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Wednesday, October 5, 2016

मेरी निर्माता हो तुम

पता है, एक मॉल में स्थित कपड़ों के शोरूम में एक ड्रेस 3 महीनों से शो पीस के तौर पर लगी हुई थी। उसे कोई नहीं खरीदता था। शोरूम के मालिक ने सोचा कि अगले दिन उस ड्रेस को अंदर रख देगा। उसी दिन एक प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेत्री शूटिंग के लिए मॉल में आई। उसकी नजर उस ड्रेस पर पड़ी, उसने तुरंत उस ड्रेस को खरीद लिया। 3 दिन बाद एक राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका के लिए उसने उसी ड्रेस में फोटोशूट कराया। इसका प्रभाव यह हुआ कि रातों-रात उस शोरूम के मालिक के पास उस तरह की ड्रेस के लिए हजारों की संख्या में ऑर्डर आ गए।

तुम्हें पता है, हमारी कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जब तक मैंने तुम्हें नहीं देखा था तब तक सब कुछ सामान्य था। जब तक तुम मुझे पसंद नहीं आई थी तब तक सब कुछ सामान्य था, जब तक मैंने तुम्हें अपनी आराधना नहीं बनाया था तब तक सब कुछ सामान्य था लेकिन जैसे ही मैंने तुम्हें लिखना शुरू किया तब से हजारों की संख्या में तुम्हें खोजने लगे। वे जानना चाहते हैं कि मेरी 'क्वीन' कौन है? कौन है जिसने मुझे बनाया? कौन है जिससे मुझ जैसा लड़का मोहब्बत कर बैठा? 

सुनो, मैं मानता हूं कि मुझे बनाने में तुम्हारा अहम योगदान है। अगर मैं तुम्हें अपना निर्माता कहूं तो गलत नहीं होगा। लेकिन कभी इस बात का अहंकार मत करना क्योंकि इस सच के साथ एक और सच भी जुड़ा है और वह सच यह है कि तुमको भी मैं ही बना रहा है। मैं जानता हूं कि मैं तुम्हारा निर्माण करूं यह वांछित नहीं है लेकिन अपने स्वाभिमान संरक्षण के लिए मेरे लिए ऐसा करने की अनिवार्यता है।
#क्वीन

समय की रफ्तार

समय किस रफ्तार से अपनी चाल बदल देता है, इस बात का अंदाजा लगाना हमारी कल्पना से भी परे होता है। पता है, तब एक समय था जब किसी के साथ भी बैठो तो बस तुम्हारी ही बातें हुआ करती थीं और एक समय अब है, कि अगर कोई तुम्हारा नाम भी ले ले तो बात बदलनी पड़ जाती है। आखिर बात न बदलूं तो और करूं भी क्या? तुम्हारे साथ बिताए गए उन पलों को याद करके आंखों में आए आंसुओं को किसी के भी सामने रोकने की क्षमता नहीं है मुझमें। 

मैं कभी तुमसे नाराज नहीं होता था, क्योंकि नाराज तो वे होते हैं जिनको इस बात का गुरूर होता है कि कोई है जो उन्हें मनाने आएगा। लेकिन मैं इस तरह की किसी भी गलतफहमी के आगोश में नहीं था। तुमने मुझे सत्य से कभी विमुख नहीं होने दिया। तुम्हारी जरूरत, फिर इंतजार की उम्मीद और उम्मीद टूटने के बाद होने वाले अकेलेपन के अहसास को किस तरह से महसूस करता था मैं, तुम कभी नहीं समझ सकती। 

 तुम इतने दिनों से मेरे पास ही रहती हो लेकिन मैं तुम्हें एक बार देखने तक नहीं आया? यही सोचती हो ना तुम? पता है, इंतजार करते-करते इतना थक गया था कि तुम्हें अपने दिल से निकाल दिया। और जब कोई दिल से निकल जाता है तो उसे देखना तो दूर उसके बारे में बात करने का भी दिल नहीं करता।
#क्वीन

Friday, September 2, 2016

मेरे स्वप्नलोक की वास्तविकता

तुम बस मेरे स्वप्नों में ही मेरी थी। यह बात समझने में मुझे 3 साल लग गए।  क्या करता, तुम्हारे हर एक झूठ को सच मानकर उसी में जिए जा रहा था।

तुमको पता है मेरी ज़िन्दगी के हर एक हिस्से में , हर एक किस्से में बस तुम्हारी ही कल्पना तो बसती थी। लेकिन तुम्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मैं तो तुम्हारे लिए बस एक 'विकल्प' था। क्या करता मैं? क्या कर सकता था मैं?

अंत में तुम मजहबी बहाने बनाने लगी और मैं अपनी कल्पनाओं के समंदर में डूबने लगा। कल्पनाओं की अट्टालिका बनाने में मुझे कुछ वक़्त तो जरूर लगा लेकिन खुश हूँ कि उस अट्टालिका की नींव से लेकर अंतिम छोर तक तुम सिर्फ मेरी ही हो...

#क्वीन

उस दिन टूट गया था भ्रम

तुम्हारे साथ एक-एक पल बिताने का अहसास बेहद खास होता था। पहले तो ऐसा लगता था जैसे तुम भी मेरे साथ बिताए हर एक पल को दिल से जी लेना चाहती हो लेकिन बाद में महसूस हुआ कि यह मात्र मेरा भ्रम है। तुम्हारे प्रेम और समर्पण पर प्रश्नचिन्ह लगाने की क्षमता तो मुझमें नहीं है लेकिन ऐसा प्रारब्ध अवांछित था।

जीवन की सबसे आसान लड़ाई हार गया था मैं... और जानती हो दुःख यह नहीं है कि मैं वह लड़ाई हार गया बल्कि दुःख इस बात का है कि मैंने उस लड़ाई को लड़ा ही नहीं।तुमने अगर उस लड़ाई से पहले मेरा हाथ न छोड़ा होता तो मैं उस लड़ाई को लड़ जाता। और विश्वास मानो मैं वह लड़ाई जीत भी जाता। लेकिन जानता था बिना तुम्हारे उस जीत के मायने कुछ भी नहीं।

जब जंग अपनों से हो तो पीछे हट जाने में ही भलाई होती है और जब लड़ाई अपने आप से हो तो अपने अहंकार को कुचलकर विजय प्राप्त करने वाला ही तो पुरुषार्थी कहलाता है। तुम्हें हारकर खुद को जीत लिया था मैंने... लेकिन काश कि मैं तुमको भी जीत पाता... हमारी कहानी में इस काश की उपस्थिति कितनी अनिवार्य लगती है ना?
#क्वीन

सिर्फ 5 कदम की दूरी पर थी तुम

कभी कभी कुछ ऐसा ही जाता है जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती। अपने शहर से हजारों किलोमीटर दूर, समंदर के किनारे बने उस होटल से मंदिर से आने के बाद हम सब घूमने के लिए निकले। समंदर के किनारे जब मैं तुम्हारी मोहब्बत के स्वप्न में कैद था तब तुम अपने भाई के साथ मुझसे 5 कदम की दूरी पर बैठी थी। क्या तुम कल्पना कर सकती हो कि मैं उस समय कैसा महसूस कर रहा होऊंगा। जिस इंसान को मैं अपने स्वप्नों में भी कभी इतने पास नहीं ला पाया था, वह मेरे सामने था। तुम तो शायद मुझे जानती भी नहीं थी।

तुम्हारी एक-एक हरकत को देखते -देखते कब 3 घंटे बीत गए पता ही नहीं चला। और फिर जब तुम वहां से निकली तो मैं भी अपने भाई-बहन को जबरदस्ती वहां से चलने को कहने लगा। जिस होटल में मैं रुका था, तुम भी उसी के बाहर जाकर रुक गई, तुमने भी अपना डेरा वहीँ डाला था। और फिर अगले दिन तुम्हें 'नंदन-कानन' में देखा। फिर उसी शाम बीच पर....क्या कहता इसे? प्यार? नहीं...यह प्यार नहीं था... फिर क्या था?  ईश्वर की योजना... और कुछ नहीं कह सकते इसे....


उस दिन के 2 साल के बाद उसी बीच पर एक-दूसरे का हाथ थामकर समंदर के जल की निर्मलता और अपने प्रेम की पावनता के मधुर मिलन को महसूस करने के स्वप्न की अट्टालिका का ही तो निर्माण किया था हमने। पर एक सच यह भी है कि स्वप्नों की अट्टालिकाओं को ढहने में समय नहीं लगता....
#क्वीन

Sunday, August 21, 2016

'अपनी' कैद में था मैं

मेरी तमन्ना एक ऐसे सफर की थी जिसमें तुम्हारा साथ हो और इस तमन्ना का सबसे खूबसूरत हिस्सा यह था कि मैं मंजिल भी तुम्हें ही मानता था। लेकिन स्वप्नलोक की इस तमन्ना का यथार्थ से कोई लकेना देना नहीं होता... काश यह बात मैं पहले ही समझ पाता। तो क्या हुआ कि हमारी पूजा पद्धति अलग थी, मैं जानता हूं कि तुम बिलकुल मेरे जैसी थी। तुम्हें पता था कि कोई काफिर किसी मस्जिद में नहीं जा सकता तो फिर तुम ही मेरे साथ मंदिर चली जाया करती थी....

तुम्हारे लिए मैं पूरी दुनिया से लड़ सकता था, लेकिन फिर भी तुम्हें 'आज़ाद' करना पड़ा.... काश! तुम मोहब्बत की इंतहा को समझ पाती….काश! तुम कभी समझ पाती कि मोहब्बत इतनी आगे बढ़ चुकी है कि वह मेरी आराधना बन गई है.. काश! तुम कभी समझ पाती कि जिससे प्रेम हो जाता है उसे अपनी सांसों तक में भी महसूस किया जाने लगता है... लेकिन फिर सोचता हूं कि आजादी तो हर एक का अधिकार है... बस उसी 'अधिकार' के लिए खुद को, खुद की कैद से आज़ाद कर दिया...

Tuesday, August 16, 2016

बहुत पसंद थी ना तुमको...

उस दिन तक मैं अपने दिल की बात तुमसे इसलिए नहीं कह पाया क्योंकि मुझे डर था कि कहीं तुम मुझे गलत न समझ लो। तुम पहली और आखिरी इंसान थी जिसके साथ अपने पूरे जीवन को व्यतीत करने का स्वप्न मैंने देखा था। तुम मेरे सामने आती थी तो ऐसा लगता था मानो किसी निपुण और पारंगत मूर्तिकार ने खुद अपने हाथों से किसी संगमरमर को तराश कर जीवित मूर्ति का निर्माण किया हो। तुमसे मिलने से पहले मेरे जीवन में कुछ खोखलापन सा था, एक अजीब सा खालीपन था, जिसे उसदिन तक मेरे अलावा किसी ने महसूस नहीं किया था। और जब तुमसे मुलाकात हुई तो सब बदल गया। तुम्हारे ख्यालों ने ही मेरी जिंदगी के खालीपन को भर दिया।

अपनी जुबान पर तो नियंत्रण रख सकता था लेकिन आंखों पर कैसे रखता? जिस एक चेहरे को देखने के लिए घंटों इंतजार करता था, उसके सामने आने के बाद कैसे अपनी आंखों को चुराता...तुम्हें पता लग ही गया कि मेरे दिल में क्या था...हमने एक-दूसरे से बात करने के लिए उस 'नॉवेल' का सहारा लिया... तुम जानती हो ना कि मुझे प्रेम कहानियां पढ़ने में कोई रुचि नहीं... लेकिन तुम्हें थी और इसीलिए मुझे इसका सहारा लेना पड़ा... तुम्हें दूसरों के द्वारा अंग्रेजी में लिखी गईं 'मनगढ़ंत' प्रेम कहानियां बहुत पसंद थीं ना...और देखो आज तुम्हारी 'सच्ची' प्रेम कहानी को सब पढ़ रहे हैं...सब पसंद कर रहे हैं...खास बात यह है कि इसे पढ़ने के बाद अब लोग यह कहने की स्थिति में नहीं है कि 'प्रेम कहानियां' सिर्फ आईआईटी या आईआईएम वाले ही लिख सकते हैं...
#क्वीन