथाकथित 'ब्रेकअप' भी नहीं हुआ था। बस एक चाय भर की दूरियां बढ़ गई थीं।
आज इतने साल बीतने के बाद भी अक्सर बारिश के मौसम में मैं उसी चाय की दुकान, उसी शाम और उसी सवाल तक लौट जाता हूं।
वहां बैठकर सोचता हूं... कि क्या तुम्हें वो शाम याद आती होगी?
क्या तुम्हें वो चाय, वो भरोसा, वो सपने याद आते होंगे जो हमने साथ मिलकर देखे थे? या फिर मैं ही उन यादों का आखिरी पहरेदार बचा हूं?

No comments:

Post a Comment