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Wednesday, June 7, 2017

उस दौर में सब 'पागल' थे...

प्रेम, चाहत, जुनून, समर्पण... ये सब सिर्फ शब्द थे मेरे लिए लेकिन जब तुम मिली तो इन शब्दों के मायने समझ में आये... कितना खुशनसीब था मैं जो मैंने इन शब्दों को अहसास में बदलते हुए महसूस किया और इन्हें जिया भी... जब तुम्हारे घरवालों का तुमसे और खुद से व्यवहार असहनीय हो जाता था तो लगता था कि जैसे मोहब्बत नहीं बल्कि कोई गुनाह कर दिया है लेकिन इस मानव रूपी जीवन में जैसे गुनाहों की लिस्ट लंबी होती जाती है, वैसे ही मेरी मोहब्बत भी बढ़ती ही गई...

लोग कहते हैं कि जब कोई लंबे समय तक नहीं मिलता, सामने नहीं आता तो मोहब्बत खत्म हो जाती है लेकिन देखो इतने साल हो गए पर मेरी मोहब्बत खत्म न हुई... तुम्हें पाने की चाहत तो कभी थी ही नहीं लेकिन अफसोस इस बात का है कि हमारी इस कहानी पर 'अधूरी' रहने का धब्बा लग गया।

कितना छिप-छिप कर बात करती थी तुम, कैसे मिलते थे हम, जब वो सब याद करता हूं तो होठों पर मुस्कान आ जाती है... तुम्हारी कॉलोनी के बाहर गेट के किनारे घंटो खड़ा रहता था, तुम्हारे उस भाई से नोट्स के बहाने प्रेमपत्र भिजवाता था, उस बेचारे को तो इतना भी समझ में नहीं आता था कि कॉमर्स वालों को साइंस वालों के नोट्स की जरूरत नहीं होती। सच में... उस दौर में सब के सब पागल थे... बस सब कुछ हो रहा था... कैसे और क्यूं के बारे में कोई सोचता ही नहीं था... बेहद खूबसूरत कहानी है हमारी... बिलकुल चांद की तरह और उसी चांद की तरह इस कहानी पर भी एक धब्बा लगा है... 'अधूरी' होने का धब्बा... अब तो बस यही कह सकता हूं कि काश! हम मोहब्बत के उस आगाज को अंजाम तक पहुंचा सकते...
#क्वीन

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