सर्दियों की हल्की धूप थी। कॉलेज के बाहर उस पुराने वाले पार्क में हम दोनों घंटों बैठे रहे थे। तुमने अपनी हथेलियाँ मेरी जैकेट की जेब में छिपा ली थीं और हँसते हुए कहा था, "तुम्हारे साथ वक़्त बहुत जल्दी भागता है।"उस दिन मुझे पहली बार लगा था कि शायद दुनिया की सारी बेचैनियाँ तुम्हारे पास आकर ख़त्म हो जाती हैं।
हमने सड़क के किनारे वाले उस छोटे से ठेले से चाय पी थी। तुम्हारी आदत थी, चाय का पहला घूँट लेते ही आँखें बंद कर लेना। मैं तुम्हें देखता रहा था और तुमने मुस्कुरा कर पूछा था, "क्या देख रहे हो?" और मैं हर बार वही झूठ बोल देता-"कुछ नहीं।"
सच तो यह था कि मैं उस चेहरे को याद कर लेना चाहता था, जिसे मैं उम्र भर देखना चाहता था।
शाम को जब हम लौट रहे थे, तुम अचानक रुक गई थीं। तुमने मेरा हाथ कसकर पकड़ा था और बेहद दबी आवाज में कहा था, "कभी मुझे 'दर्द' तो नहीं दोगे ना?"
मैंने हँसकर कहा था, "हम जैसे लोग अपनों की खुशी के लिए उनसे दूर चले जाते हैं, लेकिन उनके दुःख की वजह नहीं बनते।"
तुमने मेरी बात पर लगभग डाँटते हुए मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया था।
मुझे यक़ीन की हद तक गुमान था कि तुम मेरे सिवा किसी और की हो ही नहीं सकती। शायद प्रेम आदमी को अंधा नहीं, बहुत भरोसेमंद बना देता है।
फिर धीरे-धीरे तुम बदलने लगीं।
तुम्हारे पास वक़्त कम होने लगा, बातें छोटी होने लगीं, और बहाने लंबे। लेकिन अजीब बात है, तुमने कभी जाने की बात नहीं कही। तुमने बस इतना किया कि मुझे हर दिन थोड़ा-थोड़ा अकेला छोड़ती रहीं।
और मैं... मैं अपने हिस्से में बस तुम्हारा थोड़ा सा वक्त मांगता रहा।
आज सोचता हूँ, देखता हूं, समझता हूं, उनकी बेबसी, जो किसी से अपने हिस्से का प्यार माँगते हैं, जबकि उसपर सिर्फ उनका ही हक होता है।
कभी-कभी कल्पना करता हूँ, अगर किसी दिन तुम मेरे सामने बैठो, बिल्कुल पास, तो क्या तुम मेरे भीतर उस आदमी को तलाशोगी, जो तुम्हें बिना किसी शर्त के चाहता था? क्या तुम्हें उस शख्स का एक छोटा सा हिस्सा भी मुझमें मिलेगा?
एक बात जानना चाहता हूँ...
उस दिन जब तुमने कहा था, "कभी छोड़कर मत जाना", क्या उस वक़्त भी तुम्हें मालूम था कि जाने के लिए तुम ही मुझे मजबूर कर दोगी?
शाम को जब हम लौट रहे थे, तुम अचानक रुक गई थीं। तुमने मेरा हाथ कसकर पकड़ा था और बेहद दबी आवाज में कहा था, "कभी मुझे 'दर्द' तो नहीं दोगे ना?"
मैंने हँसकर कहा था, "हम जैसे लोग अपनों की खुशी के लिए उनसे दूर चले जाते हैं, लेकिन उनके दुःख की वजह नहीं बनते।"
तुमने मेरी बात पर लगभग डाँटते हुए मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया था।
मुझे यक़ीन की हद तक गुमान था कि तुम मेरे सिवा किसी और की हो ही नहीं सकती। शायद प्रेम आदमी को अंधा नहीं, बहुत भरोसेमंद बना देता है।
फिर धीरे-धीरे तुम बदलने लगीं।
तुम्हारे पास वक़्त कम होने लगा, बातें छोटी होने लगीं, और बहाने लंबे। लेकिन अजीब बात है, तुमने कभी जाने की बात नहीं कही। तुमने बस इतना किया कि मुझे हर दिन थोड़ा-थोड़ा अकेला छोड़ती रहीं।
और मैं... मैं अपने हिस्से में बस तुम्हारा थोड़ा सा वक्त मांगता रहा।
आज सोचता हूँ, देखता हूं, समझता हूं, उनकी बेबसी, जो किसी से अपने हिस्से का प्यार माँगते हैं, जबकि उसपर सिर्फ उनका ही हक होता है।
कभी-कभी कल्पना करता हूँ, अगर किसी दिन तुम मेरे सामने बैठो, बिल्कुल पास, तो क्या तुम मेरे भीतर उस आदमी को तलाशोगी, जो तुम्हें बिना किसी शर्त के चाहता था? क्या तुम्हें उस शख्स का एक छोटा सा हिस्सा भी मुझमें मिलेगा?
एक बात जानना चाहता हूँ...
उस दिन जब तुमने कहा था, "कभी छोड़कर मत जाना", क्या उस वक़्त भी तुम्हें मालूम था कि जाने के लिए तुम ही मुझे मजबूर कर दोगी?
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