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Friday, July 8, 2016

यकीन तो होगा तुम्हें

7 जुलाई, यही वह दिन था जब अलग हुए थे हम...विश्वास मानो, मेरी बिलकुल इच्छा नहीं थी कि तुमसे दूर जाऊं... लेकिन इसी को शायद किस्मत कहते हैं... हम दूर हो गए... तुम्हारी वे शरारतें ही तो थीं जो मुझे थोड़ा-बहुत खुश कर देती थीं नहीं तो सार्वजनिक जीवन की परेशानियों के चलते कभी ऐसे मौके ही नहीं मिलते थे। तुम्हारे साथ बिताया हर एक लम्हा मेरे लिए एक पूरी जिन्दगी की खुशी लगता था।
पर आज... खुद से ही सवाल करता रहता हूं... मुझे पता है कि उन सवालों के जवाब मुझे कभी नहीं मिलने वाले... लेकिन उन सवालों के सहारे कुछ खास लम्हें याद आ जाते हैं... बेहद जरूरी था तुम्हारा मेरे पास रहना लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी था मेरे स्वाभिमान का बना रहना... मैं जो लिखता था, जो करता था, तुम्हें उसी से समस्या थी ना.. तुम कहती थी कि यह सब करोगे तो मुझे टाइम नहीं दे पाओगे लेकिन देखो... उसी लक्ष्य के साथ आज भी काम कर रहा हूं और तुम्हें भी टाइम दे रहा हूं... हमारे बीच फासले तो बढ़ते गए लेकिन साथ ही मोहब्बत भी बढ़ती गई... आज भी लिखता हूं... लेकिन अब उस लिखावट में तुम्हारी झलक होती है...
मुझे पता है तुम अब कभी नहीं आओगी लेकिन एक वादा करता हूं तुमसे...तुम्हारी जगह पर कभी कोई और भी नहीं आएगा... तुम्हें बहुतों में खोजने की कोशिश की लेकिन तुम किसी में नहीं मिली...तुम्हारे जैसी इस दुनिया में सिर्फ एक थी... लेकिन तुम्हें पता है मेरे जैसा भी इस दुनिया में और कोई नहीं... थोड़ा इंतजार करो... यकीन हो जाएगा...
क्या अच्छा है और क्या बुरा, मैं ये सब नहीं जानता... मैं बस इतना जानता हूं कि मेरी मोहब्बत पाक थी... एकतरफा मोहब्बत को दोतरफा होते हुए तो सबने देखा होगा लेकिन दोतरफा चाहत एक तरफा हो जाए तो उसे क्या कहेंगे... शायद 'फरेब' या फिर...'ईश्वर की योजना'...मेरा विश्वास है कि यह कोई ईश्वर की योजना ही होगी... और ईश्वर की योजना कभी उद्देश्यहीन नहीं हो सकती... खुश हूं कि ईश्वर की योजना में मैं शामिल हूं...
‪#‎क्वीन‬

Thursday, July 7, 2016

तुम्हारे सपने

तुम तो परिंदे की तरह थे.. कुछ ज्यादा ही ऊँचे सपने थे तुम्हारे...खुला आकाश न मिलता तो मूल चरित्र से हटकर सिर्फ दिखावा करते...जरूरी था कि तुम्हें बंधनों में न रखा जाये। 
पर एक सुझाव है कि अपने उन लक्ष्यों तक पहुँचने का रास्ता तय कर लो। साथ ही अगर उन सपनों की कीमत के बारे में भी चिंतन कर लो।

कहीं ऐसा ना हो कि उन सपनों को पूरा करके तुम उन लोगों को खो जो जिन्होंने तुम्हारी प्रतिभा को निखारने में अहम योगदान दिया है।

सब कुछ तुम्हें तय करना है... अब सारा आकाश तुम्हारा है...तुम्हें ही तय करना होगा कि तुम कितनी ऊपर उड़ोगी और उसके लिए क्या कीमत चुकाओगी।
‪#‎क्वीन‬

Tuesday, July 5, 2016

ठंड की वह रात

मेरा घर तुम्हारे घर से 41 किलोमीटर दूर था और तुम्हारे घर से एग्जामिनेशन सेंटर 30 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर। 27 दिसंबर की रात को 9 बजे तुमने मेरा आग्रह स्वीकार किया कि अगले दिन तुम एग्जाम देने मेरे साथ चलोगी। 28 दिसंबर की सुबह 8:45 तक सेंटर पर पहुंचना था। मैंने सोचा कि सुबह 5:30 तक निकलूंगा और तुमको लेते हुए, समय पर परीक्षा केन्द्र पहुंच जाऊंगा। कहीं निद्रा देवी और आलस्य अपने आगोश में न ले लें इसलिए रात में सोने का प्लान भी कैंसल कर दिया।
हां, रात के 12:30 बजे थे और निद्रा देवी मुझ पर हावी होने का भरसक प्रयास कर रही थीं। उन्हें हारना ही था क्योंकि उनकी 'स्वाभाविक' जीत से ज्यादा जरूरी तुम्हारे विश्वास की जीत थी। सोचा कि थोड़ा सा छत पर घूम लेता हूं। लेकिन जब छत पर पहुंचा तो माहौल कुछ और ही बयां कर रहा था। एक कदम आगे रखी चीज भी नहीं दिख रही थी। भयंकर ठंड और विज़बिलिटी का स्तर शून्य... मैं समझ गया कि अगर सुबह भी ऐसी ही स्थिति रही तो परीक्षा नहीं दे पाऊंगा और ना ही तुम्हारे पास आ पाऊंगा।
बस उसी समय मैं तुम्हारे घर के लिए निकल गया था। 4 घंटे में 40 किलोमीटर की दूरी तय करके 5 बजे मैं तुम्हारे घर के नीचे था। उस दिन मेरी बाइक साइकल से भी धीमे चली थी। उन 4 घंटों में मुझे कम से कम 400 बार यह ख्याल आया होगा कि मैं तुम्हारे घर नहीं पहुंच पाऊंगा लेकिन ईश्वर ने मेरा साथ दिया और मैं पहुंच गया। पूरे 1 घंटे तक नीचे खड़े होकर तुम्हारा इंतजार किया। ठंड में बुरी तरह से कांप रहा था मैं... फिर तुम आई और जो शॉल तुमने ओढ़ कर रखी थी उससे मेरे शरीर को ढक दिया। शॉल तो काफी हल्की थी लेकिन सच में उस गर्माहट को फिर कभी महसूस नहीं कर पाया... काश! सिर्फ एक बार तुम उस पल को दोबारा से महसूस करा देती....
‪#‎क्वीन‬

Saturday, July 2, 2016

मेरे होने की वजह

तुम्हारा मेरी जिंदगी में आना बहुत जरूरी था... तुम भले ही कुछ समय के लिए मेरी जिंदगी में आई लेकिन उस दौर में मुझे जितने अनुभव मिले वे सच में बेहद खास थे... इस दौर में उन लोगों के चेहरों भी बेनकाब हुए जिनको मैंने अपनी जिंदगी में बेहद अहम जगह दे रखी थी... तुम न होती तो यह कैसे पता लगता कि ऊपर से साफ-सुथरे दिखने वाले लोग अंदर से कितने गंदे होते हैं...तुम न होती तो यह कैसे पता लगता कि सार्वजनिक जीवन जो लोग चरित्र को सर्वोपरि बताते हैं उनके चरित्र का वास्तविक स्तर तो शून्य से भी नीचे का है... तुम न होती तो यह कैसे पता लगता कि जो लोग श्वेत वर्ण से सुशोभित दिखते हैं वे अंदर से बेहद काले हैं...
तुम्हारे आने और आकर वापस चले जाने को मैं इसी कारण ईश्वरीय योजना मानता हूं। तुम्हारे दूर जाने से मैंने कुछ नहीं खोया क्योंकि मेरे पास खोने को कुछ था ही नहीं... लेकिन हां, तुम्हारे जाने से मुझे एक चीज मिल गई और उस चीज की आवश्यकता मेरे भविष्य के लिए सर्वाधिक थी... तुम दूर गई तो मैंने खुद को पा लिया... मुझे बनाने में सबसे अहम योगदान तुम्हारा ही है... मैं बहुत कुछ तो नहीं लेकिन जो कुछ भी हूं, वह सिर्फ तुम्हारी वजह से ही हूं...
#क्वीन

उस 'लेकिन' का जवाब

हिंदी माध्यम से 8वीं तक की पढ़ाई के बाद लखनऊ में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई शुरू हुई। 10वीं के अंकों को देखकर बाबा को लगा कि अचानक अंग्रेजी माध्यम में आने की वजह से नंबर कम आए पर सच में गलती मेरी थी क्योंकि मैं अपने प्राथमिक दायित्व को महत्व देना लगातार कम कर रहा था। लखनऊ की हवा ही कुछ ऐसी थी...
हालांकि 10वीं में स्कूल में तो दूसरे स्थान पर रहा था लेकिन घर वालों को 80 प्रतिशत से अधिक की अपेक्षा थी। 12वीं में घरवालों ने अंग्रेजी की ट्यूशन करा दी। हर दिन ट्यूशन के बाद तुम्हारे घर के दरवाजे पर खड़े होकर घंटों तुमसे बातें करना और फिर जब तुम्हारे पापा के आने का समय हो तो वहां से दुखी मन से वापस चले जाना।
काफी आसान था सब कुछ लेकिन आज... हर एक शब्द में तुम्हें ही पिरोने की कोशिश करता हूं। मुझे पता है तुम वह सब जरूर याद करती होगी और उसे सोचकर तुम्हारे होठों पर मुस्कुराहट आ जाती होगी। तुम्हें एक बात बताऊं,तुम्हारे बिना आज सब कुछ बहुत मुश्किल लगता है...ये दिन, ये रात, ये वक्त सब कुछ गुजर तो जाता है लेकिन गुजारा नहीं जाता....
काश! तुम मेरे साथ होती... मुझे पता है तुमने इसके जवाब में हर बार की तरह यही कहा होगा, 'गौरव, हूं मैं तुम्हारे साथ लेकिन....'
बस इस लेकिन का जवाब ही तो खोज रहा हूं आज तक...
‪#‎क्वीन‬

Friday, July 1, 2016

स्वार्थ हावी हो गया.

उस दिन मैं तथाकथित मोहब्बत की इमारत यानी ताज़महल में था और तुमने फोन करके बताया कि तुम्हारी यूनिवर्सिटी में 'वह' छोटा सा काम नहीं हो रहा है। मुझे ताज़महल पहुंचे मात्र 20 मिनट ही हुए थे और मैं तथा मेरे दो अन्य साथी 'दर्शन योजना' में लगे हुए थे। लेकिन तुम्हारी एक कॉल ने मेरा मानस ही बदल दिया। मैंने 50 कुतर्क किए उन लोगों से वापस चलने के लिए...
मैं तुम्हें एक बार और देखना चाहता था...सच कहूँ तो बार-बार देखना चाहता था। मैं भागकर यूनिवर्सिटी आया और अपने साथ उन दोनों को भी ले आया जिनका मेरी 'बेचैनी' से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। उसके बाद यूनिवर्सिटी में जो 'बवाल' किया था वह तो अद्भुत था। तुम्हारा काम तो हो गया लेकिन एक बात सच बताऊँ तुम्हें....वहां से वापस आते वक़्त मेरे ऊपर स्वार्थ हावी हो गया...
पता है, क्या सोच रहा था मैं.... मैं सोच रहा था कि काश तुम्हारा काम न करवाता तो एक बार और तुम्हें देखने का मौका मिल जाता... क्या करूँ यार... इंसान ही तो हूँ...
‪#‎क्वीन‬

Wednesday, June 29, 2016

आज फिर वहां गया था

पता है आज पूरे 1 साल 9 महीनों के बाद उस जगह पर गया था जहां पर कभी तुम्हारे सामने बैठे-बैठे मेरी आंखें नम हो गई थीं। हां वही, नोएडा का स्टेलर आईटी पार्क... लेकिन पता है उस टेबल पर नहीं बैठा जहां हम आखिरी बार साथ बैठे थे, पर वह मेरे सामने ही थी... उस दिन मेरी आंखों में आई हुई नमी की वजह तो याद ही होगी तुम्हें.... कितने प्यार से लेकर आया था तुम्हारे लिए वह तोहफा...तुमने भी उतने ही प्यार से उसे स्वीकार किया था लेकिन उसे खोल कर देखने के बाद तुमने मुझे वापस बुलाया और एक आधारहीन वजह बता कर उसे लेने से मना कर दिया... कैसे वापस ले लेता उस चीज को जिसे खरीदने के लिए मुझे बेइंतहा संघर्ष करना पड़ा था।
सच कह रहा हूं, अगर उस दिन तुम उसे अपने पास न रखती तो मुझे बहुत दुख होता... पर उस दिन की तरह आज मेरी आंखों में आंसू नहीं थे... बहुत खुश था मैं...मेरे साथ आज मेरे कई स्टूडेंट्स भी थे...पता है वे सब भी तुम्हारे बारे में पूछते रहते हैं...
खैर छोड़ो ये सब, बस इतना बताना चाहता हूं कि बिना तुम्हारे उस जगह पर बिलकुल रौनक नहीं लगती...
#क्वीन