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Tuesday, December 20, 2016

तुम्हारे इंतजार की वो रात

सुबह 11 बजे पहुंचना था लेकिन रात भर आँखों को आराम नहीं मिला। आँखों को उम्मीद थी कि सुबह वो चेहरा उनके सामने होगा जिसकी लाली ने मेरी ज़िंदगी के अंधेरे को छांट कर गुलाबी कर दिया था।

सुबह 8 बजे ही यहाँ पहुँच गया था मैं लेकिन तुम नहीं आई। सोचा था आज जी भर के तुम्हें देखूंगा, मुद्दतों से इन आँखों ने तुम्हारी आँखों की बेरुखी नहीं देखी थी...
तुम्हारी आँखों की बेरुखी में भी खुद को खोजने की मेरी वो तमन्ना पूरी न हो सकी...

पता है, वहां बहुत से लोग तुमको पूछ रहे थे... कोई यह जानना चाहता था कि नाम क्या है तुम्हारा? तो कोई यह जानना चाहता था कि तुम वहां हो भी या नहीं... क्या बताता मैं? मेरी फितरत वादें तोड़ने कि नहीं है, तुमसे किया गया वादा याद था मुझे, बस इसलिए खामोश ही रह गया...
#क्वीन

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