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Saturday, February 21, 2026

सुनो ना!

 याद है ना तुम्हें!

उस शाम ढाबे पर खाने का इंतजार करते वक्त तुमने अपनी उँगलियों से मेज़ पर अनजाने में आड़ी-तिरछी लकीरें बनाते हुए कहा था- “काश, कभी ऐसा हो कि मैं तुम्हारा इंतजार तुम्हारी तरह से करूं और तुम मेरी तरह आने से इनकार कर दो...” मैं तुम्हारी इस बात पर हँसा तो था, लेकिन सच मानो, भीतर कहीं एक अजीब सी पीड़ा उठी थी। मैं कभी नहीं चाहता था कि मैं तुम्हारी किसी भी इच्छा, आकांक्षा या प्रश्न पर 'ना' कह पाऊं।

प्रेम किसी का भी हो, अगर छोड़कर जाता है तो विरासत में थोड़ी-सी उदासी भी छोड़ जाता है। और वो उदासी अब भी मुझे उस ढाबे पर महसूस होती है। खुले आसमान के नीचे, मुट्टी की भीनी खुशबू के बीच तुम्हारा वो सवाल, जो अनकहा रह गया था, उसका उत्तर तो मैंने उसी वक्त दे दिया था, लेकिन तुम उसे समझ ही न सकी थी।

तुमने कहा था- “सुनो…”

और मैं चौकन्ना हो गया था- “हाँ?”

तुम मुस्कुराईं नहीं, बस मेरी आंखों में खुद को तलाशने लगी।

उस “सुनो” में कितना कुछ था, है ना?

कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिनके जवाबों की चाहत नहीं होती… वो बस पूछ लिए जाते हैं।

तुम्हारा “सुनो” भी ऐसा ही था। मेरे “हाँ” में तुम्हें जवाब नहीं चाहिए था, बस तसल्ली चाहिए थी- कि मैं हूँ… कि मैं सुन रहा हूँ… कि तुम अकेली नहीं हो।

विश्वास मानो! तुम्हारे लिए जितना उस दिन 'उपलब्ध' था, उतना ही सदा था।

उस दिन तुमने पहली बार अपना हाथ मेरी हथेली में रखा था। वो हाथ ठंडा था, लेकिन पकड़ में अजीब-सी गर्माहट थी। तुम्हारी उँगलियों की हल्की-सी कंपकपाहट आज भी महसूस होती है।

तुम्हारे जाने के बाद कई बार कहा- “सुनो…”

और इंतज़ार करता रहा तुम्हारे “हाँ” का।

उस इंतजार ने भीतर तक हर दिन तोड़ा, और टूटने के बाद कुछ चुभन भी महसूस हुई। हर दिन ऐसे ही महसूस हुआ जैसे सब अभी आँखों के सामने हो रहा हो। जैसे तुम अभी भी अपनी हथेली में हाथ में देकर खड़ी हो, लेकिन सपने तो सपने ही होते हैं, वो तो टूटेंगे ही और चुभेंगे भी।

Friday, February 20, 2026

दिसंबर हर साल आता है, पर तुम नहीं आती

दो दशक हो गए, लेकिन उस साल का वो आखिरी दिन आज तक नहीं भूल पाया हूं। तुम्हारी उस सालों पुरानी कहानी में आज भी इतना उलझा हूं कि किसी और के किस्से का हिस्सा ही नहीं बन पा रहा हूं। साल के उस आखिरी दिन गुलाबी ठंड में जब काले-भूरे कुल्हड़ में लाल चाय पी थी, सच मानो! दूध खत्म होने के बाद 'चाचा' से सिर्फ वक्त बिताने के लिए बनवाई गई उस लाल लेकिन 'चरित्रवान चाय' जैसी ताजगी और ऊर्जा आज तक न मिल पाई। 

हर साल आखिरी दिन के जाते-जाते कम से कम 2-3 जगह तो जरूर जाता हूं और दूध होते हुए भी बिना दूध की चाय बनवाकर पीता हूं, कि शायद वही स्वाद, वही ताजगी, वही ऊर्जा मिल जाए, लेकिन अब तक एक बार भी नहीं मिला। पता नहीं क्यों, अब लगने लगा है कि शायद वो सब चाय से नहीं मिला था, जरूर कुछ ना कुछ उस साल में ही रहा होगा, नहीं तो इतनी सारी जगहों पर चाय पीने के बाद भी वो स्वाद क्यों नहीं मिल रहा?

उस शाम तुमने कहा था- तुम तो मेरे दिल हो, बात नहीं करते तो लगता है कि दिल धड़कना बंद कर रहा है। अगर वो सच था तो बताओ ना- आज बिना दिल के कैसे जिंदा हो तुम? 

सुनो ना! एक, दो, तीन, चार.... पता नहीं कितने दिसंबर गुजर गए, लेकिन सच मानो, मुझे नई जनवरी से कभी कोई उम्मीद नहीं रहती। दरअसल मुझे किसी 'नए' की जरूरत ही नहीं है। मुझे जरूरत ही नहीं है कि कोई नया मेरे लिए फिर पुराना हो, और फिर वही करे जो उस दिसंबर ने किया था। 

जनवरी हो, फरवरी हो, अप्रैल हो या नवंबर-दिसंबर... मेरी जिंदगी में अब परमानेंट 'बसंत' है...

Monday, February 16, 2026

वो शाम, जो बीतकर भी नहीं बीती

याद है ना तुम्हें! वो शाम धीमे-धीमे उतर रही थी। बिलकुल वैसे ही, जैसे कोई थका हुआ दिन बिना शोर किए विदा लेता है। आसमान पर केसरिया रंग की एक धुंधली चादर बिछी थी, जिसमें सूरज की आख़िरी किरणें मानो ठिठक-ठिठक कर सांस ले रही थीं। हवा में हल्की-सी ठंडक थी। तुम सामने चुपचाप बैठी थी। इतनी स्थिर कि समय भी शायद तुम्हें छूने से डर रहा था, बिलकुल शिलावत। तुम्हारी आंखें कुछ तो कहना चाहती थीं। पर क्या? उनमें ना शिकायत थी, ना कोई आग्रह, ना बीते कल का हिसाब और ना आने वाले कल की मांग। फिर क्या था जो मैं उसदिन तुम्हारी आंखों में पढ़ नहीं पाया। मैं खुद को तुम्हारी आंखों में खोजने की कोशिश कर रहा था। पर उसदिन शायद तुम्हारे सामने होते हुए भी तुम्हारे लिए नहीं था। 

उस दिन ज़िन्दगी ने हमें एक और अवसर दिया था। पर जब नियति प्रतिकूल हो, तब अवसर भी अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं। वे सामने होते हुए भी हाथ नहीं आते, और जब तक आपको उनके ‘अवसर’ होने की बात समझ में आती है, तब तक वे स्मृति बन जाते हैं। पता है, आज भी वह शाम आंखों के सामने जीवित खड़ी हो जाती है। केसरिया आसमान, तुम्हारी खामोशी, और मेरा असहाय ठहराव। सब कुछ वहीं का वहीं है, बस हम दोनों उस क्षण से बहुत आगे बढ़ चुके हैं, लेकिन वह क्षण मेरे भीतर तो आज भी ठहरा हुआ है।

उस पूरी शाम तुमने कुछ नहीं कहा, बस जाते-जाते पलटकर एक बार देखा था। शायद एक क्षण का दसवां हिस्सा रहा होगा। उस एक दृष्टि में कोई वादा नहीं था, कोई पश्चाताप नहीं था, बस इस बात की स्वीकार्यता थी कि जो हो रहा है, वही होना था और वही होगा। तुम्हारी आंखों में उस वक्त ज़रा-सी नमी थी, जिसे तुमने मुस्कान से छुपाने की कोशिश की, और वही कोशिश थी, जिसने मुझमें तुम्हारे प्रति ‘विश्वास’ को जीवित रखा था।

पता है! उस शाम अगर तुम अपने मौन का सहारा ना लिया होता और शब्दों से सब कह देती तो शायद सबकुछ आसान हो जाता, पर जो नहीं कहा गया, वही सबसे भारी बनकर रह गया। आज भी जब शाम उतरती है और आसमान वही धुंधला सा केसरिया रंग ओढ़ लेता है, तो तुम्हारा वही मौन, वही दृष्टि, और वह अधूरी मुस्कान मेरे भीतर कहीं फिर से जीवित हो उठती है।


लोग कहते हैं कि वक़्त बहुत कुछ बदल देता है, पर सच मानो, कुछ यादों को वक्त छू भी नहीं पाता। वह शाम भी उन्हीं में से एक है- जो बीत गई, पर मेरे भीतर से कभी गई नहीं।