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Wednesday, June 7, 2017

अधूरी ख्वाहिशों की खुशबू

तुम पूछती थी, 'गौरव, मुझसे कितनी मोहब्बत करते हो?' और मैं तुम्हारे इस सवाल का जवाब देने के बजाय कहीं खो जाता था। पता है, मेरी मोहब्बत खुशबू की तरह थी और खुशबू का कोई पैमाना नहीं होता। तुम्हारे करीब होने पर एक अजीब सा सुकून मिलता था और जैसे ही तुमसे दूर जाता था, एक खौफ, एक डर सताने लगता था। ऐसा लगता था कि कहीं यही दूरी जिंदगी की हकीकत न बन जाए। तुम साथ होती थी तो मैं खुद में ही मुकम्मल हो जाता था और फिर तुमसे दूर जाते ही घर में, महफिलों में भी ऐसा लगता था जैसे अधूरा सा किसी कोने में पड़ा हूं। तुम्हारे साथ एक पल भी अगर साथ चलता था तो लगता था जैसे सदियों का सफर पूरा कर लिया और आज जब लोग कहते हैं कि मैं मंजिल के करीब हूं तो लगता है कि मंजिल तक ले जाने वाले रास्ते से भटक कर कहीं अधूरे सफर की ख्वाहिश लिए खुद को ही खोज रहा हूं।

हम जो ख्वाब देखते थे, उनमें मैं और तुम 'हम' हुआ करते थे और आज महसूस होता है जैसे हर ख्वाब बस एक अधूरा सपना था, एक ऐसा सपना जिसमें अंजाम देखे बिना ही उसे पूरा मान लिया था। तुम तो बारिश में भी मेरे आंसू पहचान लेने का दावा करती थी ना, तो फिर क्यूं आज आंखों के रास्ते बहकर पानी में मिल गई। जिन गलियों में पेड़ की आंड़ में छिपकर तुम्हें देखता था वो पेड़ आ भी वहीं हैं, मैं भी वहीं जाता हूं पर अब तुम्हारे आने की उम्मीद टूट चुकी है। 

देखो ना, आज तुम नहीं हो लेकिन तुम्हारी यादें, तुम्हारे साथ बिताए गए वे लम्हें, तुम्हारी  वह चंचल सी मुस्कुराहट, रातों को आधी नींद में देखे गए ख्वाब, दिन के हर पहर को तुम्हारे साथ बिताने की अनकही और अधूरी उम्मीदों की खुशबू आज भी लोग महसूस कर ही लेते हैं। उस दौर के बाद एक अरसा बीत गया तुम्हारी नाराजगी को... काश! मैं जान पाता कि तुम्हें प्यार करने के सिवा मेरी खता क्या थी...

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