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Saturday, August 6, 2016

हमारा रिश्ता

बहुत खूबसूरत है हमारा रिश्ता क्योंकि इसमें हमें एक दूसरे पर किसी तरह का शक नहीं है... यह खूबसूरती और भी ज्यादा इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि इस रिश्ते में 'हक' जैसी भी कोई चीज नहीं है। बस एक बात जो आज तक मुझे समझ में नहीं आई, वह यह है कि तुम्हें मैंने हर दिन अपने श्रीराम से मांगा...लेकिन तुम नहीं मिली...इसकी वजह क्या थी? क्या मेरी चाहत की शिद्दत में कोई कमी थी या फिर उन दुआओं में किसी तरह की कमी रह गई थी? पर इन सवालों का तुमसे कैसा वास्ता? ये सवाल तो मुझे अपने श्रीराम से पूछने चाहिए...लेकिन नहीं, उनसे मैं ये सवाल नहीं पूछ सकता क्योंकि अगर मैं उनसे ये सारे सवाल पूछुंगा तो वह समझ लेंगे कि मुझे उनके निर्णय के सौन्दर्य पर शंका है।

मुझे उनके निर्णय पर किसी तरह की शंका नहीं है, उन्होंने जरूर कुछ बेहतर ही सोचा होगा... मैं तो बस अपनी व्यक्तिगत जानकारी के लिए इन सवालों के जवाब जानना चाहता हूं...हो सकता है कि मैंने कुछ गलत किया हो, कुछ ऐसा जो मुझे नहीं करना चाहिए था और फिर अब मुझे अपनी वह गलती याद न आ रही हो। वैसे याददाश्त का कमजोर होना कोई बुरी बात नहीं होती है, बहुत बैचेन रहते हैं वे लोग, जिन्हें हर बात याद रहती है...

Thursday, August 4, 2016

मेरा प्रदर्शन और तुम्हारा दर्शन

उस दिन तुमने मुझे बताया कि तुम मार्केट जा रही हो... लेकिन मिलने या बात करने की कोई व्यवस्था नहीं थी क्योंकि तुम्हारे साथ तुम्हारी मासी जी भी थीं। और मैं, तुम्हारे दर्शन और मासी के सामने स्वयं के प्रदर्शन का मौका नहीं छोड़ सकता था...उस मार्केट के रास्ते पर बहुत ट्रैफिक रहता था... मैं उस मार्केट के पहले वाले चौराहे पर लगभग 1 घंटे खड़ा रहा, बस इस इंतजार में कि तुम निकलोगी और मैं तुम्हारी उस प्यारी सी मुस्कान को देख पाऊंगा।

तुम रिक्शे से अपनी मासी जी के साथ मेरे सामने से गुजरी लेकिन तुम्हारी नजर मुझ पर नहीं पड़ी... मार्केट के पास जाम में फंसा तुम्हारा रिक्शा...उस रिक्शे पर बैठी तुम और रिक्शे के पीछे हॉर्न बजाता मैं... आज सब कुछ सपने की तरह लगता है... अगर सपना मानूं तो उम्मीद रहती है कि यह तो पूरा हो सकता है और अगर उसे बीता कल मानूं तो लगता है कि अगर पहले हो सकता है तो अब क्यों नहीं... मैं सच जानता हूं पर मानता नहीं... या फिर यूं समझ लो कि मानना नहीं चाहता...

मैं यह भी जानता हूं कि अब यह सब एक ऐेसे स्वप्न का रूप ले चुका है जो कभी यथार्थ नहीं बन सकता लेकिन ईश्वर से एक निवेदन करता रहता हूं कि मुझे वह इतनी क्षमता दें कि मुझे तुम्हारे सामने कभी नजर न झुकानी पड़ें... ताकि मैं तुम्हारी आंखों में अपनी अधूरी हसरतों को देख सकूं...और साथ ही तुम भी मेरी आंखों में अपनी असली खूबसूरती को देख सको...विश्वास मानो, मैं तुम्हें अपनी आंखों में तुम्हारी जिस खूबसूरती को दिखा सकता हूं, वह कोई आइना नहीं दिखा सकता...

Tuesday, August 2, 2016

तीखेपन का प्यार

पता है आज क्या हुआ, आज मेरी एक प्यारी सी छोटी बहन चाउमीन खा रही थी... चाउमीन तीखी होने के बाद भी वह खाती रही... मैं उसकी आंखों में देख रहा था, आंखों में आंसू थे पर वह खाना बंद नहीं कर रही थी... उसकी आंखों ने उस दिन की याद दिला दी जह मैंने पहली और आखिरी बार तुम्हारे साथ खाना खाया था... कितनी तीखी थी वह दाल...तुम भी 'तीखा' नहीं खा पाती थी लेकिन तुम्हें सबसे ज्यादा 'तीखा' ही पसंद था... याद है तुम्हें, उसी दिन हमने गोलगप्पे भी खाए थे... इतना 'रोने' के बाद भी तुम गोलगप्पे में और ज्यादा 'तीखी चटनी' डालने को कह रही थी। तुम्हारे आंसू गिरते जा रहे थे और तुम गोलगप्पे खाए जा रही थी...
वही एक दिन था जब मुझे तुम्हारी आंखों में आंसू होने के बावजूद हंसी आ रही थी। वह तुम्हारी खुद को चुनौती देने की क्षमता थी या पागलपन, यह सब मुझे नहीं पता। मैं बस इतना जानता हूं कि तुम्हारी हर एक 'आदत' ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है। मेरी मोह्ब्बत को तुममें किसी ऐसे शख्स की तलाश नहीं थी जिसके साथ रहा जाए बल्कि मेरी मोह्ब्बत तो तुममें ऐसा शख्स खोजती थी जिसके बगैर रहा ही न जाए...लेकिन मुझे वह नहीं मिला... पर वह सख्स नहीं मिला, यह भी अच्छा ही हुआ... क्योंकि अगर वह मिल जाता तो उसी के साथ, उसी में खोकर सब कुछ भूल जाता... मुझे वह तो नहीं मिला लेकिन मेरे 'राम' मिल गए...उम्मीद से ज्यादा है मेरे लिए इतना... उनके लिए तो मेरे मन में तुमसे भी ज्यादा समर्पण है...
‪#‎क्वीन‬

Sunday, July 24, 2016

मेरा विश्वास


अपनी मोहब्बत को मैं लफ्जों में बयां नहीं कर सकता, बहुत मुश्किल है यह करना... या शायद नामुमकिन जैसा...उन चंद पलों के दौरान होने वाले हमारे मिलन के अहसास को मेरी कलम बयां कर सके, इतनी ताकत मेरी इस कलम में नहीं है। गुमनामी के अंधेरे से शोहरत के दीपक की दुधिया रोशनी तक के सफर की आरजू नहीं थी मेरी लेकिन तुमने और तुम्हारे साथ बिताए गए चंद लम्हों ने मशहूरियत की सीढ़ियों पर कदम रखवा ही दिया...तुम्हें पता है हमारे रिश्ते की खास बात यह है कि मैं जब भी उन लम्हों को शब्दों में उतारता हूं तो उसे एक भाई अपनी बहन को पढ़कर सुना सकता है... एक बेटा अपनी मां को सुना सकता है और एक बेटी अपने पिता को सुना सकती है...

हमारे रिश्ते की पवित्रता ही तो है जिसके आधार पर मेरी 'क्वीन' पूर्ण हो सकेगी...दुनिया में दो पौधे ऐसे हैं जो कभी मुरझाते नहीं और अगर वे मुरझा गए तो उसका कोई इलाज नहीं,एक नि:स्वार्थ प्रेम और दूसरा अटूट विश्वास... मुझे गर्व है कि मेरी ओर से दोनों चीजें अपने शाश्वत रूप में हैं और रही तुम्हारी बात तो मुझे पता है तुम भी प्रेम और विश्वास की इस पराकाष्ठा को कभी न कभी तो जरूर समझोगी.... मैं सनातनी परंपरा में अटूट विश्वास रखता हूं, इस नाते पुनर्जन्म में भी विश्वास है... हो सकता है कि तुम इस जन्म में मेरी बात का यकीन न करो लेकिन अगले जन्म में तो तुम्हें मानना ही होगा... क्योंकि मैं तब भी नहीं बदलूंगा... और हां, यह मेरा अंधविश्वास नहीं है... मैं तुम्हारी उस 'दोस्त' की तरह ही अपने विश्वास पर 'विश्वास' करता हूं... हालांकि मेरे इस विश्वास का आधार तुम ही तो, साथ ही मैं यह भी जानता हूं कि तुम मेरे विश्वास को कभी टूटने नहीं दोगी...
#क्वीन

Saturday, July 23, 2016

तुम्हारा अधिकार

यह मेरी उजड़ी हुई जिंदगी की कहानी है, लेकिन अपनी कीमत का अंदाजा इस बात से लगाओ कि मेरी इस कहानी में सबसे मजबूत किरदार तुम्हारा ही तो है। तुम मुझसे पूछती थी ना कि मेरी जिंदगी पर तुम्हारा कितना अधिकार है? जरा बताओ तो कि खुद पर तुम्हारा कितना अधिकार है? तुम ही तो थी मेरी जिंदगी...और देखो ना मैंने तुम्हारा अधिकार अब तक नहीं छीना... आज भी मेरी कलम से निकला पहला शब्द कुछ भी हो लेकिन आखिरी शब्द तुम पर ही खत्म होता है। तुमने मेरे बहुत से स्केच बनाए लेकिन तुमको पारंगत नहीं कह सकता... पारंगत तो तब मानता जब उन चित्रों में तुम मेरी खुशी और मेरे दर्द को भी जगह दे पाती...
आसमान में एक चांद होता है लेकिन तारे करोड़ों होते हैं, अगर किसी दिन कुछ तारे ना भी दिखें तो कोई फर्क नहीं पड़ता... चांद अपनी दूधिया रोशनी से सब कुछ रोशन कर देता है लेकिन अगर उसी आसमान में कुछ तारे ज्यादा दिखने लगें और चांद ना दिखे तो चारों ओर अंधेरा छा जाता है... कुछ ऐसी ही कहानी तो हमारे रिश्ते की भी है... सिर्फ तुम ही तो थी जिसने मेरी जिंदगी को रोशन करके रखा था और आज बहुत से लोग हैं लेकिन जिंदगी के इस अंधेरे में नजरें तुम्हें ही खोजती हैं... काश! तुम इस अंधेरे में एक बार फिर से मेरा हाथ थाम कर कहती कि देखो गौरव, मैं वापस आ गई...
मैं जानता हूं कि इस घने अंधेरे में तुम मुझे नहीं मिलने वाली... तुम्हारे वापस आने कल्पना करना मेरे लिए सिर्फ एक सपना है लेकिन सपने देखने का अधिकार तो है ना मेरे पास... मैं जानता हूं इस अंधेरे में तुम्हारा मिलना नामुमकिन है लेकिन अब तुम्हें खोजना बंद कर तुम्हारे सहारे खुद को खोज रहा हूं...उम्मीद है जिस दिन खुद को पा लिया उसदिन तुमसे किए गए उस वादे को पूरा कर पाऊंगा... हां, वही... तुम्हारी पहचान बनने का वादा...
‪#‎क्वीन‬

Friday, July 22, 2016

हमेशा रहोगी तुम...

तुम अपनी बालकनी में खड़ी थी उस दिन और मैं तुम्हारे घर के नीचे... बारिश का मौसम बन रहा था और बारिश से पहले की ठंडी हवा ने तुम्हारे सर से तुम्हारे चेहरे के रंग वाले गुलाबी दुपट्टे को तुम्हारे सर से नीचे गिरा दिया था.. उसके बाद हवा के उस झोंके से तुम्हारे बाल जिस तरह से उड़े थे, यकीन मानो उसके बाद जब मैं उस दिन की बारिश में भीगकर बीमार हुआ तो ऐसा लग रहा था जैसे उस 30 सेकंड के हसीन दृश्य के लिए 6 दिन का बुखार काफी कम है।
बुखार के कारण मैं तुमसे नहीं मिल पाया पर तुम भी दूरी को बर्दाश्त नहीं कर पाई और आ गई तीसरे दिन मेरे पास... 3 दिन में 21 स्केच बनाए थे तुमने और फिर अपने ही बनाए स्केच को दिखाकर हंस रही थी... फिर अचानक तुम्हारी आंखों में आंसू आ गए... तुम तो जानती थी ना... बस वे दो बूंद ही तो मेरी कमजोरी बन जाते थे... उन आंसुओं की कीमत अगर मेरी सारी खुशियां होती तो इस कीमत को चुकाने से भी परहेज नहीं करता लेकिन तुम्हारे उन आंसुओं को रोकने के लिए कुछ और ही कीमत चुकानी पड़ी... अवांछित कीमत थी.. पर तुम्हारी खुशी का मामला था तो चुकाने से पीछे हटना संभव नहीं था... चुका दी वह कीमत भी... हमेशा के लिए तुमसे दूर जाकर... लेकिन एक वादा है कि मेरी जिंदगी से तो दूर चली गई हो पर अपनी सोच से कभी तुम्हें दूर नहीं होने दूंगा...
‪#‎क्वीन‬

Thursday, July 21, 2016

क्यों लिखता हूं तुमको?

लोग कहते हैं कि मैं तुम्हारे बारे में या अपनी मोहब्बत के बारे में जो कुछ भी लिखता हूं वह उनको बहुत पसंद आता है लेकिन सच कहूं तो मैं बिलकुल नहीं चाहता कि मेरा दर्द किसी को खुशी दे। मैं बिलकुल यह नहीं चाहता कि मैं अपनी मोहब्बत को बेचूं, या तुमसे जुड़ी बातों के व्यक्तिगत भावों को सामाजिक रूप से दर्शाऊं...
मैं बस इतना चाहता हूं कि 'कान्ट स्टॉप द फीलिंग' सुनने वालों तक हिंदी पहुंचे और अगर कोई यह समझता है कि अंग्रेजी बोलने से कोई लड़की उससे प्यार करने लगेगी तो उसे सच का अहसास हो कि अपनी मातृ भाषा में प्रेम प्रदर्शित करना जितना आसान है, विदेशी भाषा में उसे प्रदर्शित करना उतना ही मुश्किल...अपनी मां के लिए लिखता हूं... हिंदी के लिए लिख रहा हूं... मां के अस्तित्व को बचाने के लिए अपनी महबूबा का प्रयोग कर रहा हूं... हो सकता है कोई गलत कहे लेकिन मैं आज भी सही हूं जैसे उस शाम था....
‪#‎क्वीन‬